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इतिहास के पन्नों से

भारत में एक शताब्दी पूर्व दलितोद्धार

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महर्षि दयानन्द ने जन्मना जाति व्यवस्था का विरोध कर गुण, कर्म व स्वभाव पर आधारित करने का आन्प्दोलन किया जिसे वेदानुसार वर्ण व्यवस्था कहा जाता है । महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन के आचार-विचार-व्यवहार से अपने शिष्यों व भक्तों का मार्गदर्शन किया। नारी जाति व दलित शूद्रों बन्धुओं को उन्होंने वेदाध्ययन का अधिकार दिलाया और समाज से मनुष्य-मनुष्य के बीच किसी भी प्रकार की रूढ़िगत असमानता, अस्पर्शयता-छुआ-छूत सहित ऊंच-नीच व अगड़े-पिछड़े के भेद को दूर करने के लिए मौखिक व लिखित आन्दोलन किया। उनकी मृत्यु के बाद उनके शिष्यों ने दलित उद्धार व उत्थान का अपूर्व ऐतिहासिक महत्वपूर्ण कार्य किया जिसकी पूर्व व पश्चात के समय में किए गये कार्यों से कोई समानता नहीं है।

सन् 1917 व उसके कुछ वर्ष बाद दिल्ली में दलितों-अछूतो के उद्धार का विवरण हम इस लेख में प्रस्तुत कर रहे हैं जिसे हमने पं. इन्द्र विद्यावाचस्पति लिखित आर्यसमाज का इतिहास के द्वितीय भाग से लिया है। इस महान कार्य पर दृष्टिपात करना हमें इसलिये भी आवश्यक लगता है कि प्रथम तो हम अपने इन पूर्वजों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करें और दूसरी आज दलितों के नाम पर वोट बैंक की राजनीति के वातावरण में दलितोत्थान का काम ही समाप्त कर दिया गया और दलितों के वास्तविक हितैषी उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। आज हमारे दलित भाईयों को भी आर्थिक लाभों की अधिक आवश्यकता प्रतीत होती है। जो व्यक्ति व समूह उन्हें आरक्षण, अधिक आर्थिक व राजनैतिक अधिकार देने की बात करता है, वही उनका हितैषी माना जा रहा है। समाज सुधार व सामाजिक समरसता उत्पन्न करने का कार्य कहीं बहुत पीछे छूट गया है व प्रायः समाप्त हो गया है।

