बस्तर के इतिहास पर गहरी छाया है रामायण की

images (43)

राजीव रंजन प्रसाद

रामायण को ले कर प्रगतिशील कहे जाने वाले समाज के अपने पूर्वाग्रह हैं तथा उसके बीच अंतर्निहित अतीत की ओर कोई शोध भरी दृष्टि से देखने का जोखिम नहीं उठाना चाहता। धार्मिक समाज भी मन की गुफाओं में प्रसन्न है; वह सदियों से स्थापित कविता की कल्पनाशीलता से बाहर नहीं आना चाहता तथा घटना के उपर आरोपित बिम्बों को पृथक करने का प्रयास नहीं करता। आज जब हम यह रटते इतराते रहते हैं कि ‘साहित्य समाज का दर्पण है तो फिर प्राचीन अतीत के साहित्य को खारिज करते हुए क्या एक पूरे कालखण्ड का दर्पण तोडने का दुस्साहस हमारे ही पूर्वाग्रहों का नहीं है? वस्तुत: तर्क की आड़ में प्राचीन कविता के आलंकारिक तत्वों की पूर्णत: अवहेलना कर के हमने मिथक और इतिहास को पृथक-पृथक करने का कार्य अब भी मनोयोग से नहीं किया है। हमें मध्यकालीन चारण-भाटों की नृप-स्तुतियों में तो इतिहास नजर आता है और अतिश्योक्तियों में भी प्रमाण तलाशने का दावा कर लिया जाता है किंतु पुरा अतीत को सम्प्रदाय विशेष की मनोभ्रांति कह कर खारिज कर देते हैं। हमारी यह वृत्ति हमें एक दिन बहुत भारी पडऩे वाली है।

बस्तर के रामायणकाल पर बात करने से यह भूमिका इसलिये क्योंकि दण्डकारण्य क्षेत्र की उपेक्षा इतिहास अन्वेषण ही नहीं धार्मिक महत्व, दोनो ही दृष्टियों से हुई है। विचारधारावादी इतिहासकारों का यदि बस चले तो जर्मनी या पोलैंड से किसी सोच का ताला बस्तर की पुरातनता पर जड कर निश्चिंत ही हो जायें और वापस मुगल सल्तनत पर अपने अध्ययन में व्यस्त दिखने लगें।

धर्म के झंडाबरदारों को भी या तो अयोध्या नजऱ आती है या श्रीलंका किंतु उस बस्तर अथवा दण्डकारण्य की धार्मिक महत्ता पर मौन किसलिये जब कि हनूमान भी इसी धरती ने दिये चूंकि किष्किन्धा राज्य के दण्डकारण्य में होने के प्रमाण मिलते हैं, राम के वनवास का दस वर्ष से अधिक समय यहीं के जंगलों में गुजरा है तथा उन्होंने गोदावरी नदी के पास जिस पंचवटी में वनवास काल बिताया था वह स्थान भी दण्ड़कारण्य में ही है। राम विंध्य पार कर दण्ड़कारण्य आये, उन दिनों यह क्षेत्र सभ्यता का बड़ा केंद्र भी हुआ करता था। अगस्त्य, सुतीक्ष्ण, शबरी, शम्बूक, माण्डकर्णि, शरभंग आदि ऋषि-मुनियों की यही कर्मस्थली रही है। तब शूर्पणखा, खर, दूषण, त्रिशिरा, अकम्पन, मारीच जैसे बलशाली राक्षस दण्ड़कारण्य में ही रहा करते थे और रावण की मर्यादा से बंधे हुए थे। सीता का रावण के द्वारा अपहरण भी दण्डकारण्य में ही हुआ तथा जटायु ने भी इसी पावन धरती पर प्राण त्यागे। सुग्रीव को राज्य दिला देने के बाद थोड़े समय के लिए राम जिस प्रस्त्रवण पर्वत पर रहने लगे थे वह स्थान भी दण्डकारण्य में ही है।

प्राचीन समय के साहित्य से उस समाज की कल्पना करना हो तो हमें एक पूरा भूगोल गठित करना होगा जिसके साथ साथ मिथक कथा की यात्रा चल रही है। जनश्रुतियों, मुहावरों तथा लोकगीतों के पास भी ठहर कर बैठना होगा तभी किसी क्षेत्र की पुरातनता के प्रमाण दबे पाव आपकी ओर पहुँच सकते हैं। आईये वर्तमान में अतीत की कुछ आहट तलाशते हैं। दण्डकारण्य और बस्तर की साम्यता कहता बस्तर के काकतीय शासक दिक्पाल देव का एकशिलालेख दंतेवाडा से प्राप्त हुआ है जो दण्डकारण्य क्षेत्र में बस्तर राज्य होने की घोषणा करता है –

‘दण्डकारण्य निकट वस्तर देशे राज्यं चकार। (1703 ई.)

