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इतिहास के पन्नों से

जब अटल बिहारी वाजपेई ने कहा था कि दूल्हा तो वीपी सिंह ही हैं

विजय त्रिवेदी

बात 1991 के आम चुनावों की है। दूरदर्शन पर चुनावों के नतीजों का लाइव प्रसारण था और मैं पहली बार लखनऊ में था, हजरतगंज की भीड़भरी सड़क पर अपने गेस्ट मुलायम सिंह यादव के साथ। उनके पीछे खड़े पचासों समर्थक कार्यकर्ता नारे लगा रहे थे। पांच दिनों से कई बार रिहर्सल हुआ था। लंबी-चौड़ी फौज अफसरों और टेक्निशनों की। करीब बीस मिनट हो गए थे। समर्थकों का जोश और मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ता जा रहा था। नेताजी भी बैचेन होने लगे थे, तभी मैसेज मिला लाइव जाने का, मैंने नेता जी को तैयार रहने के लिए इशारा किया। उसी समय ईयरफोन पर दिल्ली से स्टूडियो डायरेक्टर की आवाज़ कान में पड़ी-सिग्नल नहीं मिल रहा आपका, लाइव नहीं हो सकता।’ समझ सकते हैं कि क्या हाल हुआ होगा उस वक्त मेरा! थोड़ी-सी बेईमानी की मैंने, नेताजी से ऐसे सवाल पूछना शुरू किया मानो लाइव ही जा रहे हों। फिर उसे रिकॉर्ड करके भेज दिया। थोड़ी देर बाद इंटरव्यू चल गया। आज का दौर होता तो शायद मुमकिन नहीं होता। अब तो हर खबर हर इंसान मोबाइल पर लाइव देखता है। 1989 में जब चुनाव करीब थे तो जयपुर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में वाजपेयी और वीपी सिंह दोनों मौजूद थे। उसमें मैंने वाजपेयी से सवाल किया कि यदि चुनावों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर सामने आती है तो फिर कौन प्रधानमंत्री बनेगा? एक मिनट को सन्नाटा सा था प्रेस कान्फ्रेंस में। वी पी सिंह ने वाजपेयी की तरफ देखा, वाजपेयी मुस्कराए, बोले, ‘इस बारात का दूल्हा वीपी सिंह ही हैं, वे ही प्रधानमंत्री बनेंगे।’

