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प्रश्नों से परे है भारतभक्ति

देश में एक बहस प्रारम्भ करने की कोशिश की गई है, किसका भारत चाहिए, गांधी का या भागवत का? मुझे लगता है कि एक बेमानी बहस बेईमान मानसिकता के साथ शुरू की जा रही है। भारत को बनाने की बात की जाती है तो जिन महापुरुषों के कारण आज भारत सनातन बना हुआ है उनको स्मरण किया जाता है। श्री राम, श्री कृष्ण, महात्मा बुद्ध, शंकराचार्य, आचार्य चाणक्य, महर्षि अरविन्द, स्वामी विवेकानन्द जैसे अनेकों नाम है। गांधी इनके सामने कहीं भी नहीं ठहरते। भारत के इन महापुरुषों ने हमेशा एकात्मभाव से और भेदभावरहित काम किया है। इसलिए उनका स्मरण करके और उनसे प्रेरणा लेकर भारत को मजबूत करने का काम किया जा सकता है। परंतु जब भी हिन्दू-मुस्लिम के सहयोग की भारत में बात की गई तो भारत बना नहीं, वह टूटा है। इस बात पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए कि वर्ष 1905 में मजहबी आधार जिस बंगाल का प्रशासनिक विभाजन भी नहीं कर पाए थे, मात्र 32 वर्ष बाद उसी बंगाल का मजहबी आधार पर देशविभाजन कैसे हो गया। इस बीच में महात्मा गाँधी तो हिंदू-मुस्लिम एकता का ढोल पूरी ताकत से बजा रहे थे।
इसलिए देश को हमें व्यक्तियों के आधार पर नहीं, वरन् तत्व के आधार पर बनाना होगा। मैं तो नमन करना चाहता हूँ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जैसे महापुरुष को जिन्होंने संघ के स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणाकेन्द्र किसी व्यक्ति को न बनाकर भगवा ध्वज को बनाया। उस विचार को जरूर पुष्ट करना चाहिए जो विश्वबंधुत्व ्क, बिना किसी मजहब का नाम लिए सभी के विकास की बात करता है। हमें उन विचारों का भारत चाहिए। विकास की बात करें तो भारत के महापुरुषों ने गाय को सर्वाेपरि स्थान दिया है, उसके संरक्षण की बात की है, क्योंकि समाज के उत्थान में उसका सर्वोपरि स्थान है। अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति वहां से होती है। आज गाय राजनीति का विषय बन गई है। हमें यह स्मरण करना चाहिए कि जिन केरल जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों में बीफ खाने के लिए आज आंदोलन चलाए जा रहे हैं, उन्हीं राज्यों के राजाओं ने मुसलमानों तक को गौमांस न खाने की शर्त पर ही प्रवेश दिया था। वे गाय को केवल आस्था ही नहीं, विकास का भी केंद्र मानते थे।
इसलिए जो हिन्दू, मुसलमान, ईसाईयो, को अलग अलग देख कर विचार करे, वह भारत को बनाने वाला नहीं कहा जा सकता। वे लोग भारत को बचाने वाले कैसे हो सकते हैं, जो भारत के मानबिन्दुओं पर आए दिन प्रश्न खड़े करते रहते हैं। भारत को अपमानित करते रहते हैं। एक बात निश्चित तौर समझ लेनी चाहिए कि गांधी जी भारत के स्वतंत्रता संगाम के नायक तो हो सकते हैं पर भारत भाग्यविधाता नहीं हो सकते। जहां तक राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकारों का सवाल है तो उनकी भारतभक्ति पर भी देश संशकित है। क्या अभिव्यक्ति के नाम पर देशद्रोह भी उचित ठहराया जा सकता है?
सरसंघचालक मा. मोहन भागवत जी ने गौ संरक्षण के लिए केन्दीय कानून बनाने की सर्वथा उचित बात कही है। उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक पूरे भारत में सम्पूर्ण रूप से एक समान कानून लगाना चाहिए। इतना ही नहीं, किसानों को उत्साहित करने के प्रयास और प्रशिक्षण भी होना चाहिए। राजनीति में शुभ विचार का हमेशा लाभ होता है और हानि भी होती हो तो देश से बड़ा कुछ नहीं। यह कैसी विडम्बना है कि भारत में है। वंदे मातरम गाना या नहीं गाना इसकी बहस होती है। खुले आम कुछ लोग ‘गाना न गाना ऐच्छिक होना चाहिएÓ के निष्कर्ष पर पहुंच जाते है। मीडिया भी कहीं ना कहीं इसका सहभागी बन जाता है।
भारतभक्ति पर कोई तर्क नही हो सकता है। इसका एक ही तर्क है। जो भारतभक्ति नहीं कर सकते उनके लिए दुनिया पड़ी है, वे वहां रहे जहां देश के स्वाभिमान के साथ जुड़े रहने की बाध्यता न हो। भारत का सफल और समृद्ध, सहिष्णु, आध्यात्मिक इतिहास है, इसके साथ कहीं भी समझौता नहीं करना चाहिए और नहीं हो सकता है। इसके लिए कीमत जो भी चुकानी पड़े वह कम होगी।
(साभार)

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