इक्ष्वाकु वंशीय राजा दण्ड के बस्तर सेत्र में शासन करने फिर उनके पतन की कहानी इन क्षेत्रों से जुडती है। इसी आलोक में बस्तर के ही प्राचीन दण्डकारण्य क्षेत्र होने का एक जीवित साक्ष्य हैं ‘दण्डामि माडिया आदिवासीÓ जो अबूझमाड के पर्वतीय क्षेत्रों से लगे मैदानों में आज भी निवास करते हैं। पहचान के साथ जुडा दण्डामि शब्द तथा मैदान क्षेत्र को आवास के लिये चुनना उनके एक समय के सांस्कृतिक परिवर्तन का हिस्सा होने को प्रमुखता से सत्यापित करता है। इसका सम्बन्ध उस काल के राजा दण्ड के शासन की स्मृतियों से प्रतीत भी होता है। इतिहासकार डॉ. हीरालाल शुक्ल रतनपुर शिलालेख में उद्धरित दण्डकपुर का सम्बन्ध नारायणपुर तहसील के तन्नामक ग्राम से जोडते हैं इतना ही नहीं दण्डवन नाम से आज भी छोटे डोंगर के निकट के वन, बेडमाकोट के निकट के जंगल अथवा कोण्डागाँव के निकट के कुछ वन क्षेत्र आदिम समाज के बीच भी जाने जाते हैं। नारायणपुर के समीपस्थ क्षेत्रों में कसादण्ड, गौर दण्ड, बघनदण्ड जैसे गाँव भी मिलते हैं जिनमें उपसर्ग की तरह चिपका दण्ड शब्द प्राचीनता एवं एतिहासिकता की ओर ही इशारा करता है।

प्राचीन ग्रंथों में दण्ड़कारण्य क्षेत्र की दक्षिणी सीमा गोदावरी और शैवल पर्वत मानी गयी है जबकि पूर्वी सीमा कलिंग तक जाती है। महानदी इसकी उत्तरी सीमा बनाती है तथा रामायण-काल में इस क्षेत्र की पश्चिमी सीमा विदर्भ जनपद से मिल जाती थी। इस तरह संपूर्ण वर्तमान बस्तर तथा आस-पास के कुछ क्षेत्र ‘प्राचीन बस्तर या दण्डकारण्यÓ कहे जा सकते हैं। वाल्मीकी रामायण का अरण्य काण्ड वस्तुत: प्राचीन बस्तर अथवा दण्डकारण्य के इतिहास-भूगोल के दस्तावेजीकरण की तरह भी देखा जा सकता है। उदाहरण के लिये वाल्मीकि रामायण में दो मंदाकिनी नदियों का उल्लेख मिलता है। अरण्यकाण्ड में उल्लेखित मंदाकिनी नदी अयोध्याकाण्ड की उल्लेखित मंदाकिनी नदी से पूर्णत: भिन्न हैं। अरण्यकाण्ड की मंदाकिनी अत्रि, शरभंग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्य के आश्रम से महिमामंडित दंडकारण्य़ की मंदाकिनी है; वायुपुराण में इसी मंदाकिनी का उल्लेख इन्द्रनदी के नाम से भी हुआ है जिसे वर्तमान में इन्द्रावती के नाम से जाना जाता है।

लेखक तथा स्वतंत्रता सेनानी पंडित सुन्दरलाल त्रिपाठी नें बस्तर के भूगोल को निरूपित करने के लिये वाल्मीकी रामायण से राम के राज्याभिषेक के समय का एक प्रसंग उद्धरित किया है जहाँ मंथरा कैकेयी को याद दिलाती है कि अयोध्या से दक्षिण में दण्डकारण्य का क्षेत्र है जिसके निकट वैजयंतपुर में असुर राजा तिमिराध्वज राज करते हैं। दण्डकारण्य के भूगोल को कालांतर में भास नें अपने नाटक ‘प्रतिभाÓ, कालिदास नें ‘मेघदूतÓ तथा भवभूति नें ‘उत्तर रामचरितÓ में स्पष्ट किया है।

रामायणकाल का वर्णन करते ग्रंथों में साल वन, पिप्लिका वन, मधुबन, केसरी वन, मतंगवन, आम्रवन आदि का वर्णन स्थान स्थान पर मिलता है यही वर्तमान बस्तर के भी प्रमुख पादप-वृक्ष-वनसमूह हैं।