वीपी सिंह

कैसे आगे बढ़े शाह
नब्बे के दशक में बीजेपी गुजरात में मजबूत होने लगी थी। आडवाणी की राम रथयात्रा के गुजरात में आयोजन की ज़िम्मेदारी नरेंद्र मोदी को मिली थी और इसकी सफलता से उनका कद बढ़ गया था। उसी वक्त शाह को अपने राजनीतिक जीवन का एक बड़ा मौका मिला। 1991 के चुनाव में बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने गांधीनगर से लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया। अमित शाह ने मोदी के सामने आडवाणी के चुनाव इंतजाम की जिम्मेदारी लेने की इच्छा जाहिर की, उन्होंने इस बात का भरोसा दिलाया कि अगर आडवाणी यहां चुनाव प्रचार के लिए वक्त नहीं दे पाएंगे तब भी वे इस सीट को आडवाणी के लिए जीत कर दिखाएंगे। शाह को जिम्मेदारी मिली और उन्होंने आडवाणी की बड़े अंतर से जीत भी दर्ज कराई। इस जीत के बाद शाह का राजनीतिक कद तेजी से बढ़ने लगा। फिर 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी को गांधीनगर से चुनाव लड़ना था और पिछले चुनाव प्रबंधन के नतीजों की वजह से इस बार भी जिम्मेदारी अमित शाह को ही मिली। वाजपेयी तो पूरे देश में प्रचार में लगे थे। गांधीनगर के लिए बहुत कम वक्त मिल पाया लेकिन शाह ने इस बार भी वह सीट जिता कर पार्टी को दी। इस चुनाव के बाद वाजपेयी पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने थे। इन दोनों बड़े नेताओं की जीत ने शाह को पार्टी के आला नेताओं की निगाह में तो ला ही दिया, उनकी चुनाव प्रबंधन की क्षमता को भी पहचान दिलाई। शाह की पहचान गुजरात में शुरू से ही मोदी के नजदीकी व्यक्ति के रूप में रही है। यही वजह रही होगी कि केशुभाई पटेल की सरकार में उन्हें जगह नहीं मिल पाई।
बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता से जब मैंने पूछा कि अब पार्टी और सरकार में नंबर दो की हैसियत पर कौन है तो नेताजी ने मुस्कराते हुए कहा कि आपका सवाल ही गलत है। अब हमारी पार्टी में गिनती 1 के बाद 21 से शुरू होती है तो उस नंबर पर आप जिसे चाहें रख लीजिए! मोदी सरकार में एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री अपने सरकारी आवास के ड्राईंगरूम में आराम की मुद्रा में पसरे हुए थे। आसपास उनके शुभचिंतकों का घेरा था जो भुने हुए काजू और बेहतरीन मिठाइयों के साथ नेताजी की तारीफों में लगा था। किसी ने प्रधानमंत्री की आलोचना करते हुए मंत्री जी की तरफ देखा। मंत्री जी हल्का सा मुस्कराए, फिर औपचारिक तौर पर बोले, ‘नहीं, नहीं.. हमारे प्रधानमंत्री जी बहुत काम करते हैं।’ दूसरे शुभचिंतक के हाथ में पार्सिलिन कप में चाय थी। उसने मंत्री जी को ज़्यादा खुश करने के अंदाज में फरमाया, ‘सर, उन्हें पीएम बनवाने में आप भी कम कसूरवार नहीं है., वरना बनना तो आपको ही था।’ मंत्री जी की मुस्कान से होठ कुछ ज्यादा फैल गए। मुझ अदना से पत्रकार पर नजर पड़ी तो बात पलटते हुए बोले, ‘अरे हमारे पीएम से ज्यादा कोई लोकप्रिय नहीं, हमें तो वो करना ही था, वैसे ठीक काम कर रही है सरकार।’
चंद्रगुप्त क्यों नहीं?
दिसंबर 2017। गुजरात विधानसभा चुनावों के नतीजे आ रहे थे और एक टीवी न्यूज चैनल पर मेरे कार्यक्रम का नाम था ‘जो जीता वो सिकंदर’। बहुत ही चलताऊ सा नाम, लेकिन नतीजों में तेज़ी से बदलाव हो रहा था। एकबारगी लगा कि वहां कांग्रेस सरकार बना लेगी, फिर थोड़ी देर बीजेपी का ग्राफ ऊपर चढ़ने लगा। न्यूजरूम में बने लाइव स्टुडियो में गर्माहट बढ़ी हुई थी और एक्टिविटी तेज थी। जब सहयोगी एंकर बार-बार प्रोग्राम के नाम का जिक्र कर रहे थे तो स्टुडियो में बैठे बीजेपी के वरिष्ठ नेता और लंबे समय तक वाजपेयी के साथ रहे अमिताभ सिन्हा ने नई बहस छेड़ दी, ‘विजय जी, ये जो जीता वो सिकंदर क्यों? चन्द्रगुप्त क्यों नहीं? जीत तो चन्द्रगुप्त के नाम है, सिकंदर तो हमलावर, लुटेरा है। आप लोग जो जीता वो चन्द्रगुप्त कहा कीजिए।’ मैंने कहा, ‘आपका सुझाव तो अच्छा है, लेकिन फिलहाल आपके चाणक्य का क्या हुआ? और क्या चन्द्रगुप्त इस बार भी जीतेंगे?’ गुजरात के चुनावों में चाणक्य-चन्द्रगुप्त की जोड़ी 99 के फेर में पड़ गई और बस किसी तरह सरकार बन गई समझो।

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