अविभाजित भारत के पंजाब तथा अन्य प्रदेशों में अछूतोद्धार, देशोद्धार आदि के नाम से अस्पृश्य कहलाने वाली जातियों को आर्यत्व के समान अधिकार देने के लिए आर्य पुरुषों तथा आर्य संस्थाओं द्वारा कार्य किये जाते रहे। सन् 1917 के पश्चात् दलितोद्धार के नाम से उस कार्य का एक नया और बड़ा केन्द्र स्थापित हो गया। दलितोद्धार कार्य के मुख्य प्रेरक ऋषि दयानन्द भक्त संन्यासी स्वामी श्रद्धानन्द थे जिन्होंने 12 अप्रैल सन् 1917 को हरिद्वार में संन्यास आश्रम में प्रवेश किया था। इसके बाद वह गुरुकुल कांगड़ी के अपने दायित्वों से अवकाश लेकर दिल्ली आ गये और अपने सार्वजनिक जीवन में मुख्यतः दलितोद्धार के कार्यों को पूरे त्याग, निष्ठा व समर्पण भाव से करते रहे। दिल्ली में स्वामी श्रद्धानन्द जी को निवास के लिये आर्यसमाज के भक्त सेठ रग्घूमल लोहिया ने नये बाजार वाले अपने उस मकान की ऊपरली मंजिल दे दी, जिसमें 1926 में स्वामी जी का बलिदान हुआ और जो अब (इतिहास लेखन के समय) बलिदान-भवन, इस नाम से सार्वदेशिक सभा का केन्द्र बनी हुई है। स्वामी जी ने दिल्ली में सब से पहले जो कार्य आरम्भ किया, वह दलितोद्धार का था। आपके लिये यह कार्य नया नहीं था। जालन्धर आर्यसमाज में बहुत पहले आपकी प्रधानता में ही रहतियों की शुद्धि का आयोजन किया गया था। दिल्ली में अस्पृश्य कहलाने वाले लोगों की बहुत बड़ी संख्या निवास करती है। उन दिनों उन लोगों में दो संस्थायें विशेष रूप से प्रचार का काम कर रही थी। स्वामी जी की सहायता के लिये जो कार्यकर्ता अग्रसर हुए, उनमें से तीन के नाम मुख्य हैं। डा. सुखदेव जी, जो गुरुकुल कांगड़ी को छोड़ कर दिल्ली आ चुके थे, दलितोद्धार जैसे सेवा कार्य के लिये सर्वथा उपयुक्त थे। स्थानीय कार्यकर्ताओं में लाला नारायणदत्त जी और लाला ज्ञानचन्द जी के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। डा. सुखदेव जी का उस समय तक का जीवन सेवा में ही व्यतीत हुआ था। दीन-दुखियों को सहायता देना और रोगियों का इलाज करना, गुरुकुल कांगड़ी में उनके ये दोनों काम साथ ही साथ चलते थे। दिल्ली में आकर भी वे इसी कार्य में पड़ गये। वर्षों तक वे दलितोद्धार सभा के मंत्री की हैसियत से और निजी तौर पर भी दलित भाइयों को उठाने और उन्हें द्विजातियों के समान अधिकार दिलाने में लगे रहे। लाला नारायणदत्त जी उस समय तक आर्यसमाज में और नगर के सार्वजनिक जीवन में उस ऊंचाई तक नहीं पहुंचे थे, जो उन्हें पीछे से प्राप्त हुई। हम कह सकते हैं कि उन दिनों के दलितोद्धार के काम ने उनका सार्वजनिक जीवन में प्रवेश कराया। लाला जी सोलह आने कर्मयोगी थे। जो कर्तव्य सामने आया, उसके पूरा करने में जी जान से लग जाते थे। चर्मकार भाइयों को जूते के दुकानदारों से जो शिकायत थी, उसे दूर करने क लिये उन्होंने एकदम ‘‘नारायण शू कम्पनी” नाम की एक दूकान खोल दी। दिल्ली में वह किसी हिन्दू की पहली जूतों की दूकान थी। इससे पूर्व हिन्दू लोग इस काम को गिरा हुआ समझते थे। लाला जी का अपना काम ठेकेदारी का था, इस कारण उन्हें दूकान में घाटा हुआ। उन्होंने कभी दुःख नहीं माना, क्योंकि उनके दृष्टान्त से साहस प्राप्त करके पांच साल के अन्दर हिन्दुओं की जूतों की लगभग बीस दूकानें खुल गयीं जिससे चर्मकारों का कष्ट बहुत कुछ दूर हो गया।

लाला ज्ञानचन्द जी स्वामी श्रद्धानन्द जी के परमभक्त और लाला नारायणदत्त रूपी राम के पूरे लक्ष्मण थे। जिधर ला. नारायणदत्त जी चलते, उधर ही लोग ला. ज्ञानचन्द जी को जाता देखते थे। वह वर्षों तक दलितोद्धार सभा के प्रधान रहे और स्वामी श्रद्धानन्द जी द्वारा प्रारम्भ की हुई दलितोद्धार की प्रवृत्तियों में तन, मन और धन से पूरा सहयोग देते रहे। उनमें एक विशेषता आदि काल के आर्यसमाजियों वाली थी। वे बहुत स्वाध्यायशील थे। जिन दिनों वे इम्पीरियल बैंक की बिल्डिंग बनवा रहे थे, उन दिनों बनती हुई बिल्डिंग के सामने किसी पेड़ के नीचे चारपाई पर बैठ कर मनुस्मृति और उपनिषदों में से उद्धरण नकल करते हुए उन्हें देख कर परिचित लोग आश्चर्य किया करते थे। जीवन के अन्त समय तक वे स्वाध्याय और लेखन कार्य में लगे रहे।

