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क्या शबनम की फांसी महिला अपराधियों में खौफ पैदा कर पाएगी

रमेश ठाकुर

शबनम को फांसी मिल जाने के बाद एक नई किस्म की बहस हिंदुस्तान में शुरू हो जाएगी। महिला अपराधों के उन सभी केसों में जिरह के दौरान कोर्ट रूमों में शबनम की फांसी का उदाहरण गूंजा करेगा। शबनम की दुहाई देकर वकील महिलाओं को फांसी देने की मांग जजों से किया करेंगे।

कुछ फैसले इतिहास ही नहीं बदलते, बल्कि नया इतिहास रच देते हैं, व्यवस्था को नए सिरे से गढ़ने का भी काम करते हैं। एक फैसले के बाद देश में ऐसा ही कुछ होने जा रहा है। हिंदुस्तान में पहली मर्तबा किसी महिला अपराधी को फांसी दिए जाने के साथ ही आधी आबादी के प्रति सामाजिक और संवैधानिक सोच में यहीं से बदलाव आना शुरू हो जाएगा। कालांतर के पुराने रिवायतों और परंपराओं का इतिहास बदलेगा और उसमें एक नया पन्ना जुड़ेगा जिसमें आजादी के 72 वर्ष बाद किसी महिला को उसके आपराधिक कृत्यों के लिए फांसी की सजा को अमली जामा पहनाया जाएगा। देशभर की निचली व उच्च अदालतों में करीब 42 हजार ऐसे मामले लंबित हैं जिनमें महिलाओं द्वारा किए गये जघन्य अपराध शामिल हैं। उनमें 21 मई 1991 का दिल दहला देने वाला मामला भी है। जब तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक आत्मघाती बम विस्फोट में नलिनी श्रीहरण नाम की महिला ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की थी। अदालत में कई बार उन्हें फांसी देने की मांग हुई, लेकिन उदारता का उन्हें लाभ मिला।

अमरोहा की शबनम को फांसी मिल जाने के बाद एक नई किस्म की बहस हिंदुस्तान में शुरू हो जाएगी। महिला अपराधों के उन सभी केसों में जिरह के दौरान कोर्ट रूमों में शबनम की फांसी का उदाहरण गूंजा करेगा। शबनम की दुहाई देकर वकील महिलाओं को फांसी देने की मांग जजों से किया करेंगे। कुल मिलाकर शबनम की फांसी एक उदाहरण तो बनेगी ही, साथ ही महिला अपराधियों में डर व महिला अपराध रोकने में काफी हद तक वाहक भी बनेगी। हिंदुस्तान में एक समय था जब बड़े अपराधों में महिलाओं का बोलबाला हुआ करता था। बीहड़ों में फूलन देवी का आतंक हो या सीमा परिहार जैसी दस्यु सुंदरी का ख़ौफ़! शायद ही कोई भूले। वैसे, उतने खौफनाक अपराध बीते कुछ वर्षों में कम हुए। पर, दूसरे किस्म के अपराधों में बाढ़ आ गई। जैसे, प्रॉपर्टी के नाम पर अवैध धंधेबाजी, शादी-ब्याह के नाम पर ठगी, जिस्मफरोशी, स्मैक व नशीले पदार्थ बेचना, मेट्रो या सार्वजनिक स्थानों पर पॉकेटमारी करने में महिलाओं की सक्रियता ज्यादा आने लगी है।

महिलाओं से जुड़े छोटे अपराधों को छोड़कर बड़े अपराधों की बात करें तो सोनू पंजाबन, शबाना मेमन, रेशमा मेमन, अंजलि माकन, शोभा अय्यर, समीरा जुमानी के नामों को भी शायद कोई भूल पाए। इनमें कई नाम ऐसे हैं जिनका अपराध फांसी के लायक रहा है। लेकिन भारत के उदार सिस्टम से ये बच गईं। या फिर इन्हें बचा लिया गया। शबाना और रेशमा मुंबई बम कांड की अभियुक्त हैं जो दोनों क्रमश: अयूब मेमन व टाइगर मेमन की पत्नियाँ हैं। समीरा जुमानी जहां पासपोर्ट रैकेट की अभियुक्त है वहीं, अंजलि माकन का बैंक से करोड़ों का चूना लगाकर फरार हो जाना और शोभा अय्यर का प्लेसमेंट एजेंसी की आड़ में बेरोजगारों को रोज़गार दिलाने के नाम पर अरबों लेकर चंपत हो जाना आदि भी बड़े अपराध हैं।

