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18 57 की क्रांति और धन सिंह गुर्जर कोतवाल

   – देवेंद्र सिंह आर्य

10 मई 1857 की प्रातः कालीन बेला। स्थान मेरठ ।
क्रांति का प्रथम नायक धनसिंह गुर्जर कोतवाल। नारा – ‘मारो फिरंगियों को।’
मेरठ में ईस्ट इंडिया कंपनी की थर्ड केवल्री की 11 और 12 वी इन्फेंट्री पोस्टेड थी । 10 मई 1857 रविवार का दिन था। रविवार के दिन ईसाई अंग्रेज अधिकतर चर्च जाने की तैयारी प्रातःकाल से ही करने लगते हैं।सब उसी में व्यस्त थे।
वास्तव में दिनांक 6 मई 1857 को 90 भारतीय जवानों में से 85 ने वह कारतूस मुंह से खोलने से मना कर दिया , जिस -जिस राइफल के कारतूस में गाय और सूअर की चर्बी लगी होने की चर्चा फैल गई थी।

इन 85 भारतीय सैनिकों का कोर्ट मार्शल करते हुए अंग्रेजों ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी। जो मेरठ की जेल में बंद थे , इसके अलावा 839 भारतीय लोग इसी विक्टोरिया जेल में बंद थे।
तभी सुबह-सुबह कोतवाल धनसिंह चपराणा ने अंग्रेजों पर यकायक गोलियां चलानी शुरू कर दीं । जब तक वह समझ पाते और संभल पाते तब तक बहुत सारे अंग्रेज मार दिए गए और विक्टोरिया जेल का फाटक खोल कर वह 85 सैनिक तथा शेष 839 अन्य कैदी लोग जेल से मुक्त कर दिए गए । यह सभी लोग एक साथ हथियार लेकर अंग्रेजों पर टूट पड़े। इस प्रकार मेरठ से प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बज गया। इस क्रांति के नायक कोतवाल धनसिंह गुर्जर बने।

संक्षिप्त इतिहास

14 फरवरी 1483 को बाबर का जन्म हुआ। जो दिनांक 17 नवंबर 15 25 ई0 को पांचवीं बार सिंध के रास्ते से भारत आया था। जिसने 27 अप्रैल 1526 को दिल्ली की बादशाहत कायम की। 29 जनवरी 1528 को राणा सांगा से चंदेरी का किला जीत लिया।
लेकिन 4 वर्ष पश्चात ही दिनांक 30 दिसंबर 1530 को धौलपुर में बाबर की मृत्यु हो गई। महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने 31 दिसंबर 1600 ई0 को ईस्ट इंडिया कंपनी की स्वीकृति दी।
2 जनवरी 1757 को नवाब सिराजुद्दौला से ईस्ट इंडिया कंपनी ने कोलकाता छीन लिया । 9 फरवरी 1757 को संधि हुई । जिसमें काफी रियासत अंग्रेजों को दी गई। लेकिन 13 फरवरी 1757 को लखनऊ सहित अवध पर कब्जा कर लिया।