इन प्रमुख व्यक्तियों के अतिरिक्त अन्य भी बहुत से आर्यजन थे, जिन्होंने दलितोद्धार के काम में स्वामी जी का उत्साहपूर्वक साथ दिया। परिणाम यह हुआ कि दो-तीन वर्षों में ही दिल्ली के दलित भाइयों में अद्भुत जागृति पैदा हो गई। उनमें यज्ञोपवीत पहनने और संध्या करने वाले भाइयों की संख्या हजारों तक पहुंच गई। स्वयं उन लोगों में कई उपदेशक और पंडित तैयार होकर जाति के उत्थान का कार्य करने लगे।

स्वामी जी के नेतृत्व में दलितोद्धार सम्बन्धी जो बड़े कार्य हुए, उनमें से एक कुओं पर पानी भरने का अधिकार दिलवाना भी था। कुछ कुओं पर तो बिना किसी विरोध कठिनाई के यह अधिकार प्राप्त हो गया परन्तु दो-एक जगह पुराने विचार के लोगों की ओर से विरोध भी किया गया। सब से प्रबल विरोध अजमेरी दरवाजे के बाहर अंगूरी वाले कुएं पर हुआ। जहां अब कमला मार्केट की सुन्दर इमारत खड़ी है, वह स्थान तब लकड़ियों की टालों से घिरा हुआ था। जब स्वामी जी के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं की एक मंडली, जिसमें आर्यसमाजियों के साथ कर्मठ सनातन धर्म के प्रभावशाली विद्वान् और नागरिक भी थे, दलित भाइयों को साथ लेकर उस कुएं के पास पहुंचे तो शहर के कई उपद्रवी हिन्दू और मुसलमानों ने मिलकर उन पर डण्डों से आक्रमण कर दिया। बहुत से लोगों के चोटें लगीं। इस प्रतिरोध के कारण उस समय तो यह कार्य न हो सका परन्तु कुछ समय पीछे उपद्रवी लोग दब गये और शान्तिपूर्वक उस कुएं से दलित भाइयों ने पानी भर लिया। उन्हीं दिनों कई हिन्दू मन्दिरों के द्वार भी खोल दिये गये थे।

दलितोद्वार के उस कार्य की विशेषता यह थी कि स्पृश्य और अस्पृश्य जातियों के परम्परागत भेद को मिटा कर समान स्तर पर लाने का यत्न किया जाता था। दलितों की जाति का अलग हिस्सा न मान कर उन्हें अन्यों के समान मानवता के पूरे अधिकार देना आर्यसमाज के दलितोद्धार-कार्य का मुख्य लक्ष्य था। इस अंश में आर्य-समाज का आन्दोलन (गांधी जी के) हरिजन आन्दोलन से मौलिक रूप में भिन्न रहा है।

सन् 1921 में कार्य की सुविधा के लिए विधिपूर्वक दलितोद्धार सभा की स्थापना कर दी गयी। सभा के उद्देश्य निम्नलिखित थे।

1 भारत की दलित जातियों में सदाचार का प्रचार करना।
2 दलित समुदाय को उनके प्राचीन धर्म से पतित करने वाले आक्रमणों से बचाना तथा उनको अपने पूर्वजों के धर्म पर दृढ़ रखना।
3 दलित समुदाय से अन्य श्रेणियों के अनुचित वंशीय घृणा के मिथ्या संस्कारों को दूर करके उनके खोये हुए मानवीय अधिकारों को दिलाना।
4 समय तथा सामर्थ्यानुसार दलितों के लिए ऐसी शालाओं का खोलना जिन के द्वारा वे अन्य देशवासियों के साथ शिक्षा ग्रहण करके सभ्य समाज में उचित स्थान पा सकें।

