दिल-दिमाग से कुछ उपजाएँ वरना

इधर से उधर ही करते रहेंगे

– डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

अपने दिल और दिमाग का जितना अधिक उपयोग किया जाए उतना वे शरीर और उसके अंगों को चलाते हैं। जितना हमारा शरीर चलता है उतना ही ज्यादा स्वस्थ और मस्त रहता है। इसलिए जीवन में सदैव स्फूर्ति, आनंद और स्वास्थ्य को बनाए रखने वाले लोगों को चाहिए कि वे अपने आपको ईश्वर के अंश के रूप में जानने का प्रयास करें तथा जितने समय के लिए संसार में हमें भेजा हुआ है उतने समय तक ईश्वरप्रदत्त शक्तियों,शरीर और दिल-दिमाग का भरपूर इस्तेमाल करते हुए इनका अपने तथा समाज और जगत के कल्याण में उपयोग करें।

इस मामले में इंसान की दो ही गतियाँ हैं। निरन्तर परिश्रम के साथ कर्मयोग को उत्तरोत्तर प्रभावी एवं सुगंधित बनाते हुए श्रेष्ठ इंसान के रूप में अपने आपको स्थापित-प्रतिष्ठित करना अथवा दिन-रात आलस्य और प्रमाद से भरे रहकर जड़ बने रहना। हममें से अधिकांश लोग दूसरी श्रेणी के हैं। ऎसे लोग भीतर-बाहर जो कुछ हो रहा है उसे चुपचाप देखने-सुनने के आदी हैं और जिन्दगी भर यों ही जड़ बनकर पड़े रहते हैं जैसे कि ऊपर जाने की टिकट बुक हो चुकी हो लेकिन आवागमन के साधनों की कमी पड़ गई हो या बीच में कहीं कोई जाम लग गया हो।

इस दूसरी श्रेणी की एक उपश्रेणी है जिसमें शामिल लोग खुद भले कुछ न कर पाएं, वे दूसरों के विचारों, लेखों, रचनाआेंं और योजनाओं को या तो हूबहू कहीं किसी ओर के पास परिवहन कर देंगे अथवा इन्हें अपने नाम से दूसरों के सामने ऎसे परोस देंगे जैसे कि यह उनका अपना ही सृजन हो। आजकल हर तरफ इन्हीं  लोगों का बोलबाला है।

अपने भीतर की सृजनधर्मिता से बेखबर इन लोगों के लिए मौलिकता नाम की कोई चीज होती ही नहीं है जो जहां है वह सब हमारा अपना है और इसे जहां चाहे बेहिचक परोसा जा सकता है। जबकि संसार में आए प्रत्येक प्राणी के पास अपरिमित सोचने-समझने और व्यक्त करने की पर्याप्त क्षमताएं हैं लेकिन हम लोग इनका उपयोग करने की बजाय परायी सामग्री को इधर-उधर करने में ही आनंद का अनुभव करते हैं।

हैरत की बात तो यह है कि इसमें समयानुकूल परिवर्तन एवं परिष्करण की अकल भी लगाने की हमें फुरसत नहीं होती। अपने दिल और दिमाग की शक्तियों को जागृत किए बगैर किए जाने कार्यों की बहुतायत ही वह असली कारण है जिससे मनुष्य में बौद्धिक परिपक्वता का अभाव होता जा रहा है और मौलिकता समाप्त  होने लगी है।

हर घटना और कर्म को नई दिशा-दृष्टि से सामने रखने और इसमें अपनी कल्पनाओं के अनुरूप नवीनता लाने की कोशिश करने वाले कुछ ही बिरले लोग होते हैं, बाकी सारे लोग पुरानी लीक पर चलकर गंधहीन कर्म को आकार देते रहते हैं। यही कारण है कि हम सारा कुछ अपने पास होने के बावजूद कुछ नया न सोच पा रहे हैं, न लिख पा रहे हैं और न कुछ कर पा रहे हैं।

हममें से अधिकांश लोग इधर से उधर करने में ही अपने जीवन को लगा रहे हैं। कोई कहीं से विचार लेकर कहीं ओर परोस रहा है, कभी उनके नाम से, कभी अपने नाम  का ठप्पा लगा कर। कोई कुछ और कर रहा है। इस किस्म के सारे के सारे लोग इधर से उधर करने के आदी होते जा रहे हैं। लोगों का दिल और दिमाग सुप्त पड़ा हुआ है पर लक्ष्य सभी का एक ही है इधर से उधर की करना अथवा इधर से उधर या उधर से इधर करना।

अब इसमें भी वैश्वीकरण और उदारीकरण की छाप छा रही है और लोग उधार से इधर या उधार से उधर करने लगे हैं। बहरहाल, जिसे जो करना हो करने में स्वतंत्र है किन्तु इतना तो तय है कि जो लोग विचारों और वस्तुओं के मामले में इधर-उधर करते हैं वे जीवन में हर मोड़ पर इसी मनोवृत्ति का इस्तेमाल करते रहते हैं और इनका दिल-दिमाग सुप्तावस्था में ही खाक हो जाता है। वह खाक भी किसी काम की नहीं होती।

कई सारे लोग ऎसे होते हैं जिन्हें किसी भी कर्म में लगा दिया जाए, वे पुरानी फाईलों और परंपराओं को देखेंगे और अपनी ओर से अकल लगाए बिना स्थान, समय और व्यक्तियों के नाम बदल कर उसे अपने नाम से परोस कर श्रेय पाने में जुट जाते हैं। जो लोग ऎसा करते हैं उनकी बुद्धि कुण्ठित हो जाती है और ऎसे लोग कभी भी कोई सा काम स्वतंत्र रूप से करने का सामथ्र्य खो देते हैं।

इन लोगों को कभी विषम परिस्थितियों में काम करना पड़े तब भौंदू की तरह कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं होते। जो काम हमें सौंपा जाए, उसमें एकदम परफेक्शन की कल्पना कभी न करें, जितनी समझ है, जितनी अपनी सोच है, उसे ही आकार देने का प्रयास करें। हो सकता है यह काम छोटा ही आकार पा सके लेकिन कालान्तर में इस प्रकार के मौलिक कार्यों की गुणवत्ता अपने आप मुँह बोलने लगती है और हमें आप पर भरोसा तो होता ही है, अपनी प्रतिभा के विलक्षण और सर्वमान्य एवं सर्वव्यापक होने का सुखद एवं  सुकूनदायी अहसास भी होता है।

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