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भयानक राजनीतिक षडयंत्र

मजहब ही तो सिखाता है आपस में बैर रखना, अध्याय – 2

अल्लाह के इस्लाम और मुल्ला के इस्लाम के बीच जब यह गुप्त समझौता हुआ तो उसके पश्चात इन गुंडों में से जो बादशाह ,सुल्तान या सेनापति बने उन्होंने संसार में कत्लेआम का ऐसा इतिहास लिखा जो केवल और केवल मजहबी जुनून, मजहबी उन्माद और कट्टर सांप्रदायिकता का वह इतिहास है जिसमें सर्वत्र मानवता की लाश ही लाश बिखरी पड़ी हैं। यदि इस्लाम के इस मजहबी उन्मादी इतिहास पर दृष्टिपात किया जाए तो इस्लामिक इतिहास के भारतीय पृष्ठों पर भी हमें करोड़ों लोगों की लाशें बिखरी पड़ी दिखाई दे जाएंगी।

इतिहास के हर पृष्ठ पर खूनी लगे हैं दाग।
प्रेम कहीं नहीं दीखता बिखरी पड़ी है आग।।
झुलस गई इंसानियत भुला दिया गया प्यार।
गिद्ध झपट रहे देश में और कर रहे मारामार।।

यह लोग अपनी निर्दयता , निर्ममता, अमानवीयता, पाशविकता आदि के बल पर संसार की सज्जन शक्ति पर विजय प्राप्त करते गए और जब इन्होंने अपनी तथाकथित विजय का इतिहास लिखा तो इन्होंने संसार की उस सज्जन शक्ति को मूर्ख ,काफिर, अज्ञानी, जाहिल और न जाने क्या-क्या कहकर उसे इतिहास के कूड़ेदान में ऐसे दबा दिया जैसे कि वह थी ही नहीं या थी तो उसके रहने से संसार में अल्लाह की कायनात के लिए बड़ा खतरा पैदा हो गया था ।
इन लोगों ने संसार के सभी भद्र पुरुषों को यह आभास कराया कि अब जब उन्होंने कुरानी पैगाम के अनुसार संसार को बनाने की प्रक्रिया आरम्भ कर दी है तो संसार भाईचारे और शान्ति के सूत्र में बंधता चला गया है। वास्तव में कुरान को मानने वाले लोगों का इस प्रकार का अभियान मानवता की हत्या का अभियान था। जिसे वेद को मानने वाले भारतीय भद्र पुरुष पहले दिन से समझ रहे थे । यही कारण था कि उन्होंने पहले दिन से ही इस्लाम का प्रतिकार करने का संकल्प धारण कर लिया था। क्योंकि उन्हें यह आभास हो गया था कि यदि यह अमानवीय संस्कृति संसार में फैली तो यह संपूर्ण संसार के विनाश का कारण बनेगी।

इस्लाम और आतंकवाद दोनों का सम्बन्ध

संसार का कोई विद्वान, इतिहासकार या लेखक क्या यह बता सकता है कि जिस समय कुरान के पैगाम को लेकर कुरान को मानने वाले ये लोग संसार में आतंक मचा रहे थे और लोगों का नरसंहार कर रहे थे तो उन नरसंहारों में मरने वाले लोगों की कुल कितनी संख्या रही ? क्या यह भी बताया जा सकता है कि इस्लामिक आतंकवाद आज, कल या परसों की बात है या फिर इसके जन्म काल से ही इससे आतंकवाद जुड़ गया था ? तारिक फतह और बड़ौत की एक शाही मस्जिद के इमाम रहे महेंद्रपाल आर्य जैसे विद्वानों का कहना है कि आतंकवाद और इस्लाम दोनों का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है । आतंकवाद के बिना इस्लाम की और इस्लाम के बिना आतंकवाद की कल्पना नहीं की जा सकती। मजहब के नाम पर फैलाए गये इस आतंकवाद ने पहले दिन से ही लोगों का कत्लेआम करना आरम्भ किया और विश्व इतिहास को खून से रंग दिया। यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
इस्लाम का यही सिलसिला पहले दिन से आज तक चला आ रहा है। ‘द वायर’ में 15 फरवरी 2015 को अर्श दानिश लिखते हैं -“2016 के ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स के मुताबिक, आतंकवाद से होने वाली 74 फीसदी मौतों के पीछे आईएसआईएस, बोको हरम, तालिबान और अल-कायदा का हाथ था।

ये सारे संगठन धार्मिक चरमपंथी विचारों के पोषक हैं।वर्तमान दौर के आतंकवाद के धार्मिक आयाम के कारण विद्वानों का एक बड़ा तबका यह समझने की कोशिश कर रहा है कि कैसे इस्लामी आतंकी संगठन धर्म का इस्तेमाल एक ऐसे नैरेटिव का निर्माण करने के लिए करते हैं, जो कमजोर व्यक्तियों को आकर्षित कर लेता है।”