23 जून 1757 को प्लासी का युद्ध लॉर्ड क्लाइव के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना,और मुगल सेना के बीच हुआ जिसमें विशाल मुगल सेना का सेनापति मीर जाफर लॉर्ड क्लाइव से दुरभिसन्धि करके षड्यंत्र के तहत जानबूझकर हार गया।
20 दिसंबर 1757 को लॉर्ड क्लाइव बंगाल का गवर्नर बना। 30 दिसंबर 1803 को दिल्ली के साथ-साथ कई अन्य शहरों पर ईस्ट इंडिया कंपनी का आधिपत्य हो गया। 26 फरवरी 18 57 को पश्चिम बंगाल के बुरहानपुर में आजादी की लड़ाई की शुरुआत हुई। जिसमें मंगल पांडे को 8 अप्रैल 1857 को खड़कपुर की बैरक में फांसी दे दी गई।
हमें क्रांतिवीर मंगल पांडे के विषय में यह जान लेना चाहिए कि बैरकपुर में कोई जल्‍लाद नहीं मिलने पर ब्रिटिश अधिकारियों ने कलकत्‍ता से चार जल्‍लाद इस क्रांतिकारी को फांसी देने के लिए बुलवाए थे। जिन्होंने उन्हें फांसी देने से मना कर दिया था। इस समाचार के मिलते ही कई छावनियों में ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध असंतोष भड़क उठा । इसे देखते हुए उन्‍हें 8 अप्रैल 1857 की सुबह ही फांसी पर लटका दिया गया । इतिहासकार किम ए. वैगनर की किताब ‘द ग्रेट फियर ऑफ 1857 – रयूमर्स, कॉन्सपिरेसीज एंड मेकिंग ऑफ द इंडियन अपराइजिंग’ में बैरकपुर में अंग्रेज अधिकारियों पर हमले से लेकर मंगल पांडे की फांसी तक के घटनाक्रम के बारे में सभी तथ्यों का विस्तार से वर्णन किया गया है ।. ब्रिटिश इतिहासकार रोजी लिलवेलन जोंस की किताब ‘द ग्रेट अपराइजिंग इन इंडिया, 1857-58 अनटोल्ड स्टोरीज, इंडियन एंड ब्रिटिश में बताया गया है कि 29 मार्च की शाम मंगल पांडे यूरोपीय सैनिकों के बैरकपुर पहुंचने को लेकर बेचैन थे । उन्‍हें लगा कि वे भारतीय सैनिकों को मारने के लिए आ रहे हैं ।इसके बाद उन्‍होंने अपने साथी सैनिकों को उकसाया और ब्रिटिश अफसरों पर हमला किया । उन्हें 18 अप्रैल 18 57 के दिन फांसी देना निश्चित किया गया था । परंतु जब जल्लादों ने उन्हें फांसी देने से इनकार कर दिया तो नियत तिथि से 10 दिन पहले ही क्रांतिकारी मंगल पांडे को फांसी की सजा दे दी गई थी। हम क्रांतिकारी मंगल पांडे का पूरा सम्मान करते हुए और उनकी क्रांति के प्रति समर्पण की भावना को नमन करते हुए यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि मेरठ की क्रांति से उनका कोई संबंध नहीं था।
10 जनवरी 1818 को मराठों और अंग्रेजो के बीच तीसरी और अंतिम लड़ाई हुई थी। वास्तव में शूरवीर महाराणा प्रताप छत्रपति शिवाजी महाराज महाराजा रणजीत सिंह आदि भी आजादी के दीवाने थे । उन्हीं से प्रेरणा लेकर मई 1857 का स्वतंत्रता संग्राम प्रारंभ हुआ था। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में तात्या टोपे , रानी लक्ष्मीबाई , चांद बेगम ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।राजस्थान के शहर कोटा में लाला जयदयाल कायस्थ , मेहराब खान पठान ने 15 अक्टूबर 18 57 को विद्रोह किया । जिनको अंग्रेजों ने फांसी लगाई थी , अदालत के सामने शहीद चौक उसी स्थान पर बना है।
इसके अलावा सम्राट नागभट्ट प्रथम , बप्पा रावल, नागभट्ट द्वितीय , गुर्जर सम्राट मिहिर भोज, गुरु तेग बहादुर ,गुरु गोविंद सिंह, बंदा वीर बैरागी ,वीर हकीकत राय आदि अनेकों क्रांतिकारी महापुरुष कोतवाल धन सिंह गुर्जर के प्रेरणा स्रोत थे।

ऐसे हुई थी क्रांति की शुरुआत

मंगल पाण्डे की तरह मेरठ छावनी स्थित रिसाले के 90 सिपाहियों ने चर्बी वाले कारतूस लेने से इंकार कर दिया था। रिसाले का कर्नल कारमाइल बड़ा अहंकारी एवं हठी स्वभाव का अधिकारी था। उसने 90 सिपाहियों की वर्दी उतरवा कर और लोहारों द्वारा उन देशभक्त सिपाहियों को हथकड़ी और बेडिय़ों में जकड़वाकर मेरठ सिविल जेल में भिजवा दिया था। शाम के लगभग 5 बजे रोष के रूप में स्वाधीनता की चिंगारी शोला बनकर उभरी और ज्वालामुखी विस्फोट का रूप धारण कर गई, मेरठ के समीप चपराने गुर्जरों का पांचली गांव है। वहां का निवासी चौधरी धन सिंह गुर्जर मेरठ शहर का कोतवाल (संस्कृत का कोटपाल) था। वह बड़ा देशभक्त तथा स्वाधीनता प्रेमी पुलिस अधिकारी था। वह ऐसे अवसर की खोज में था-जिसमें उसे देश भक्ति का परिचय देने का शुभ अवसर मिले। पुलिस कोतवाल होने के नाते उसका दायित्व था कि वह अंग्रेजी सरकार को सहयोग देता और विद्रोहियों का दमन करता लेकिन उसने विद्रोहियों का सहयोग दिया और उनका नेतृत्व किया। उसने मेरठ के आसपास के गुर्जरों के गांवों में संदेश भिजवा कर मेरठ जेल पर हमला करने की योजना बनाई। अंग्रेजी शासन को पता नहीं चला कि स्वाधीनता की चिंगारी उन के जिला प्रशासन पुलिस विभाग के कोतवाल के मस्तिष्क में भी घर कर गई है। 30000 गुर्जर, घाट पांचाली पांचाली के चपराने, सीकरी के चन्दीले, नंगला व भौपरा के कसाने गुर्जर व अन्य जातियों के ग्रामीण एकत्र होकर मेरठ पहुंचे। कोतवाल धनसिंह गुर्जर उनके स्वागत के लिए प्रतीक्षा कर रहा था ।