बस्तर की स्थानीय परम्पराओं तथा स्थलों के नाम भगवान राम के साथ संबंध स्थापित करते हैं। इसका उदाहरण बस्तर क्षेत्र में शबरी नदी, रामगिरि पर्वत, चित्रकूट; नारायणपुर तहसील स्थित कोसलनार, राममेंटा, रामपुरम, रामारम, लखनपुरी, सीतानगर, सीतारम, रावणग्राम आदि हैं (वी डी झा, उपरिवत 1982, पृ 11-12)। अर्थात् वैदिक साहित्य में उल्लेखित शव विसर्जन तथा कब्र निर्माण विषय निर्देशो का अक्षरक्ष: पालन करने वाले अबूझमाडिय़ा एवं दण्डामि माडिय़ा वैदिक आर्यों के सम्पर्क में आये थे तथापि उन्होंने अपनी मूल परम्पराओं को जीवित रखा। पं. गंगाधर सामंत नें बस्तर क्षेत्र को रावण का उद्यान कहा है। उन्होंने भी माडिय़ाओं को बस्तर की प्राचीनता से निवास कर रही जनजाति निरूपित किया है। वे भी गोदावरी नदी, श्रीराम गिरि और शबदी नदी के अंतर्सम्बन्ध को राम के वनवास क्षेत्र से ही जोड कर देखते हैं। गंगाधर सावंत रावण और बस्तर क्षेत्र में उसके निरंतर आगमन को सिद्ध करने के लिये एक जनश्रुति का सहारा लेते हैं। वे कहते हैं स्थानीय लोग गिद्ध पक्षी को ‘रावनाÓ कहते हैं संभवत: वे तब पुष्पक विमान से साम्यता, आकार व उसके रावण का वाहन होने के कारण एसा कहने लगे होंगे।

रामायणकालीन बस्तर निश्चित ही दो संस्कृतियों के प्रयाग का समय रहा। यह आर्यों का पुनरागमन काल था। चूंकि ऐसा प्रतीत होता है कि इक्ष्वाकु वंश के शासक दण्ड को शुक्राचार्य नें अपनी पुत्री से बलात्कार किये जाने से क्रोधित हो कर माडियाओं के सहयोग से वन्य क्षेत्र से खदेड दिया तथा उसके शासन प्रतीकों को आग के हवाले कर के क्षेत्र को निरा अरण्य बना दिया होगा। इसके बाद जितनी भी ज्ञात घटनायें हैं उनके कवितातत्वों को अलग करने के पश्चात ऋषि अगस्त्य के विन्ध्य पार कर के दक्षिणापथ आने तथा सर्वप्रथम यहाँ आश्रम के संचालन का उल्लेख मिलता है। आर्यों के आगमन की अगली आहट राम के कदमों के साथ ही आरंभ होती है। एक अन्य महत्वपूर्ण संदर्भ जो समझ आता है कि राम नें केवल युद्ध का मार्ग नहीं चुना अपितु संधि के मार्ग का ही अधिकतम उपयोग किया। रामायण में वर्णित तत्कालीन बस्तर की कई जनजातियों को प्रतीकों के माध्यम से श्लोको/काव्यग्रंथों में स्थान मिला है जैसे गीध (वर्तमान गदबा जनजाति से साम्यता); शबरी (शबर/ बोंडो परजा जनजाति); वानर, भालू आदि। इस संभी प्रतीकों में सहसम्बद्ध एवं वर्णित गुणों को वर्तमान की उपस्थित जनजातियों में अथवा उनके गोत्र चिन्हों की पहचान को सामने रख कर भी देखा जा सकता है। राम का युद्ध खर दूषण से हुआ; राम और रावण (दो भिन्न संस्कृतियों) के बीच एक बडे युद्ध की रूपरेखा जो दण्डकारण्य में तैयार हुई वह पूरी तरह से आर्य-द्रविड संघर्ष या इस तरह के किसी तर्क का अक्षरक्ष: सत्य आख्यान नहीं माना जा सकता। चूंकि रावण से युद्ध करने वाली राम की सेना दण्डकवन और निकटवर्ती आम जनजातियों की निर्मित थी। यह उस काल के जटिल समाजशास्त्र को समझने का पहलू मात्र है कि राम शबरी के बेर ही नहीं खाते अपितु शबर जनजाति के साथ प्रेम का संबंध गठित कर लेते हैं। राम के लिये जटायु मित्र हैं और जटायु की वर्णित सभी विशेषताये बस्तर की गदबा जनजातियाँ धारण करती हैं। राम सुग्रीव का साथ ही नहीं देते अपितु वानर-भालू के प्रतीक धारण करने वाली शक्तिशाली जनजातियों से मित्रता भी हासिल कर लेते हैं। राम दण्डक प्रवास के दौरान कुछ सेनाओं से भी युद्ध करते हैं जिसके लिये आम जनजातियाँ ही उनकी सहयोगी होती हैं। डॉ. हीरालाल शुक्ल लंका को भी गोदावरी डेल्टा में ही निरूपित करते हैं।

