पांच राज्यों के चुनाव से हो सकती है देश की दिशा और दशा तय है

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अवधेश कुमार

चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव की तारीखें भले अब घोषित हुई हों, लेकिन राजनीतिक दल चुनावी बिगुल पहले ही फूंक चुके हैं। ये चुनाव न केवल क्षेत्रीय बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दृष्टि से भी दिशा-निर्देशक साबित हो सकते हैं। तृणमूल कांग्रेस, एआईएडीएमके, डीएमके, मुस्लिम लीग और वामपंथी दलों के साथ-साथ असम, तमिलनाडु तथा केरल के कई क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक हैसियत ही इन चुनावों पर निर्भर है। दूसरी तरफ, केंद्र में मोदी की अगुआई वाली सरकार बनने के बाद से हर चुनाव को बीजेपी की दृष्टि से देखा जाने लगा है। इन चुनावों में भी अगर बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा तो सारे विरोधी, जिनमें राजनीतिक दलों के अलावा बुद्धिजीवी, पत्रकार, एनजीओ, एक्टिविस्ट आदि सब शामिल हैं, एक साथ उस पर टूट पड़ेंगे।

किसका कितना दांव पर
हालांकि सच यही है कि इन राज्यों की कुल 303 लोकसभा सीटों में से केवल 27 सीटें बीजेपी के पास हैं। इनमें 18 पश्चिम बंगाल से हैं और 9 असम से। विधानसभा की भी महज 64 सीटें उसके पास हैं, जिनमें 60 अकेले असम से हैं, तीन पश्चिम बंगाल और एक केरल से। इस लिहाज से, इन चुनावों में बीजेपी के सामने कोई चुनौती है तो वह है असम में सरकार कायम रखना। पश्चिम बंगाल को उसने खुद अपने लिए चुनौती बनाया है। वहां 2016 के विधानसभा चुनाव में उसे मात्र 10.2 प्रतिशत मत और तीन विधायक मिले थे। इसके ठीक बाद 2019 लोकसभा चुनाव में 18 सीटें तथा 40 प्रतिशत से अधिक मत पाकर उसने साबित कर दिया कि अगर तृणमूल के सामने कोई चुनौती है तो वह बीजेपी ही है। लेकिन इसी वजह से उस पर बेहतर प्रदर्शन का दबाव भी आ गया है। उसके इस बार के प्रदर्शन की तुलना 2016 से नहीं, 2019 से होगी।