क्रांतिकारियों का स्वयं कोतवाल साहब ने किया था स्वागत

कोतवाल धनसिंह ने इन आजादी के दीवानों की सेना का रामराम करके स्वागत किया और उनसे पूछा कि क्या चाहते हो? उसने अपनी ओर से लोगों से कहा कि-‘मारो फिरंगी को और देश को आजाद कराओ।’ हनुमान की जय बोलकर इन सिरफिरे देशभक्तों की सेना कोतवाल धनसिंह के घोड़े के पीछे-2 चल दी, वह पुलिस जो इनके विशाल दल को रोकने के लिए तैनात थी, वह भी अपने कोतवाल के पीछे पीछे चल पड़ी। इन्होंने पहला धावा मेरठ की नई जेल पर बोल दिया। इन्होंने जेल से 839 कैदियों को मुक्त कराया और वे भी मुक्त होकर स्वतंत्रता सेनानियों के इस दल के साथ मिल गए और अंग्रेेजों की मेरठ जेल तोड़ दी । वहां से यह भीड़ मेरठ शहर और सिविल लाइन में घुस गई और अंग्रेज अधिकारियों के बंगलों को आग लगाना और उन्हें मारना शुरू कर दिया।
उधर, तीसरे रिसाले का रिसालदार अपने सिपाहियों को लेकर 20 इन्फैक्टरी के शस्त्रागार पर पहुंचा और वहाँ से शस्त्र लेकर अपने 90 आदमियों को मुक्त कराने के लिए जेल पर पहुंचा । वहां पर उसने अपने साथियों की हथकड़ी व बेडिय़ां कटवाकर मुक्त कराया और धन सिंह कोतवाल की देश भक्त सेना में शामिल करा दिया । इस प्रकार नई और पुरानी दोनों जेलें तोड़ दी गईं, नगर का प्रशासन अब धनसिंह कोतवाल के हाथ में था। अंग्रेज अफसर मारे गये या उन्हें कैद कर दिया गया, या उन्हें अपने मित्रों के यहां जाकर छिपना पड़ा, मेरठ छावनी और शहर में अंग्रेजी राज का आतंक व सिक्का समाप्त करके क्रान्तिकारी मेरठ से दिल्ली के लिए चल पड़े और अगले दिन दिल्ली सम्राट बहादुरशाह जफर के दरबार में पहुंच गए । रास्ते में हिण्डन नदी पर गुर्जरों और अंग्रेंजो की डट कर लड़ाई हुई। दिल्ली खबर पहुंचने पर मेरठ के लिए अंग्रेज सेना हिन्डन नदी पर पहुंच गई थी। वहाँ बड़ी भारी संख्या में नरसंहार हुआ लेकिन ये वीर भारत माता को फिरंगी से मुक्त कराने के लिए शहीद हो गए।

