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झूठे सेकुलरिज्म की दरकती दीवारें

प्रमोद भार्गव
जय श्रीराम के नारे पर आपत्ति जताने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के धर्मनिरपेक्षता के पाखंड का मिथक इस चुनाव में टूटता दिख रहा है। चोला बदलते हुए अब ममता नंदीग्राम में शिव मंदिर पर जलाभिषेक करती दिखीं, वहीं स्वयं को देवी चंडी की भक्त और ब्राह्मण भी कहकर प्रचारित कर रही हैं। हिंदू मतदाताओं को साधने की दृष्टि से यह उनका मुस्लिम तुष्टिकरण से बाहर आने का स्वांग है। जबकि मार्क्सवादियों से सत्ता छीनने से लेकर दस साल मुख्यमंत्री बने रहने के दौरान न केवल उन्होंने हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई, बल्कि रामनवमी और दुर्गा पूजा के उत्सवों में भी व्यवधान डालती रही हैं। इसके उलट उन्होंने मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने के लिए न केवल हिजाब ओढ़ा, बल्कि उन्हीं की तर्ज पर इबादत भी की। कई बार तो हिंदुओं को अदालत के हस्तक्षेप के बाद सार्वजनिक स्थलों पर दुर्गा पूजा की अनुमति मिली। बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों को पश्चिम बंगाल में वोटबैंक बनाने की दृष्टि से इनकी नागरिकता के लिए आधार कार्ड जैसे पहचान-पत्र बनाए गए।