रामायण में वर्णित वानर कौन थे, यह विवाद का विषय रहा है। कई विद्वान मुण्डा जनजातियों से उन्हें जोड़ कर देखते हैं तो कुछ विद्वानों ने छत्तीसगढ की ही उराँव जनजाति को रामायणकालीन वानर माना है। डॉ. हीरालाल शुक्ल ने अपनी पुस्तक रामायण का पुरातत्व में वानर प्रजाति के सभी गुणों का प्राचीन ग्रंथो से प्राप्त उल्लेखों के आधार पर अध्ययन किया है। उनके अनुसार ऋष्यमूक, पम्पासर तथा किष्किन्धा के ज्ञान के आधार पर कहा जा सकता है कि प्राचीन किष्किन्धा जनपद अर्थात वर्तमान कोरापुट, कालाहांडी तथा काकिनाडु जिलों में निवास करने वाली आदिम प्रजाति कंध ही प्राचीन वानर प्रजाति की उत्तराधिकारिणी कही जा सकती है। केदारनाथ ठाकुर (1908) भी इस बात का उल्लेख अपनी कृति बस्तर भूषण मे करते हुए कहते हैं कि कंध (खोंड, कोंडा) स्वयं को वानरवंशी मानते हैं। इस जाति का गोत्रप्रतीक वानर है तथा वंशो के नाम सुग्री, हनु, जाम्ब आदि हैं जो कि इन्हें रामायण में वर्णित वानर प्रजाति के बहुत निकट ले आते हैं। डॉ. हीरालाल आगे उल्लेख करते हैं कि कंध के अन्य पर्यायवाची खोंड, कोडा, कुई, कुवि तथा कुबि प्रभृति है जो इन्हें कोयतूर (गोंड) जनजाति के निकट अधिक सिद्ध करती है। प्रकृति की दृष्टि से ये बस्तर की दण्दामि माडिया प्रजाति से बहुत भिन्न नहीं हैं। इन कडियों को आपस में जोडने पर यह स्पष्ट नहीं होता कि आखिर राक्षस किसे कहा गया है? कई विद्वान गोंड जनजाति की कुछ शाखाओं में राक्षस होने की साम्यता तलाशते हैं तो कुछ के अनुसार प्राक मध्यवर्ती द्रविड जन या आन्ध्र जन प्राप्त विवरणों एवं प्राचीन ज्ञात भूगोल के अधिक निकट मिलते हैं। सातवाहनों और राक्षसों के बीच साम्यता के कई उदाहरण इतिहासकार तलाशते हैं।

इस सभी उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि रामायण कालीन बस्तर विभिन्न मूल जनजातियों से आर्यों का संघर्ष ही नहीं संधि काल भी रहा है। मेरे एसा मानने के कुछ अन्य कारण भी हैं। बस्तर क्षेत्र में न केवल आर्य आगमन अपितु सुदूर दक्षिण के क्षेत्रों से भी आगमन एवं आक्रमण के उल्लेख मिलते हैं। रामायणकालीन वृतांतों अथवा जनश्रुतियों में जनजातियों के मध्य संघर्ष की कथा नहीं मिलती, किसी तरह के गृहयुद्ध का कोई उल्लेख नहीं है यद्यपि सिंहासन अथवा सत्ता को ले कर पारिवारिक खींचतान की अवश्य कुछ कथायें विद्यमान हैं। ऐसे में बस्तर और राम के सम्बन्धों को संघर्ष के साथ कम तथा सांस्कृतिक सम्मिलन के साथ अधिक देखना चाहिये। राम के बस्तर से निकल कर दक्षिण की ओर प्रस्थान करने के पश्चात के संघर्ष की भले ही व्यापक समीक्षायें की जायें। रामायणकालीन बस्तर अनेक जनजातिगत विशेषताओं से युक्त क्षेत्र रहा है तथा प्रतीत होता है कि आदिकाल से ही यह क्षेत्र संस्कृति सम्मिश्रण की मध्यरेखा ही बना रहा है। इस कड़ी के साथ चल कर भी प्रतीत होता है कि तत्कालीन बस्तर अपने लचीलेपन के कारण मिटने से बचा भी रहा।

Comment:

Betist
Betist giriş
betplay giriş
Hitbet giriş
Bahsegel giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betpark
betpark
betpark
betpark
betplay giriş
betplay giriş
betpark giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
bepark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
holiganbet giriş
betnano
meritking giriş
meritking giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritking giriş
betplay giriş
betnano giriş
betplay giriş
betnano giriş
nitrobahis giriş
betplay giriş
roketbet giriş
betcup giriş
betcup giriş
betcup giriş
betcup giriş
betorder giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betorder giriş
betorder giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
rekorbet giriş
rekorbet giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritking giriş
vdcasino giriş