क्या कहता है – मेरठ गजेटिययर

‘मेरठ गजेटियर’ के कुछ अंश इस सम्बन्ध में इस प्रकार हैं-मेरठ छावनी के निकटवर्ती गुर्जरों के गांवों का साहस इतना बढ़ गया था कि उनके विरूद्ध कार्यवाही करना आवश्यक था। पुलिस अधिकारी मेजर विलियन व एक बोलिन्टयर कोर बनाई जिसमें सभी यूरोपियन थे । इसमें 45 घुड़सवार 11 फौजी, 8 प्लाटून, 38वीं इन्फेन्टरी, 2 सारजेंट व 2 तोपें और सैनिक विशेषज्ञ लेकर 4 जुलाई 1857 को सबसे पहले मेरठ के आसपास के गांवों पर अचानक हमला किया गया । इसमे मुख्य गांव घाट पाचंली और नंगला आदि थे । इन गांवों के निवासी उपद्रव के लिए विशेष प्रसिद्धि प्राप्त कर गए थे । प्रात: चार बजे तीन गांवों को घेर लिया गया, अधिकांश व्यक्ति मारे गए 46 कैद कर लिए गए । जिसमें से 40 को तुरन्त फांसी के फंदे पर लटका दिया गया । पशु व सामान छीन लिए गए और सभी गांवों को आग लगा दी गई, फिर दोबारा-तिबारा खाकी रिसाला इन्हीं गांवों में गया और उचित सजायें पुन: दी गईं। सीकरी गांव में भी यही भयानक कांड किया गया और गांव फूंक दिया गया । 30 आदमियों को फांसी दी गई और शेष की हत्या की गई । मेरठ जिले के अन्य गांवों के साथ भी यही व्यवहार किया गया।
वास्तविकता यह है कि पांचली गांव के 80 गुर्जरों को फांसी दी गई और 400 गुर्जरों को गोलियों से उड़ाया गया था। इन सबकी जमीन व जायदाद जब्त कर ली गईं। देश की स्वाधीनता के पश्चात जब प्रधानमंत्री श्रीमति इन्दिरा गांधी से मिल कर पांचली के नेता व सरपंच भूलेसिंह गुर्जर आदि ने पांचली गांव के बलिदानों की यशोगाथा सुनाई तो इन्दिरा गांधी जी ने उत्तर प्रदेश सरकार से पांचली की जमीन इसके वारिसों को वापिस दिलवाई। हरियाणा में फरीदाबाद के समीप फतेहपुर चंदीला गुर्जरों का गांव है-यहं का टूंडा चन्दीला गुर्जर उन दिनों सीकरी गांव मेरठ गया हुआ था वहां भी चंदीला गांव के गुर्जर आबाद हैं। जब दमन चक्र आरंभ हुआ तो उसे भी मेरठ में गोली से उड़वाया गया था।
टूंडा गुर्जर बड़ा देश भक्त व्यक्ति था। वह जहां कहीं भी पंचायतें होतीं उनमें सम्मिलित होता था। उन दिनों भी वह किसी सार्वजनिक कार्य से अपने सगोत्र बन्धुओं से मिलने गया था और वहीं इस क्रान्ति में सम्मिलित हो गया था। 31 मई 1857 को एक बार पुन: गाजियाबाद में हिन्डन नदी के तट पर अंग्रेज सेना के साथ युद्ध हुआ था, जिसमें मिर्जा मुगल, वलीदाद खां पठान मालागढ़ तथा उसके सेनापति इन्द्र सिंह गुर्जर दादरी के भाटी व नागडी गुर्जरों ने भाग लिया था। इनके अतिरिक्त आसपास के गांवों के अन्य जातियों के देशभक्त लोग अपने हथियार लेकर सम्मिलित हुए और बड़ी संख्या में शहीद हुए थे। आज हम अपने उन सभी नाम अनाम शहीदों को नमन करते हैं जिनके कारण हमें स्वाधीनता के ये सुनहरे दिन देखने को मिले हैं।
10 मई 1857 को मेरठ से इस क्रांति का जब बिगुल बजा तो इस स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी पूरे भारतवर्ष में बहुत ही शीघ्रता के साथ फैल गई और प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के यह सैनिक 11 मई 1857 को तत्कालीन मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर से मिले और उन्होंने बहादुर शाह जफर को नेतृत्व संभालने के लिए आग्रह किया । लेकिन तत्समय भारत पर शासन करने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी पराजय के बाद शीघ्रता से कार्यवाही कर क्रांतिकारियों का दमन करते हुए सत्ता पर अपनी पकड़ बनाने का प्रयास किया। जिसे इतिहास में प्रति क्रांति के नाम से जाना जाता है ।

