आजादी का महामंत्र: वंदे मातरम का इतिहास

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प्रस्तुति – श्रीनिवास आर्य

वंदे मातरम् अर्थात हे मातृभूमि मैं तेरी वंदना करता हूं, मैं तुझे प्रणाम करता हूं। बंकिमचंद्र चटर्जी की यह अजर अमर रचना देखते ही देखते आजादी के दीवानों की जुबां पर इस तरह चढ़ी कि अंग्रेज भी इससे खौफ खाने लगे थे, एक हुंकार जिसने बरतानी हुकूमत की नींद हिला दी थी। दरअसल, ये एक नारा नहीं था बल्कि आजादी के दीवानों की धमनियों में बहने वाला खून था, शिराओं को झंकृत करने वाला मंत्र था, आत्माओं को जोड़ने वाला सेतु था।

बंकिमचंद्र चटर्जी की कलम से निकला ये जयघोष केवल उनके उपन्यास का हिस्सा मात्र नहीं था बल्कि वंदे मातरम् भारत की आजादी का मंगल गीत बन गया। आज भी आजादी की कीमत समझाने, शहीदों को याद करने और इस शस्य श्यामला भूमि को वंदन करने के लिए सबसे उपयुक्त यदि कोई गीत है तो वो है वंदे मातरम्। आइए जानते हैं आजादी के इस महामंत्र वंदे मातरम् के बारे में 10 खास बातें….

रचनाकाल : 1870 के दौरान अंग्रेज हुक्मरानों ने ‘गॉड सेव द क्वीन’ गीत गाना अनिवार्य कर दिया था। इस आदेश से बंकिमचन्द्र चटर्जी बहुत आहत हुए। बस, इसी पीड़ा से जन्म हुआ आजादी के अमर गीत ‘वंदे मातरम्’ का। बंकिम बाबू ने इस गीत की रचना 7 नवंबर 1876 में बंगाल के कांतल पाड़ा गांव में की। 1882 बंकिम बाबू ने इस रचना को अपने लोकप्रिय उपन्यास ‘आनंद मठ’ में सम्मिलित किया था। आनंदमठ देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत एक राजनीतिक उपन्यास है, जिसमें उत्तर बंगाल में 1762 से 1773 तक के संन्यासी विद्रोह का वर्णन है, जिनका आदर्श वाक्य था ‘ओम वंदे मातरम्’।

भाषा : बंकिम बाबू ने संस्कृत और बांग्ला के मिश्रण से इस गीत की रचना की और शीर्षक दिया ‘वंदे मातरम्’। ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो पद संस्कृत में थे, जबकि शेष गीत बांग्ला भाषा में। वंदे मातरम् का अंग्रेजी अनुवाद सबसे पहले अरविंद घोष ने किया था, जबकि आरिफ मोहम्मद खान ने उर्दू में अनुवाद किया था। 1906 में ‘वंदे मातरम्’देवनागरी लिपि में प्रस्तुत किया गया।

कांग्रेस अधिवेशन में गूंज : 1896 में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पहली बार वंदे मातरम् गीत को बंगाली शैली में लय और संगीत के साथ कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में प्रस्तुत किया था। 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने जर्मनी के स्टटगार्ट में जब तिरंगा फहराया तो उसके मध्य में ‘वंदे मातरम्’ही लिखा हुआ था।

राष्ट्रीय नारा : बंग भंग आंदोलन में ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रीय नारा बना। 7 अगस्त 1905 को बंग-भंग का विरोध करने जुटी भीड़ के बीच से किसी ने कहा- वंदे मातरम्‌ और चमत्कार घटित हो गया। सहस्रों कंठों ने समवेत स्वर में इसे दोहराया तो पूरा आसमान वंदे मातरम् के उद्‍घोष से गूंज उठा। इसके बाद तो आजादी के दीवानों के लिए महामंत्र बन गया वंदे मातरम्।

