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आज का चिंतन

वेदों को मानने और विश्व का उपकार करने की भावना के कारण आर्य समाज विश्व का सबसे श्रेष्ठ संगठन है

ओ३म्

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ईश्वर एक सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान एवं सर्वज्ञ सत्ता है जबकि जीवात्मा एक एकदेशी, ससीम तथा अल्पज्ञ सत्ता है। अल्पज्ञ होने के कारण से जीवात्मा वा मनुष्य को अपने जीवन को सुखी बनाने एवं लक्ष्य प्राप्ति के लिये सद्ज्ञान एवं शारीरिक शक्तियों की आवश्यकता होती है। सत्यस्वरूप ईश्वर सर्वज्ञ है एवं वह पूर्ण ज्ञानी है। संसार में जो भी ज्ञान है वह सब ईश्वर से ही उत्पन्न, प्रचारित एवं प्रसारित है। ईश्वर ने ही हमारी इस समस्त सृष्टि को उत्पन्न किया है तथा वही इसका धारण एवं पालनकर्ता भी है। संसार में ईश्वर, जीवात्मा तथा प्रकृति इन तीन सत्य पदार्थों का ही अस्तित्व है। यह तीनों पदार्थ अनादि, नित्य एवं सनातन हैं। यदि यह तीन पदार्थ न होते तो हमारी इस सृष्टि का तथा हमारे जीवन का अस्तित्व भी न होता। ईश्वर एक धार्मिक, परोपकारी, दयालु तथा न्यायकारी सत्ता है। वह अनादि काल से हमारी वर्तमान सृष्टि के समान ही सृष्टि की रचना, पालन एवं सृष्टि की प्रलय करती आ रही है। उसे इस संसार को बनाने व चलाने का पूर्ण ज्ञान है। सर्वज्ञ होने के कारण उसके ज्ञान में न्यूनता व वृद्धि नहीं होती। उसका ज्ञान सदा एकरस, एक समान तथा न्यूनता व वृद्धि आदि से रहित होता है। इसी कारण से हमारी इस सृष्टि में कहीं कोई न्यूनता नहीं है।

ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि की सभी रचनायें अपने आप में पूर्ण एवं आदर्श हैं। उसी ईश्वर ने हमारी इस सृष्टि को रच कर अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न हमारे पूर्वज युवा चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा को चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद का ज्ञान दिया था। वेदों का ज्ञान अपने आप में पूर्ण है। इससे मनुष्य को जीवन जीने और अपने जीवन के लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करने का ज्ञान व विधि का ज्ञान भी प्राप्त होता है। वेद ज्ञान विद्या से युक्त है जिसमें अविद्या का लेश भी नहीं है। कोई भी मत मतान्तर ऐसा नहीं है जिसमें अविद्या न हो। अविद्या मनुष्य के लिए मृत्यु के समान तथा विद्या अमृत व मोक्ष सुख के समान होती है। अतः मनुष्यों का कर्तव्य होता है कि वह वेदों की अमृतमय विद्या से युक्त मान्यताओं व सिद्धान्तों को जानें व उनका ही पालन करें और अविद्या को छोड़कर अपने जीवन को सुखी व कल्याणप्रद बनायें। इस दृष्टि से वेदों का मनुष्य के लिए सर्वाधिक महत्व है। बिना वेद ज्ञान के मनुष्य का जीवन ऐसा ही है जैसे कि बिना गन्तव्य को जाने यात्रा करना। ऐसा मनुष्य कहीं नहीं पहुंचता। आजकल के मनुष्यों की भी यही स्थिति है। वह जीवन के लक्ष्य को जाने बिना भौतिक सुखों की प्राप्ति से युक्त जीवन व्यतीत करते हैं और मनुष्य के ईश्वर के प्रति कर्तव्यों की उपेक्षा कर अवागमन में फंसे रहते हैं। अतः सबको ईश्वरीय ज्ञान वेदों की शरण में जाकर मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिये। ऋषि दयानन्द द्वारा 10 अप्रैल, सन् 1875 को स्थापित आर्यसमाज संगठन एक वेद प्रचार आन्दोलन है। वह मनुष्य जीवन की वेद ज्ञान की आवश्यकता की पूर्ति करने के साथ उसके सुख एवं कल्याणयुक्त जीवन व्यतीत करने में सहायक होता है। इसी कारण ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज के तीसरे नियम में बताया है कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना पढ़ाना और सुनना सुनाना सब आर्य वा श्रेष्ठ मनुष्यों का परम धर्म एवं कर्तव्य है। वेदाध्ययन करने पर यह नियम सत्य सिद्ध होता है।