अंग्रेजों में मच गई थी अफरा-तफरी

दिल्ली में अंग्रेज अपने आपको बचाने के लिए कोलकाता गेट पर पहुंच गए । यमुना किनारे बनी चुंगी चौकी में आग लगाए जाने और टोल कलेक्टर की हत्या की जानकारी मिलने के बाद दिल्ली में तैनात लगभग सभी प्रमुख अंग्रेज तथा अधिकारी अपने नौकरों सहित कोलकाता गेट पहुंच गए। कोलकाता गेट यमुना पार कर दिल्ली आने वालों के लिए सबसे नजदीकी गेट था । 11 मई को सुबह मेरठ से क्रांतिकारी सैनिकों के दिल्ली में प्रवेश करने के बाद अंग्रेज इस बात को सोचने के लिए विवश हो गए कि क्रांतिकारी फिर इसी गेट से दिल्ली में घुसने का प्रयास करेंगे । इसलिए यहां अतिरिक्त फौजी तैनाती का हुक्म दिया गया । आज के यमुना बाजार के निकट कोलकाता गेट हुआ करता था । लेकिन आज वहां पर उपलब्ध नहीं है , क्योंकि बाद में जब अंग्रेजो के द्वारा रेलवे लाइन यहां से निकाली गई तो वह गेट तोड़ना पड़ा था।
11 मई 1857 को दिल्ली के ज्वाइंट कमिश्नर थियोफिलस मैटकॉफ जान बचाकर भागे थे । कोलकाता गेट के पास क्रांतिकारी सिपाहियों के साथ हुई मुठभेड़ के बाद कैप्टन डग्लस और उसके सहयोगी भागते हुए लालकिले के लाहौरी गेट तक पहुंचे थे । उसके बाद दिल्ली में जो स्थितियां पैदा हुईं उसमें अंग्रेजों को जान के लाले पड़ गए । जिसे जहां अवसर प्राप्त होता था, वहीं वह हमला कर देता था
। अंग्रेजों को इससे बचने के लिए जगह जगह शरण लेनी पड़ी।

