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राजनीति

योग से परेशान कम्युनिस्ट

योग भारत की सॉफ्ट पावर है। दुनिया के कम्युनिस्ट भारत की इस योग वाली छवि को नष्ट करना चाहते हैं। परंतु दुनिया मे कम्युनिस्ट योग से बहुत डरते हैं और योग से अंतिम सीमा तक नफरत करते हैं। 21 जून को विश्व योग दिवस का भी कम्युनिस्टों ने कभी स्वागत नहीं किया। नमाज पढ़ने वाले CPI और CPM को स्वीकार हैं पर पद्मासन वाले नहीं।

योग मे संस्कृति और अध्यात्म भी सम्मिलित हैं। पूरी दुनिया के कम्युनिस्ट इस योग से बहुत परेशान हैं। आज हम भारतीय कम्युनिस्टों की करतूत को नहीं बताएँगे। आज कुछ अलग जाने।
1921 में बोरिस सखारोव नाम के 22 वर्ष के युवक ने राजधानी बर्लिन मे योगाभ्यास सिखाने का पहला स्कूल खोला था, वह जर्मन नहीं एक रूसी था.1917 की ‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ के दौरान रूसी कम्युनिस्टों ने उसके माता-पिता की संपत्ति ज़ब्त कर उनकी हत्या कर दी थी, इसलिए 1919 में उसे रूस से भागना पड़ा था

पूर्वी जर्मनी द्वितीय विश्वयुद्ध में पराजित अखंड जर्मनी के उस हिस्से पर सात अक्टूबर 1949 को बना था, जिस पर 1945 से सोवियत संघ (आज के रूस) का क़ब्ज़ा था. वहां के नेता उसे बड़े गर्व से ‘जर्मन भूमि पर पहला मज़दूर-किसान राज्य’ कहा करते थे.
मार्क्स और लेनिन के भक्त पूर्वी जर्मन शासकों को योग और ध्यान का रत्ती-भर भी ज्ञान नहीं था. वे उन्हें धार्मिक पोंगापंथ और तंत्र-मंत्र जैसा ही कोई ढकोसला समझते थे, न कि तन और मन को साधने की कोई अनुभवसिद्ध विद्या.

पूर्वी जर्मनी के सरकार नियंत्रित ‘जर्मन जिम्नैस्टिक्स और खेल संघ’ (डीटीएसबी) ने 1950 वाले दशक में ही योग को एक ‘हानिकारक रहस्यवाद’ घोषित कर उससे जुड़े सभी आयोजनों को प्रतिबंधित कर दिया था. 1979 में इसकी फिर पुष्टि करते हुए कहा गया कि योग तंत्र-मंत्र जैसा रहस्यवादी और अवैज्ञानिक है, मज़दूर वर्ग की विचारधारा से इसका कोई मेल नहीं बैठता इसलिए पूर्वी जर्मनी के समाजवाद में इसका कोई स्थान नहीं हो सकता.