सभा की स्थापना के समय ये महानुभाव उपस्थित थे: 1. स्वामी श्रद्धानन्द जी, 2. लाला ज्ञानचन्द जी, 3. लाला नारायणदत्त जी, 4. लाला दीवानचन्द जी, 5. डा. सुखदेव जी, 6. महाशय रामसिंह जी, 7. लाला वेणीप्रसाद जी, 8. लाला कृपा राम जी।

सभा के प्रधान श्री स्वामी श्रद्धानन्द जी और मंत्री डाक्टर सुखदेव जी निर्वाचित हुए।
1924 में श्री स्वामी जी ने सभा को सूचना दी कि बाहर घूमने का कार्य अधिक होने के कारण वे दिल्ली में कम रह सकेंगे। इस कारण अन्य किसी सज्जन को प्रधान बनाया जाय। उनके स्थान पर लाला ज्ञानचन्द जी को प्रधान चुना गया। 1925 में डा. सुखदेव जी ने अन्य कार्यों की व्यस्तता के कारण त्यागपत्र दे दिया। उनके स्थान पर स्वामी रामानन्द जी मन्त्री चुने गये। बीच में कुछ समय तक पं. इन्द्र विद्यावाचस्पति जी सभा के मन्त्री रहे। सभा का कार्य विशेष रूप से अधिष्ठाता के रूप में स्वामी रामानन्द जी पर ही अवलंबित रहा। 1923 के पश्चात् सभा का प्रचार कार्य विस्तृत होता गया। पंजाब और उत्तर प्रदेश में सभा की ओर से बहुत सी महत्वपूर्ण कान्फ्रेन्सें हुईं, हजारों दलित भाइयों को गायत्री का उपदेश और यज्ञोपवीत देकर समाज में बराबर का स्थान दिया गया और समय-समय पर उन पर आई हुई कठिनाईयों का समाधान किया गया।

सभा ने जो एक बड़ी समस्या अपने हाथ में ली, वह बेगार से सम्बन्ध रखती थी। यह रोग विशेषरूप से उन गांवों में प्रचलित था जहां जमींदारी का दौरदौरा था। वहां के छोटी श्रेणियों के लोग रियाया के नाम से पुकारे जाते थे। उन लोगों में दलितों की अधिकता थी। जमींदार लोग चाहे वे हिन्दू हों, या मुसलमान, गरीब मेहनतियों से बड़ा कस कर बेगार लेते थे, कम से कम मजदूरी देते थे और उनकी छोटी सी भूल पर गरीब लोगों का सर्वनाश करने को तैयार हो जाते थे। सभा ने इस प्रथा के विरुद्ध जोरदार प्रचार आरम्भ किया और यह बात संतोषपूर्वक कही जा सकती है कि उसे बेगार की सख्तियों को हटाने में बहुत कुछ सफलता मिली।
1924 के जनवरी मास में दिल्ली में एक बहुत बड़ा सम्मेलन हुआ, जिसमें आसपास के कई जिलों के लोग उपस्थित हुए। सम्मेलन में कई हजार की हाजिरी थी। सभा में जाति-सुधार और समाज-सुधार के समर्थन में दस प्रस्ताव स्वीकार किये गये। अन्त में एक विशाल सहभोज किया गया, जिसमें शहर के रायसाहब लाला केदारनाथ, सेठ लक्ष्मीनारायण गाडोदिया, स्वामी विश्वेश्वरानन्द जी, स्वामी सत्यानन्द जी, पं. इन्द्र जी, लाला देशबन्धु जी, लाला नारायणदत्त जी, लाला बुलाकीदास जी म्युनिसिपल कमिशनर आदि महानुभावों ने भंगी, जाटव आदि सभी वर्गों के भाइयों के साथ और उनके हाथ से भोजन किया।

-मनमोहन कुमार आर्य

(जातिवाद मिटाओ देश बचाओ)

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