ममता के इस पाखंड और नंदीग्राम में हुए हमले पर कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने करारा कटाक्ष किया है। उन्होंने कहा कि ‘ममता अब स्वयं को देवी चंडी की भक्त और ब्राह्मण बता रही हैं, जबकि आज के पहले उन्होंने अपनी धार्मिक निष्ठा और जातीयता का खुलासा कभी नहीं किया। ममता पर हमला भी एक नौटंकी है। क्योंकि मुख्यमंत्री के काफिले के साथ बड़ी संख्या में पुलिस बल चलता है। हैरानी की बात यह है कि चार-पांच युवकों ने उनपर हमला किया, बावजूद न तो पुलिस ने उन्हें पकड़ा और न ही यह हमला वीडियो फुटेज के रूप में सामने आया। लिहाजा यह सब प्रपंच सहानुभूति बटोरने की कोशिश भर है।’ अब तो मीडिया भी इस हमले को फरेब बता रहा है।
हिंदुत्व के धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पहलू हैं। भारतीय जनता पार्टी ने इन्हीं पक्षों का चुनाव में इस्तेमाल कर केंद्र और कई राज्यों में सरकारें बनाईं। मुस्मिल तुष्टिकरण किए बिना और वोट मिले बिना भाजपा का दूसरी बार केंद्रीय सत्ता में आना इस बात का प्रतीक है कि हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण कर लिया जाए, तो सत्ता पर काबिज हुआ जा सकता है। इसलिए धर्मनिरपेक्षता के जितने भी पैरोकार हुए हैं, वे अब अपने छद्म आचरण से मुक्ति की ओर बढ़ रहे हैं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहने के दौरान कमलनाथ ने भगवान राम के वनवास के दौरान पथगमन को विकसित करने की योजना बनाकर धर्मनिरपेक्षता के मिथक को तोड़ा था। इसी से अब कदमताल मिलाती ममता दिख रही हैं। ममता को हिंदू घोषित करने की जरूरत व मजबूरी इसलिए भी आन पड़ी है, क्योंकि बंगाल भाजपा में नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने जनसभाएं कर हिंदुत्व के ध्रुवीकरण को उभार दिया है। इसी वजह से एक-एक कर तृणमूल और कांग्रेस के नेता भाजपा में शामिल होकर ममता के वर्चस्व के लिए चुनौती बन गए हैं।
पश्चिम बंगाल में हिंसा चरम पर है, दूसरी ओर एक के बाद एक तृणमूल कांग्रेस के सांसद, विधायक व अन्य कार्यकर्ता भाजपा के पाले में समाते जा रहे हैं। कभी वामपंथियों की मांद में घुसकर दहाड़ने वाली ममता अपने ही घर में अकेली पड़ती दिख रही हैं। राज्य में विधानसभा चुनाव से पहले जिस तरह एक-एक करके तृणमूल के दिग्गज नेता पार्टी छोड़ रहे हैं, उससे लगता है ममता घोर राजनीतिक संकट से घिरती जा रही हैं। ममता ने वामपंथियों के जबड़े से जब सत्ता छीनी थी, तब उम्मीद बनी थी कि वे अनूठा नेतृत्व देकर बंगाल में विकास और रोजगार को बढ़ावा देंगी। लेकिन दस साल के शासन में अविवाहित होने के बावजूद वे वंशवाद, मुस्लिम तुष्टिकरण, भ्रष्टाचार और हिंसा से बंगाल को मुक्ति नहीं दिला पाईं, बल्कि इन विकृतियों की पैरोकार बन गई।
यही कारण रहा कि अमित शाह और कैलाश विजयवर्गीय की रणनीति के चलते आज तृणमूल और ममता का भविष्य अंधेरे की ओर बढ़ रहा है। ममता को सबसे बड़ा झटका शुभेंदु अधिकारी के अलग होने से लगा है। इसके बाद ममता की देहरी फलांगने का सिलसिला चल पड़ा है। इसकी एक वजह ममता का तानाशाही आचरण तो है ही, राजनीति में तकनीक के जरिए जीत के खिलाड़ी माने जाने वाले प्रशांत किशोर का पार्टी में बढ़ता दखल भी है।
हाल के दिनों में तृणमूल को जिन दिग्गज नेताओं ने छोड़ा है, उनमें सबसे ताकतवर शुभेंदु अधिकारी हैं। ममता ने जिस नंदीग्राम से खुद चुनाव लड़ने की ठानी हैं, वहीं से भाजपा प्रत्याशी के रूप में शुभेंदु पचास हजार से भी अधिक मतों से ममता बनर्जी को हराने का दावा अभी से करने लगे हैं। शुभेंदु के पिता शिशिर अधिकारी भी विधायक और सांसद रह चुके हैं। शुभेंदु के एक भाई सांसद और दूसरे नगरपालिका अध्यक्ष हैं। इस तरह इनके परिवार का छह जिलों की 80 से ज्यादा सीटों पर असर है। सर्वहारा और किसान की पैरवी करने वाले वाममोर्चा ने जब सिंगूर और नंदीग्राम के किसानों की खेती की जमीनें टाटा को दीं तो इस जमीन पर अपने हक के लिए उठ खड़े हुए किसानों के साथ ममता आ खड़ी हुईं थीं।
मामता कांग्रेस की पाठशाला में पढ़ी थीं। जब कांग्रेस उनके कड़े तेवर झेलने और संघर्ष में साथ देने से बचती दिखी तो उन्होंने कांग्रेस से पल्ला झाड़ा और तृणमूल कांग्रेस को अस्तित्व में लाकर वामदलों से भिड़ गईं। इस दौरान उनपर कई जानलेवा हमले हुए, लेकिन उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं खींचे। जबकि 2001 से लेकर 2010 तक 256 लोग सियासी हिंसा में मारे जा चुके थे। यह काल ममता के रचनात्मक संघर्ष का चरम था, जिसके मुख्य रचनाकार शुभेंदु अधिकारी ही थे। इसके बाद 2011 में बंगाल में विधानसभा चुनाव हुए। ममता ने मां, माटी और मानुष का नारा लगाकर वाममोर्चा का लाल झंडा उतारकर तृणमूल की विजय पताका फहरा दी थी।
अब बंगाल की माटी पर एकाएक उदय हुई भाजपा ने ममता के वजूद को संकट में डाल दिया है। बंगाल में करीब 27 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। इनमें 90 फीसदी तृणमूल के खाते में जाते हैं। इसे तृणमूल का पुख्ता वोटबैंक मानते हुए ममता ने अपनी ताकत मोदी व भाजपा विरोधी छवि स्थापित करने में खर्च दी। इसमें मुस्लिमों को भाजपा का डर दिखाने का संदेश भी छिपा था। किंतु इस क्रिया की विपरीत प्रतिक्रया हिंदुओं में स्वस्फूर्त ध्रुवीकरण के रूप में दिखाई देने लगी। बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिए एनआरसी लागू होने के बाद भाजपा को वजूद के लिए खतरा मानकर चल रहे हैं, नतीजतन बंगाल के चुनाव में हिंसा का उबाल आया हुआ है। इस कारण बंगाल में जो हिंदीभाषी समाज है वह भी भाजपा की तरफ झुका दिखाई दे रहा है।
हैरानी इस बात की है कि जिस ममता ने परिवर्तन का नारा देकर वामपंथियों के कुशासन और अराजकता को चुनौती दी थी वही ममता इसी ढंग की भाजपा की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बौखला गई हैं। उनके बौखलाने का एक कारण यह भी है कि 2011-2016 में उनके सत्ता परिवर्तन के नारे के साथ जो वामपंथी और कांग्रेसी कार्यकर्ता आ खड़े हुए थे, वे भविष्य की राजनीतिक दिशा भांपकर भाजपा का रुख कर रहे हैं। 2011 के विधानसभा चुनाव में जब बंगाल में हिंसा का नंगा नाच हो रहा था, तब ममता ने अपने कार्यकताओं को विवेक न खोने की सलाह देते हुए नारा दिया था, ‘बदला नहीं, बदलाव चाहिए।’ लेकिन बदलाव के ऐसे ही कथन अब ममता को असामाजिक व अराजक लग रहे हैं।

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