वास्तव में इस्लाम के तथाकथित विद्वान जिस प्रकार के भाईचारे की बातें करते हुए हमें टी0वी0 चैनलों या समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अपने द्वारा प्रकाशित कराए गए लेखों के माध्यम से दिखाई देते हैं ,हमें उनकी उन मीठी – मीठी बातों पर विश्वास ना करके ‘इस्लाम के सच’ को ही समझना चाहिए। टी0वी0 चैनलों के मालिकों को भी डिबेट में ऐसे इस्लामिक लोगों को ही आमंत्रित करना चाहिए जो ‘इस्लाम’ के सच को स्वीकार करने का साहस रखते हों और संसार को एक ऐसी उत्कृष्ट सोच देने में समर्थ हों जिससे मानवता का प्रचार – प्रसार हो सके और सर्वत्र शांति और प्रेम बिखर जाए।

9 दिसंबर 2015 को ‘पत्रिका’ में छपे एक समाचार के अनुसार -“बरेली में आला हजरत दरगाह के उर्स-ए-रिजवी के आखिरी दिन पूरे विश्व से आए 70 हजार से अधिक मुस्लिम धर्मगुरुओं ने आतंकवादी संगठन आईएस, तालिबान, अल कायदा के खिलाफ फतवे जारी किए हैं। इस्लामी विद्वानों और धर्मगुरुओं ने कहा है कि इन संगठनों के विचार गैर इस्लामी और अमानवीय हैं।
इनकी गतिविधियां इस्लाम के मूल सिद्धांतों के खिलाफ हैं। ऐसे लोग सच्चे मुसलमान नहीं हैं। उर्स में लगभग 15 लाख लोगों ने भाग लिया और उर्स में आतंकवाद के खिलाफ बांटे गए पर्चों पर हस्ताक्षर किए।”
बरेली में जिन मुस्लिम विद्वानों ने इस प्रकार हस्ताक्षर कर यह फतवा जारी किया, वह वास्तव में बहुत प्रशंसनीय है। इस्लामिक बुद्धिवादियों को इस प्रकार का साहस दिखाना चाहिए।
‘इस्लाम और आतंकवाद : वास्तविकता बनाम मिथक’ नामक लेख में 23 मार्च 2019 को डॉ0 मोहम्मद आरिफ लिखते हैं -“हमें यह बात याद रखी चाहिए कि धर्म और हिंसा का कोई सम्बन्ध नहीं हैं, चाहे वह इस्लाम हो या अन्य कोई धर्म। दुनिया में धर्म न्याय, एवं शान्ति स्थापित करने के लिए ही अस्तित्व में आये, न कि बदला लेने और हिंसा फैलाने के लिए। प्रतिकार और हिंसा कभी किसी धर्म का अंग नहीं बन सकते। …और इस्लाम में तो उसका प्रश्न ही नहीं उठता। इस्लाम आतंकवाद का समर्थन नहीं बल्कि खण्डन करता है। नाहिदा की मानें तो जिस तरह लोग विभिन्न व्यवसाय करते हैं उसी तरह आतंक व हिंसा फैलाना आंतकवादियों का व्यवसाय है। उनका किसी धर्म से कोई लेना देना नहीं और उन्हें सिर्फ बहशी दरिन्दा समझना चाहिए, किसी धर्म का अलम्बरदार तो बिल्कुल नहीं।

इस्लाम शब्द सल्म से बना है जिसकी अर्थ शांति है। सही मायने में सल्म शब्द ही इस्लाम धर्म का सार है। इसका अर्थ है शान्ति स्थापित करना और अल्लाह की इच्छा को समर्पित होना। इस्लाम तो अप्रत्यक्ष रूप से भी अत्याचार की बात नहीं करता, हिंसा की बात तो बहुत दूर है। रसूल-ए-अकरम ने सुलह-ए-हुदैबिया में जो शर्ते स्वीकार कीं वह मुसलमानों के पक्ष में नहीं थीं, किन्तु हिंसा से बचने के लिए उन्होंने उन शर्तों को स्वीकार कर लिया जिससे शान्ति स्थापित होती थी।
इस्लाम हिंसा के उपयोग की अनुमति सिद्धांत रूप में बिल्कुल नहीं देता। यदि कभी संघर्ष करना पड़े तो कुरआन की आयत सं0 2:90 का स्पष्ट आदेश है कि अल्लाह के मार्ग में उन लोगों से लड़ो जो तुम्हारे विरूद्ध लड़ते हैं, किन्तु आक्रामक मत बनो। अल्लाह आक्रमणकारियों को निश्चित रूप से पसंद नहीं करता। यहाँ पर अल्लाह के मार्ग में लड़ने का तात्पर्य है इंसाफ के लिए लड़ना, दयालु, एवं करूणामय समाज की स्थापना के लिए लड़ना न कि हिंसा के लिए।”
हम आरिफ साहब की उपरोक्त सभी बातों से सहमत नहीं हैं , परन्तु इतना अवश्य कहना चाहेंगे कि जब इस्लाम की गलत व्याख्या करने के लिए इस्लाम के राजनीतिक वारिसों और मुखियाओं अथवा खलीफाओं में बैठकर मानवता के विनाश की योजना बन रही थी ,उसी समय इस्लाम का तथाकथित शान्तिवादी स्वरूप और उसका मानवतावादी चिंतन समझो नीलाम हो गया था ।