बहरहाल बीजेपी पर दबाव जो भी हो, कांग्रेस के लिए तो ‘करो या मरो’ की स्थिति है। 2016 में असम तथा केरल से उसकी सरकार चली गई और पश्चिम बंगाल में भी वामपंथियों के साथ उसका गठबंधन ममता को बड़ी चुनौती देने में सफल नहीं रहा। पुडुचेरी में सरकार जरूर बन गई, लेकिन चुनाव आते-आते वह भी काल कवलित हो चुकी है। इसके बावजूद उसके पास इन राज्यों में 115 विधानसभा सीटें हैं। उसके कुल 53 लोकसभा सीटों में से 29 इन्हीं राज्यों से हैं। जाहिर है, वह इन चुनावों को हलके में नहीं ले सकती।
वामदलों की शक्ति का पूरा आधार पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में था। इनमें अब केरल ही इनके हाथों में बचा है। अगर वहां से भी सरकार गई, तो यही कहा जाएगा कि भारतीय राजनीति में वामदलों के भविष्य पर स्थायी ग्रहण लग चुका है। तमिलनाडु में दोनों द्रविड़ पार्टियां बारी-बारी से सरकार बनाती रही हैं, लेकिन 2016 में जयललिता के नेतृत्व में एआईएडीएमके ने इस परंपरा को तोड़कर दोबारा सरकार बनाने में कामयाबी पाई। यह पहला विधानसभा चुनाव है जिसमें जयललिता और करुणानिधि, दोनों नहीं हैं। डीएमके का नेतृत्व करुणानिधि के पुत्र स्टालिन के हाथों आ गया है। अन्नाद्रमुक में मुख्यमंत्री पलानीस्वामी और उप मुख्यमंत्री पनीरसेल्वम के बीच सत्ता संघर्ष चलता रहता है। उधर शशिकला के पुत्र दिनाकरण ने एएमएमके पार्टी बना रखी है। इसलिए एआईएडीएमके के सामने दोहरी चुनौती है। बीजेपी वहां 2024 लोकसभा और 2026 विधानसभा को ध्यान में रखकर सक्रिय है। उसकी कोशिश एआईएडीएमके और शशिकला के बीच समझौता कराने की है। तो देखते हैं क्या होता है। अगर एआईएडीएमके का प्रदर्शन बहुत कमजोर रहा तो न केवल पार्टी टूटेगी, बल्कि बीजेपी के सामने भी प्रदेश में नए समीकरण बनाने की चुनौती खड़ी हो जाएगी।
बहरहाल, चुनाव परिणामों के पीछे केवल सतही राजनीति नहीं, कुछ वैचारिकता भी होती है। बीजेपी ने विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति, मोदी सरकार के जनकल्याण कार्य, कोविड-19 से निपटने में सरकार की भूमिका, चीनी चुनौतियों का जवाब जैसे मुद्दे उठाए हैं, किंतु इन सबके समानांतर हिंदुत्व और हिंदुत्व प्रेरित राष्ट्रीयता का मुद्दा बीजेपी के संदर्भ में शीर्ष पर है। राम मंदिर निर्माण, तीन तलाक विरोधी कानून, जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना, बीजेपी शासित राज्यों द्वारा बनाए गोवध निषेध कानून, लव जिहाद विरोधी कानून, सीएए, एनआरसी- ये सब उसी से जुड़े हैं। असम और पश्चिम बंगाल में सीएए और एनआरसी बड़ा मुद्दा है। गृह मंत्री अमित शाह बांग्लादेश से आए हिंदुओं को नागरिकता देने का वचन दे चुके हैं। प. बंगाल में तो जय श्री राम नारा मुख्य चुनावी मुद्दे की शक्ल ले चुका है। बीजेपी की आक्रामक रणनीति ने दूसरे दलों को रक्षात्मक होने को विवश किया है। ज्यादातर दल हिंदुत्व का विरोध ना करने को तो विवश हैं ही, अपने को धार्मिक व देवी देवताओं का सम्मान करने वाला साबित कर रहे हैं। लेकिन इसके समानांतर ये सब मुस्लिम वोट पाने के जुगाड़ में भी लगे हैं। कांग्रेस का केरल में मुस्लिम लीग से समझौता है, असम में उसने बदरुद्दीन तैयब जी के एआईयूडीएफ से समझौता किया है और बंगाल में वाम दलों के साथ मिलकर फुरफुरा शरीफ के अब्बास सिद्दीकी द्वारा गठित इंडियन सेकुलर फ्रंट को साथ लेने की कोशिश कर रही है। ममता भी प्रदेश के 29 प्रतिशत मुस्लिम वोटों के लिए जो भी संभव है, कर रही हैं।
मुस्लिम वोट का सवाल
इस दृष्टि से विचार करें तो मुस्लिम वोटों को लुभाने की खुलेआम कोशिशों का फिर एक दौर इन चुनावों से शुरू हुआ है। वर्ष 2017 से राजनीतिक दल प्रकट रूप में मुस्लिम वोटों को पाने की कोशिश से बचते थे। तब उत्तर प्रदेश चुनावों में एसपी-कांग्रेस गठबंधन ने खुलेआम मुसलमानों से वोट देने की अपील की थी और बुरी तरह पराजित हुए थे। उसके बाद राहुल गांधी को मंदिर-मंदिर पूजा करते दिखाया जाने लगा। भविष्य में मुस्लिम मतों के संदर्भ में पार्टियों का रुख बहुत हद तक इन चुनावों के परिणामों पर भी निर्भर करेगा।

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