आर्यसमाज की स्थापना संसार में विद्यमान अविद्या को दूर करने तथा विद्या का प्रचार करने के लिए ही ऋषि दयानन्द ने अपने विद्यागुरु प्रज्ञाचक्षु दण्डी स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी की प्रेरणा से मुम्बई में की थी। इस विषयक आर्यसमाज का आठवां नियम भी है। नियम में कहा गया है कि अविद्या का नाश तथा विद्या की वृद्धि करनी चाहिये। आर्यसमाज वेदों को विद्या के ग्रन्थ मानता है और इनका प्रचार करना ही अपना ध्येय समझता है। वेदों में किसी का इतिहास व किसी प्रकार के कहानी किस्से नहीं है। इस वेद प्रचार से ही मनुष्यों के समस्त दुःखों पर विजय पायी जा सकती है और देश व समाज की उन्नति हो सकती है। विद्या की उन्नति के लिए मनुष्य को असत्य को छोड़ना तथा सत्य का ग्रहण करना आवश्यक होता है। इसके लिए आवश्यक होता है कि हमें सत्य व असत्य का ज्ञान हो। इस आवश्यकता की पूर्ति भी वेदाध्ययन एवं वेदों के सिद्धान्तों को जानकर होती है। वेद एवं इसके सभी सिद्धान्त सत्य पर आधारित है। वेदों में कोई असत्य बात नहीं है। इस कारण से मनुष्यों की सर्वांगीण उन्नति आर्यसमाज व इसके सिद्धान्तों सहित वेदाध्ययन एवं वैदिक साहित्य के अध्ययन से ही प्राप्त की जा सकती है।

आर्यसमाज के इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही आर्यसमाज के संस्थापक ऋषि दयानन्द ने वैदिक सिद्धान्तों एवं मान्यताओं पर आधारित विश्व का एक अपूर्व ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश लिखा व प्रचारित किया। इस ग्रन्थ में हमें वेदों की प्रायः सभी मुख्य मुख्य मान्यताओं का ज्ञान होता है। हम अविद्या को जानकर उसको छोड़कर सत्य ज्ञान व सत्य सिद्धान्तों को प्राप्त हो सकते हैं। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के अतिरिक्त ऋग्वेद आंशिक तथा यजुर्वेद सम्पूर्ण का संस्कृत व हिन्दी में भाष्य भी किया है। उनका वेदभाष्य आदर्श एवं प्रामाणिक कोटि का है। चारों वेदों की भूमिका भी ऋषि दयानन्द जी ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के नाम से लिखी है। संस्कारविधि एवं आर्याभिविनय जैसे उत्तम ग्रन्थ भी उन्होंने लिखे हैं जिनसे हम वेदों के प्रायः पूर्ण एवं यथार्थ तात्पर्य को जान सकते हैं। इससे हमें ईश्वर, जीवात्मा तथा प्रकृति के सत्यस्वरूप तथा गुण, कर्म व स्वभावों का ज्ञान होता है। हम वेदों के ज्ञान से लाभ उठाकर उपासना की उचित रीति से साधना कर ईश्वर व आत्मा का साक्षात्कार कर सकते हैं। ईश्वर व जीवात्मा का साक्षात व प्रत्यक्ष करना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य होता है। ऐसा करके मनुष्य सभी प्रकार की अविद्या व दुःखों से छूट जाता है। इससे मनुष्य को अमृत वा मोक्ष की प्राप्ति होती है और भिन्न भिन्न योनियों में जीवात्मा का आवागमन बन्द हो जाता है। मुक्त जीवात्मा ईश्वर के सान्निध्य में 31 नील वर्षों से अधिक अवधि तक रहकर दुःखरहित सुख व आनन्द की अवस्था का लाभ करती है। मोक्ष विषयक विस्तृत ज्ञान को प्राप्त करने के लिए सभी मनुष्यों को सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के नवम समुल्लास का पाठ करना चाहिये। इससे मोक्ष के सत्य स्वरूप का ज्ञान होने सहित मोक्ष से सम्बन्धित सभी भ्रान्तियां दूर हो जाती हैं।

