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सुद्युम्न आचार्य

विन्ध्य की पावन धरा में हजारों वर्षों तक अपने पूरे गौरव, वैभव के साथ भरहुत स्तूप विराजमान रहा था। अपनी उत्कृष्ट कला, प्रतीक सौन्दर्य के लिये यह चहुँ ओर प्रख्यात रहा था। यह षट्पथ पर अवस्थित था। इससे उश्रर तथा दक्षिण की ओर कम से कम छह रास्ते विभिन्न जनपदों की ओर जाते थे। अत: वाणिज्य व्यापार का आवागमन यहां से होकर होता था। आचार्य चतुरसेन के शब्दों में प्रतिदिन सैकड़ों सार्थवाह विभिन्न सामानों से लदे हुए चूँ-चूँ करते हुए शकटों के साथ आते जाते थे। साथ ही पर्येषणा करने वाले भिक्खु, भदन्त, साधु आचार्य धर्माेपदेशक अपनी यात्रा के लिये निरन्तर अग्रसर रहते थे।
यहां चुनार के लाल पत्थर पर छैनी और हथौड़ी जैसे सामान्य उपकरणों से विविध दृश्यों को उकेरने में लोगों की निपुणता की कोई सीमा नहीं थी। कला के पारखी लोग यहां श्रावस्ती, बोध गया जैसे सुदूर देशों से आए हुए मंजे हुए कलाकारों के हुनर के साथ साथ ग्रीस की कला का प्रभाव भी देखते हैं। यहां प्रमुखत: बौद्ध जातक कथाओं के दृश्य तथा समकालीन ऐतिहासिक घटनाएँ अभिचित्रित हुई हैं। साथ ही उस समय की परम्पराएं, लोक-जीवन भी कलाकारों के हस्त कौशल के द्वारा पत्थर पर जीवन्त हो उठी है, मानो बोलने लगी है। सचमुच, उस समय की मान्यताओं को सदा सुरक्षित रखने के लिये पत्थर पर उकेरने से बढिय़ा कोई उपाय नहीं हो सकता था।
भरहुत स्तूप की स्थापना के समय विन्ध्य में बौद्ध संस्कृति नई नई आई थी। फिर भी सम्राट अशोक के महान उद्योग से यहां इस स्तूप के निर्माण हुआ और इस कारण यहाँ बौद्ध संस्कृति को दृढ़ आधार प्राप्त हुआ। आज हम इस स्तूप के अध्ययन से ऐसे तथ्यों को जान पाते हैं, जिन्हें लिखित इतिहास के पृष्ठों से नहीं जाना जा सकता।
मौर्य युग की समाप्ति के पश्चात् यहां वैदिक संस्कृति को स्वीकार करने वाले शुंग वंश का शासन आया। उसके पश्चात् गुप्त युग तो हिन्दू कला, संस्कृति के उत्थान का स्वर्ण युग कहा जाता है। परंतु उन कालखंडों में भी बौद्ध संस्कृति की प्रतिमाओं को बिल्कुल भी नहीं हटाया गया। केवल उनके साथ आर्य संस्कृति के दृश्यों को जीवन्त रूप से जोड़ दिया गया।
इस प्रकार की घटनाएं समकालीन सांची तथा सारनाथ के अन्य स्तूपों में नहीं पाई जातीं। जहां हम सांची आदि में केवल बौद्ध घटनाओं को प्रतिबिम्बित पाते हैं, वहां इसके विपरीत भरहुत में कम से कम एक चौथाई दृश्य वैदिक संस्कृति में ढला हुआ पाते हैं। इस प्रकार भरहुत स्तूप इस धारा को प्रदर्शित करने का भी एक सुन्दर माध्यम बन सका है। इससे हम इस स्तूप में देश की सामाजिक संस्कृति के दर्शन कर पाते हैं। यह केवल भरहुत की विशेषता है कि यहां वेदविरोधी एक भी दृश्य नहीं, परन्तु वैदिक धारा को निरूपित करने वाले अनेक दृश्य हैं। इस प्रकार भरहुत वैदिक तथा बौद्ध संस्कृतियों के परस्पर सद्भाव और मिलन का एक बड़ा प्रमाण है।