यदि वास्तव में इस्लाम शान्ति की स्थापना के लिए स्थापित किया गया था और इस्लाम का वास्तविक अर्थ भी यही है जो आरिफ साहब कह रहे हैं तो उसके पश्चात अब तक के इस्लामिक विद्वानों को यह व्यवस्था कर लेनी चाहिए थी कि इस्लाम के नाम पर कोई भी व्यक्ति न तो रक्तपात करेगा और न ही किसी दूसरे मजहब के मानने वाले व्यक्ति पर अत्याचार करेगा । पर इस ओर निश्चित रूप से कोई भी सार्थक पहल या प्रयास इस्लामिक विद्वानों और राजनीतिक नेताओं की ओर से नहीं किये गये। सबसे बड़ी चिंता का कारण यही है।

“यूरोप पर आतंकवाद के भयावह बादल”- के लेखक राम यादव लिखते हैं – “इस्लामी जगत के नेता, धर्माधिकारी और अधिकतर बुद्धिजीवी भी इस्लामवादी आतंकवादी गिरोहों और उनके आतंकी हमलों की दो टूक निंदा करने, फ़तवा जारी करने, उनका सामाजिक बहिष्कार करने या आतंकवादियों को दंडित करने के प्रश्न पर कुछ कहने-करने से कतराते रहे हैं।
यह कहकर हाथ झाड़ते रहे हैं कि ‘आतंकवाद का इस्लाम से कोई सम्बन्ध ही नहीं है’ या ‘आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता।’ उनकी यह तोतारटंत सुन-सुनकर जनसाधारण के कान पक गए हैं। यह सन्देह पक्का होता लगने लगा है कि इस्लामी जगत मन ही मन आतंकवादियों के साथ है और शायद सोचता है कि वे यदि दुनिया का इस्लामीकरण करना चाहते हैं, तो कुरान के आदेश का ही तो पालन कर रहे हैं! इस्लामी जगत की सोच में हालांकि अब कुछ आत्मचिंतन भी जरूर आया है, किन्तु पश्चिमी संवेदनाओं की दृष्टि से वह पर्याप्त नहीं है।” (वेब दुनिया’ से)

राम यादव जी की यह चिन्ता अपने आपमें पूर्णतया उचित है। लोग बाहरी दिखावे की बातें करते हैं। वास्तविकता के धरातल पर जो कुछ घट रहा होता है उसकी कठोर शब्दों में कठोर निन्दा नहीं करते और ना ही ऐसी खराब बातों को करने वाले लोगों का विरोध करते हुए कहीं दिखाई देते हैं । इसके विपरीत वे इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले लोगों का समर्थन करते हुए या बचाव करते हुए दिखाई देते हैं।
वास्तव में ये लोग जानते हैं कि इस्लामिक आतंकवाद के नाम पर उनके लोग जो कुछ भी कर रहे हैं वह सब उनकी पवित्र पुस्तक द्वारा दी गई आज्ञाओं के अनुरूप है। इसलिए वह हिन्दू समाज के लोगों के बीच अपनी वाहवाही लूटने के दृष्टिकोण से चाहे ऐसी बात कर लें पर वास्तव में उनकी सहमति अपने सम्प्रदाय के लोगों के साथ ही होती है, क्योंकि वह जानते हैं कि उनके लिये अल्लाह का स्पष्ट आदेश है कि काफिरों को किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं है।
इस प्रकार की व्यवस्थाओं ने मुस्लिमों को यह समझाने का प्रयास किया है कि उनका अल्लाह भी मुसलमान है। जब इस सृष्टि के बनाने वाले परमपिता परमेश्वर के प्रति भी इस प्रकार का साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह लोगों के भीतर घर कर जाता है तो यह कट्टर साम्प्रदायिकता को जन्म देता है।

– डॉ राकेश कुमार आर्य

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