आजादी से अब तक खुदा-न-खास्ता किसी महिलाओं को फांसी दी गई होती, तो निश्चित रूप से राजीव गांधी जैसी नेताओं की कातिल अभी तक फांसी के तख्तों पर झूल गईं होती। अमरोहा की शबनम ने साल 2008 के अप्रैल महीने में प्रेमी के सहयोग से अपने समूचे परिवार को मौत दे दी थी। कुल्हाड़ी से काटते वक्त उसे रत्ती भर रहम नहीं आया कि वह अपनों का ही खून बहा रही है। अपराध निश्चित रूप से दया करने वाला नहीं है। अपने प्यार को पाने के लिए वह अपनों की कैसे बैरन बनी, जिसका खुलासा उसने घटना के कुछ समय पश्चात किया भी और अपराध बोध भी हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उसके अपराध ने एक दुनिया का अंत किया था। 12-13 साल केस निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक हिचकोले मारता रहा। दया याचिका राष्ट्रपति के चौखट तक भी पहुंची, लेकिन कोर्ट द्वारा मुर्करर फांसी बरकरार रही। फांसी देने का रास्ता लगभग साफ है।

शबनम को शायद उत्तर प्रदेश के मथुरा में बने उसी फांसीघर में ही फांसी दी जाएगी जो बीते डेढ़ सौ वर्षों से अपने पहले मेहमान का इंतजार कर रहा है। फांसीघर का लंबा इंतजार शायद शबनम ही पूरा करेगी। अंग्रेजी हुक़ूमत ने वर्ष 1871 में मथुरा में पहला महिला फांसीघर बनाया था। आजादी की लड़ाई लड़ने वाली तब कई महिला क्रांतिकारियों को फांसी देना अंग्रेजों ने मुर्करर किया था, लेकिन महात्मा गांधी व अन्य नेताओं के विरोध के बाद अंग्रेज किसी महिला को फांसी नहीं दे पाए। उस फांसी घर का शायद पहली बार इस्तेमाल होगा। शबनम को फांसी देने की तारीख अभी तय नहीं हुई है। ना ही कोई अंतिम आदेश आया है। लेकिन तय है कि फांसी उसी घर में दी जाएगी। जल्लाद पवन का फांसीघर के आसपास चहलकदमी करना बताता है कि फांसी देर-सबेर कभी भी हो सकती है। जेल प्रशासन की तैयारी पूरी है। बस इंतजार अंतिम डेथ वारंट का है।

ग़ौरतलब है कि समाज की संवेदनाएं, उदारता और विनम्र-आदरभाव हमेशा महिलाओं के प्रति औरों से ज्यादा रहा है। ऐसा दौर जब महिलाएं विभिन्न गतिविधियों जैसे- शिक्षा, राजनीति, मीडिया, कला और संस्कृति, सेवा क्षेत्र, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में विजय पताका फहरा रही हैं, तब एक अपराधी महिला को सूली पर चढ़ाने की तैयारी हो रही हो। निश्चित रूप से ह्दय में पीड़ा है, लेकिन अपराध माफी का भी तो नहीं है। ऐसे केसों में उदारता दिखाने का मतलब है, दूसरे केसों को बढ़ावा देना, अपराधियों को निडर बनाना। सजा की व्यवस्था सभी श्रेणियों में समानान्तर रूप से वकालत करती है फिर चाहे पुरूष हो या महिला। ये फांसी महिलाओं को अपराध न करने की सीख देने के साथ-साथ बदलाव को सुधरने का वाहक भी बनेगी।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर नजर डाले तो दिखता है कि महिलाएं अपराध जगत में कितनी तेजी से बढ़ रही हैं। सिर्फ एक वर्ष में महाराष्ट्र में 90,884 महिलाओं को विभिन्न अपराधों में पकड़ा गया। वहीं, आंध्र प्रदेश अव्वल नंबर पर है जहां 57,406 महिलाओं ने विभिन्न श्रेणियों में अपराध किया। मध्य प्रदेश भी पीछे नहीं है, वहां भी 49,333 महिलाएं विभिन्न आरोपों में गिरफ्तार हुईं। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब व अन्य राज्य भी पीछे नहीं हैं। क़ाबिले गौर हो कि नारी जगत का अपराध में पैर पसारना चिंता का विषय है। वक्त रहते शासन-प्रशासन व नीति-निर्माताओं को इस तरफ ध्यान देना होगा। महिला अपराधों में उदारता और लचीलापन नहीं दिखाना चाहिए। शबनम जैसे और भी बहुतेरी घटनाएँ विभिन्न राज्यों में घटीं। उन सभी केसों में ये फांसी संबल देगी। साथ ही ऐसी सजा महिलाओं के भीतर डर पैदा करेगी और सफल संदेश का वाहक भी बनेगी।

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