यह स्तूप यहां अत्यन्त घने जंगलों से घिरे प्रदेश के बीच में अत्यन्त ऊँचे गगनचुम्बी सौंध के रूप में स्थापित था। इसका विकास प्रत्येक युग में हुआ। सुदूर इलाकों के धनपतियों के दान से विविध स्तम्भ निरन्तर निर्मित होते रहे। यह बात इन स्तम्भों के साथ दान की सूचना देने वाले अभिलेखों से प्रमाणित होती है। इनके अनेक दृश्य तथा अभिलेख हमारी उस अवधारणा को तोड़ते हैं, जिन्हें हमने सदियों से पाल रखा है। उदाहरणत: हमारा यह विश्वास है कि मध्य युग में कन्याओं को नहीं पढ़ाया जाता था। परन्तु भरहुत के एक सुन्दर दृश्य में एक तपस्विनी चित्रित है, जो कन्याओं को पढ़ा रही है। इसमे अभिलेख भी अंकित है कि’ दीर्घतपसी श्रमणा अनुशासति।
यह बहुत बड़े दुर्भाग्य का विषय है कि लगभग 15वीं शताब्दी में यह सुन्दर स्तूप ध्वस्त हो गया। तब इसकी अनेक मूर्तियां नष्ट हो गई अथवा विन्ध्य से बाहर ले जाई जाने लगीं। 18 वीं शताब्दी में इसकी अधिकांश मूर्तियां कोलकाता में स्थानान्तरित कर दी गईं। इन मूर्तिचित्रों को इसके मूल स्थान विन्ध्य भूमि में प्रदर्शित करने के लिये यहां के वेद वाणी वितान नामक शोध संस्थान में दसियों वर्षों के कठिन परिश्रम से भरहुत चित्रकला एवं मूर्तिकला संग्रहालय की स्थापना की गई। इसके अन्तर्गत सैकड़ों फोटोग्राफ, ड्राइंग, पेंटिग के साथ विशालकाय नवनिर्मित अतिसुन्दर अनुकृतियों को प्रतिष्ठित किया गया है। इसके माध्यम से भरहुत की बौद्ध आर्य संस्कृति को प्रदर्शित करने का उपक्रम किया गया है।
उदाहरण के लिये भरहुत में उत्तर दिशा के अधिपति के रूप में पहली बार कुबेर का चित्रण हुआ है। यहां कुपिरो यखो, अर्थात् कुबेर: यक्ष: यह अभिलेख भी है। इससे इसका कुबेर होना स्पष्ट प्रमाणित है। इसके साथ ही यहां अति कमनीय कुबेर पत्नी भुंजरी को भी चित्रांकित किया गया है। यह अधिकतम सुन्दर अलंकारों से तथा सुन्दर परिधान से सुशोभित नवयौवन सचमुच धन की के समान प्रतीत होती है। इसे मूर्ति में नरवाहन के रूप में चित्रित किया गया है। यह मनुष्य की हथेली पर उसकी सवारी करते हुए खड़ी है। नववाहन की अभिकल्पना कालिदास के काव्यों में भी प्राप्त होती है। इससे प्राचीनकाल से चला आ रहा यह विश्वास प्रमाणित होता है कि लक्ष्मी मनुष्य के पीछे नहीं भागती अपितु मनुष्य ही लक्ष्मी के पीछे भगता है। यह वह उसकी सवारी करती है।
वैदिक संस्कृति में धन की अधिपति लक्ष्मी के रूप में सुपूजित है। यह सुखद सौभाग्य का विषय है कि भरहुत में इस लक्ष्मी का भी चित्रांकन किया गया है। यह ठीक प्रचलित हिन्दू मान्यता के अनुरूप है। यह अतिसुन्दर रीति से कमल-कलश में सम्प्रतिष्ठित है। दोनों ओर दो हाथी इसका अभिषेक कर रहे है। यह सुन्दर अलंकार तथा राजमुकुट से सुशोभित है। कम से कम दो हजार वर्ष पूर्व की यह रचना आज की हिन्दू मान्यता के ठीक अनुरूप प्रतीत होती है।
भरहतु में वैदिक युग में सुपूजित श्री देवी का भी अतिसुन्दर मूर्तिचित्र प्राप्त होता है। ऋग्वेद के खिल सूक्त के अनेक मन्त्रों में श्री देवी की स्तुति प्राप्त होती है। वहां पर इस देवी का जिन विशेषणों के साथ वर्णन किया गया है। उन सभी को इस मूर्ति में समविष्ट किया गया है। यह मूर्ति इतनी सुन्दर है कि अंग्रेज पुरातत्वविद् कनिंघम ने अपने ग्रन्थ में इसे रिस्टोर किया है। इससे इसका सौन्दर्य और अधिक खिल उठा है। यह प्रसन्नता का विषय है कि वेद वाणी वितान में स्थापित म्यूजिय़म में इन सम्पूर्ण विशेषताओं के साथ अतिसुन्दर अनुकृति धौलपुर के लाल पत्थर में तैयार कराई गई है। सचमुच, यह प्राचीन श्री देवी का सही स्मारक है।

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