दादरी सिकंदराबाद के लोग भी कूद पड़े थे क्रांति में

दादरी जिला बुलंदशहर में एक छोटी सी रियासत हुआ करती थी ।दादरी के अलावा कठेड़ा, बढ़पुरा, चिटेहरा,बील अकबरपुर,नगला नैनसुख सैंथली,लुहार्ली , चीती , देवटा आदि गांव के क्रांतिकारियों ने एकजुट होकर अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए बिगुल बजाया था । दादरी राव दरगाही सिंह की रियासत हुआ करती थी , जिनकी मृत्यु 1819 में हो गई थी। उनका बेटा राव रोशनसिंह था तथा राव उमराव सिंह ,राव विशन सिंह, राव भगवंत सिंह उनके भतीजे इस प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुए थे । जिन्होंने अंग्रेजी सेना को बुलंदशहर की तरफ से कोट के पुल से आगे नहीं बढ़ने दिया था। दिल्ली में बादशाह जफर से मिलकर उनके नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध लड़ा ।बुलंदशहर जिले में ही एक छोटा सा मालागढ़ ग्राम होता था । जिसका नवाब वलीदाद खान था, जो बहादुर शाह जफर का रिश्तेदार था, राव उमराव सिंह ,रोशन सिंह ने तोपखाना से 30 व 31 मई को गाजियाबाद के हिंडन नदी के पुल पर अंग्रेज सेना को दिल्ली जाने से रोका था । जहां पर अंग्रेजों की कब्रें आज भी बनी हुई है ।यह कार्यवाही नवाब वलिदाद खान मालागढ़ और दादरी के रियासतदार राव उमराव सिंह के नेतृत्व में हुई थी।
अंग्रेजी सेना के काफी सैनिक एवं अधिकारी वहां पर मारे गए थे और अंग्रेजी सेना वहां से भागकर मेरठ की तरफ गई और मेरठ से उन्हें दिल्ली के लिए बागपत के रास्ते से आए थे । बागपत के रास्ते पर पढ़ने वाले एक जाति विशेष के गांवों के लोगों ने क्रांतिकारियों के साथ विश्वासघात करते हुए अंग्रेजों को शरण दी तथा दिल्ली जाने के लिए अंग्रेजों का रास्ता सुगम किया।
यह एक बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि दादरी के इन शहीदों को इतिहास में उचित स्थान नहीं मिला।
क्रांतिकारियों ने सिकंदराबाद के पास अंग्रेजी सेना का खजाना लूट लिया । गुलावठी के पास दो दर्जन अंग्रेज सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया । उनके 90 घोड़े छीन लिए । अलीगढ़ से दादरी और गाजियाबाद तक क्रांतिकारी अंग्रेजों के सामने कठिन चुनौती पेश करते रहे इस सबसे नाराज होकर अंग्रेजों ने एक दिन रात में दादरी रियासत पर हमला कर दिया।
जिसमें कई क्रांतिकारी शहीद हुए।
अंग्रेज जितना अपनी नींव को भारतवर्ष में जमाने का प्रयास कर रहे थे , उतना ही भारतीय जनता उनके खिलाफ हो रही थी । इसका प्रभाव राजपूताना क्षेत्र में नसीराबाद , देवली , अजमेर , कोटा , जोधपुर आदि जगहों पर भी देखने को मिला था । राजपूताना में उस समय अट्ठारह रजवाड़े थे और वे सभी देशी शासक अंग्रेज राज्य के प्रबल समर्थक थे , फिर भी यहां के छोटे जागीरदारों एवं जनता का मानस अंग्रेजों के विरुद्ध था , जिसके फलस्वरूप मेरठ में हुई क्रांति का प्रभाव पड़ा।
मारवाड़ के तत्कालीन महाराजा तखत सिंह व कोटा के महाराव रामसिंह दोनों अंग्रेज भक्त थे। फिर भी मारवाड़ में आउवा के ठाकुर कुशल सिंह के नेतृत्व में 8 सितंबर को तथा कोटा में लाला जय दयाल एवं मेहराब खान पठान के नेतृत्व 15 अक्टूबर 1857 को मारवाड़ में अंग्रेज सरकार के विरुद्ध विद्रोह भड़क गया था।
तत्कालीन अंग्रेज मेजर बर्टन चाहता था कि महाराज अपनी सेना में विद्रोह फैलाने वाले जय दयाल आदि 57 अफसरों को गिरफ्तार कर उन्हें दंडित करें अथवा उन्हें अंग्रेजों के हवाले कर दिया जाए । 14 अक्टूबर को मेजर बर्टन दरबार से मिलने गढ़ में गए और पुनः अपनी बात दोहराई । महाराव रामसिंह भी अंग्रेज भक्ति और सेना के विद्रोही रुख को भी भली-भांति पहचानते थे , फिर भी यह उनके वश में नहीं था कि वह जयदयाल कायस्थ और मेहराब आदि सेनापतियों को गिरफ्तार करके उन्हें दंड दे सके। इसलिए उसने मेजर बर्टन की राय नहीं मानी। लेकिन बर्टन की इस राय के जाहिर होने पर फौज भड़क उठी और 15 अक्टूबर 1857 को एकाएक सेना और जनता ने एजेंट के बंगले को चारों ओर से घेर लिया। वह कोटा नगर के बाहर नयापुरा में मौजूद कलेक्ट्री के पास स्थित वर्तमान बृजराज भवन में रहता था। विद्रोहियों ने एजेंट के बंगले पर 4 घंटे तक गोलाबारी की ।बाकी लोग सीढी लगाकर बंगले में घुस गए। वह छत पर पहुंचे और मेजर तथा उसके दोनों पुत्रों को तलवार से मौत के घाट उतार दिया।
87 क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने बुलंदशहर चौराहे पर कत्लेआम अर्थात कालाआम के पेड़ पर लटका कर फांसी दी । जिसमें उस समय के बुलंदशहर और मेरठ जनपद के अनेकों गांवों के लोगों को भी यत्र तत्र फांसी के फंदे पर लटका दिया गया था। स्वयं लेखक के पूर्वज चौधरी सुलेखा सिंह को भी इसी समय फांसी पर लटकाया गया था। कवि ने कितने अच्छे शब्दों में कहा है कि :-

स्वतंत्रता रण के रणनायक अमर रहेगा तेरा नाम।
नहीं स्मारक की जरूरत खुद स्मारक तेरा नाम ।।
मां हम फिदा हो जाते हैं विजय केतु फहराने आज।
तेरी बलिवेदी पर चढ़कर मां जाते शीश कटाने आज।।

( लेखक पश्चिमी उत्तर प्रदेश विकास पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राष्ट्रवादी समाचार पत्र ‘उगता भारत’ के चेयरमैन हैं)

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