कहानी जर्मन योग शिक्षक की
पूर्वी जर्मनी में ही कोटबुस के गेर्ड शाइटहाउएर ने दोस्तों से योग के बारे में सुन रखा था. वे योग के बारे में किसी पुस्तक की तलाश में थे. वे बताते हैं, ‘पश्चिम बर्लिन और हैम्बर्ग में मेरे कुछ दोस्त थे. उनसे कहा कि मैं योग के बारे में ऐसी कोई किताब चाहता हूं, जिसमें योग के आसनों और हठयोग का वर्णन हो. किताब मुझे भेजी तो गई, पर कभी मिली नहीं!’किताब इसलिए नहीं मिली कि ‘मज़दूरों और किसानों के राज’ वाले पूर्वी जर्मनी में सारी डाक सेंसर होती थी. पुस्तकें और अन्य प्रकाशन ही नहीं, चिट्ठियां भी प्रायः ज़ब्त हो जाती थीं. गुप्तचर विभाग उन लोगों को तंग करने लगता था जिनके नाम-पते पर उन्हें भेजा गया था.
इसलिए गेर्ड शाइटहाउएर के मित्रों ने अगली बार क़िताब के क़रीब 600 पृष्ठों की फ़ोटोकॉपी बनाई और 10 से 20 पन्नों वाले अलग-अलग लिफाफों में उन्हें रख कर अलग-अलग दिन डाक से भेजे. इस तरह सभी तो नहीं, तब भी अधिकतर पन्ने गेर्ड शाइटहाउएर तक पहुंचे. उनकी सहायता से उन्होंने स्वयं ही योगासन सीखे. सरकार से भारत जाने के लिए पासपोर्ट देने की मांग की, जो उन्हें कभी नहीं मिला.साधारण लोगों को ग़ैर-कम्युनिस्ट देशों की यात्रा के लिए पासपोर्ट और उसमें लगने वाला वीज़ा मिलता ही नहीं था. यहां तक कि इन दोनों के आवेदन के लिए न तो कोई फ़ॉर्म होता था और न ही कोई ऐसा अधिसूचित कार्यालय, जहां जाकर आवेदन किया जा सके. भारत कोई ‘समाजवादी बंधु-देश’ नहीं था. इस कारण ‘स्टाज़ी’ कहलाने वाला पूर्वी जर्मन गुप्तचर मंत्रालय, जिसकी सहमति के बिना विदेश जाना संभव ही नहीं था, गेर्ड शाइटहाउएर की मांग से और भी बौखला गया.
गेर्ड शाइटहाउएर का कहना है, ‘1983 में एक दिन जब मैं पूर्वी बर्लिन में भारतीय दूतावास से कोटबुस में अपने घर लौटा तो किसी ने मुझ से कहा कि श्रीमान शाइटहाउएर, ज़रा हमारे साथ चलिये…’ उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और साढ़े तीन साल जेल की सज़ा सुना दी गयी. भारतीय दूतावास में जाने के कारण उन पर आरोप यह लगाया गया कि वे देश के बारे में गोपनीय जानकारियां दूसरों को दे कर देशद्रोही कार्य कर रहे थे. गेर्ड शाइटहाउएर को साढ़े तीन तो नहीं, पर दो साल से कुछ अधिक समय जेल में काटना पड़ा. तीन साल इसलिए नहीं, क्योंकि पश्चिम जर्मन सरकार ने पैसा देकर 1985 में उन्हें छुड़ा लिया.

1990 में पूर्वी जर्मनी का अस्तित्व मिट जाने के बाद से ‘स्टाज़ी’ (राज्य-सुरक्षा मंत्रालय) कहलाने वाले उसके गुप्तचर मंत्रालय की सारी फ़ाइलें एक विशेष अभिलेखागार में रखी गयी हैं. उन सब लोगों के लिए वे उपलब्ध हैं, जो यह जानना चाहते हैं कि उनके बारे में क्या जानकारियां जमा की गयी थीं या किसने क्या चुगलखोरी की थी. गेर्ड शाइटहाउएर को अपने बारे में जो फाइलें मिली हैं, उनसे उन्हें पता चला कि उनकी गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए ‘स्टाज़ी’ ने 18 जासूस लगा रखे थे! केवल एक करोड़ 80 लाख जनसंख्या वाले पूर्वी जर्मनी के गुप्तचर मंत्रालय के पास पूर्णकालिक वेतनभोगी स्टाफ़ के रूप में 91 हज़ार नियमित जासूस और अन्य कर्मी थे.
2अप्रैल 1984 को जब रूसी अंतरिक्षयान ‘सोयूज़ टी-11’ रूसी अंतरिक्ष स्टेशन ‘सल्यूत-7’ की दिशा में चला तो उसमें एक भारतीय अंतरिक्ष यात्री भी सवार था. नाम था राकेश शर्मा. राकेश शर्मा भारत के अब तक के एकमात्र अंतरिक्ष यात्री हैं. अंतरिक्ष स्टेशन ‘सल्यूत-7’ पर उन्होंने क़रीब आठ दिन बिताए थे. इस दौरान उन्होंने वहां योगासन और योग संबंधी कुछ प्रयोग आादि भी किये थे. इसे तत्कालीन सोवियत संघ सहित पूर्वी यूरोप के सभी कम्युनिस्ट देशों के लोगों ने या तो अपने टेलीविज़न समाचारों में देखा या अख़बारों में पढ़ा.

स्रोत साभार

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