आर्यसमाज विश्व का सबसे अनूठा संगठन है। यह संसार में व्यापक व सृष्टि के रचयिता ईश्वर के अनादि ज्ञान वेद को मानता है, वेदों को पूर्णतः जानता भी है और उसका विश्व में प्रचार भी करता है। वेद मानवता वाद के पोषक ग्रन्थ हैं। वेद का अध्ययन कर व उसकी शिक्षाओं का पालन करने से मनुष्य, समाज, देश व विश्व की सर्वांगीण उन्नति होती है। वसुधैव कुटुम्बकम् का भाव भी वेदों की शिक्षाओं की ही देन है। संसार के सभी मनुष्य एवं समस्त प्राणी जगत परमात्मा की सन्तान होने से परस्पर बन्धु एवं समान है। सभी को एक दूसरे का हित करने व सबको सुख देने की भावना से कर्म करने चाहिये। इन उद्दात विचारों व भावनाओं सहित अविद्या व असत्य से पूर्णतया मुक्त होने के कारण वेद ज्ञान संसार के सब मनुष्यों के लिए ग्राह्य एवं धारण करने योग्य है। वेदों के प्रचार व धारण से ही विश्व का उपकार वा विश्व शान्ति का लक्ष्य प्राप्त हो सकता है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ही आर्यसमाज अपने आरम्भ काल से कार्य कर रहा है। इसी कारण आर्यसमाज असत्य मान्यताओं व सामाजिक कुरीतियों का खण्डन करता है तथा वैदिक सत्य मान्यताओं का प्रमाणों, युक्तियों व तर्कों से मण्डन करता है। वह अविद्या को हटाता तथा विद्या का प्रसार करता है। आर्यसमाज ने अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही अपने आरम्भ काल में ही वेदानुकूल शिक्षा के प्रचार के लिए ही दयानन्द ऐंग्लो वैदिक स्कूल व कालेज सहित वेदों के पठन पाठन के लिए गुरुकुलों की स्थापना की थी। इन शिक्षा संस्थानों के द्वारा वैदिक विचारों व मान्यताओं का विश्व में प्रचार हुआ है। आर्यसमाज के कारण ही विश्व में अन्धविश्वास व अविद्या कम हुई है। भारत देश सदियों की गुलामी के बाद आजाद हुआ है। अनेक समस्याओं एवं चुनौतियों के बाद भी भारत आज विश्व की एक बड़ी शक्ति है। भारत निरन्तर तेजी से प्रगति कर रहा है। अनेक मत-मतान्तरों ने विगत डेढ़ शताब्दी में अपनी मान्यताओं व सिद्धान्तों में सुधार किये हैं। आर्यसमाज के सभी सिद्धान्त वेदों पर आधारित हैं और अद्यावधि अपरिवर्तनीय बने हुए हैं और सदा ऐसे ही रहेंगे।

अतः संसार के सभी मनुष्यों को आर्यसमाज की शरण में आकर वेदों का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये और अपनी अविद्या दूर करनी चाहिये। ऐसा करके सभी मनुष्य अपने जीवन को ईश्वर की इच्छा व आज्ञा के अनुरूप बनाकर जन्म जन्मान्तर में सुखों से युक्त कर सकते हैं और इससे सभी देश व स्थानों में मानव जाति के दुःखों में न्यूनता आकर सुखों की वृद्धि हो सकती है। इसी के साथ हम इस लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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