राष्ट्रगीत का दर्जा : दिसंबर 1905 में कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में गीत को राष्ट्रगीत का दर्जा प्रदान किया गया। कांग्रेस के अधिवेशनों के अलावा भी आजादी के आंदोलन के दौरान इस गीत का काफी प्रयोग हुआ। पंजाब केसरी लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस जर्नल का प्रकाशन शुरू किया, उसका नाम ‘वंदे मातरम’ रखा।

प्रतिबंध : राष्ट्रभक्ति का ज्वार उठाने वाले इस गीत को अंग्रेजों के विरोध का भी सामना करना पड़ा। 1906 में अंग्रेज सरकार ने वंदे मातरम्‌ को किसी अधिवेशन, जुलूस या फिर सार्वजनिक स्थान पर गाने पर प्रतिबंध लगा दिया। 14 अप्रैल 1906 को अंग्रेज सरकार के प्रतिबंधात्मक आदेशों की अवहेलना करके एक पूरा जुलूस वंदे मातरम के बैज लगाए हुए निकाला गया। अंग्रेज पुलिस ने जुलूस पर भयंकर लाठीचार्ज किया। मोतीलाल घोष और सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे देशभक्त रक्तरंजित होकर सड़कों पर गिर पड़े। उनके साथ सैकड़ों लोग वंदे मातरम् का घोष करते हुए लाठियां खाते रहे।

विवाद : 1923 कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम् के विरोध में भी स्वर उठे। कुछ मुस्लिम नेताओं ने इस महान गीत को सांप्रदायिक करार दे दिया। जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अजाद, सुभाषचंद्र बोस और आचार्य नरेन्द्र देव की समिति ने 28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में पेश अपनी रिपोर्ट में इस राष्ट्रगीत के गायन को अनिवार्यता से मुक्त रखते हुए कहा था कि इस गीत के शुरुआती दो पैरे ही प्रासंगिक हैं। इस समिति का मार्गदर्शन रवीन्द्रनाथ टैगोर ने किया था।

महात्मा गांधी और वंदे मातरम् : 1905 में गांधीजी ने लिखा था कि आज लाखों लोग एकत्र होकर वंदे मातरम्‌ गाते हैं। मेरे विचार से इसने हमारे राष्ट्रीय गीत का दर्जा हासिल कर लिया है। मुझे यह पवित्र, भक्तिपरक और भावनात्मक गीत लगता है। कई अन्य राष्ट्रगीतों के विपरीत यह किसी अन्य राष्ट्र-राज्य की नकारात्मकताओं के बारे में शोर-शराबा नहीं करता। कवि ने हमारी मातृभूमि के लिए जो अनके सार्थक विशेषण प्रयुक्त किए हैं, वे एकदम अनुकूल हैं, इनका कोई सानी नहीं है।

आधिकारिक राष्ट्रगीत : 15 अगस्त 1947 की रात्रि में संविधान सभा की पहली बैठक का प्रारंभ ‘वंदे मातरम’ के साथ हुआ और समापन ‘जन गण मन..’ के साथ। 1950 ‘वंदे मातरम’ आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय गीत बना। 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा ने निर्णय लिया कि स्वतंत्रता संग्राम में ‘वंदेमातरम’ गीत की उल्लेखनीय भूमिका को देखते हुए इस गीत के प्रथम दो अंतरों को ‘जन गण मन’ के समकक्ष मान्यता दी जाए। इसकी घोषणा देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने की।

विश्व का लोकप्रिय गीत : वर्ष 2002 में बीबीसी के एक सर्वेक्षण के अनुसार ‘वंदे मातरम्’ विश्व का दूसरा सर्वाधिक लोकप्रिय गीत बना। सर्वेक्षण में उस समय तक के सबसे मशहूर दस गीतों का चयन करने के लिए दुनिया भर से लगभग 7000 गीतों को चुना गया था और करीब 155 देशों के लोगों ने इसमें मतदान किया था। इस सर्वे में वंदे मातरम् शीर्ष 10 गीतों में दूसरे स्थान पर रहा था।

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