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विशेष संपादकीय वैदिक संपत्ति

मनुष्य का आदिम ज्ञान और भाषा-7

गतांक से आगे….
अहिंसा जहां दूसरों को सताना मारना मना करती है, वहां स्वयं दीर्घ जीवन प्राप्त करने की ओर भी प्रेरणा करती है। दीर्घ जीवन प्राप्त करने का सबसे बड़ा साधन प्राणायाम है। योरप में प्राणायाम का प्रचार बढ़ रहा है। डॉक्टर ‘मे’ कहते हैं कि जिससे हम स्वांस लेते हेँ, उसी वायु पर हमारा जीवन अवलंबित है और उसी से हमारी जीवनशक्ति संचरित होती है। यदि हम लोग शुद्घ हवा में यथासंभव निवास करें तो बड़ा लाभ होगा। रोगी मनुष्य हर प्रकार के व्यायाम को थोड़ा थोड़ा आरंभ करें और क्रमश: बढ़ावें। उनका लक्ष्य ‘थोड़ा मगर सदैव’ की ओर रहना चाहिए।
प्राणायाम और दीर्घ स्वसन
प्रत्येक लड़के और लड़की को दीर्घ श्वांस-प्रश्वास लेने के महत्व को बता देना चाहिए और उचित अध्यक्ष की अध्यक्षता में अभ्यास कराना चाहिए। इसका प्रभाव मन और शरीर दोनों पर अच्छा पड़ेगा। इससे शरीर के सब अंग दृढ़ होकर मन के सुयोग्य और प्रशस्त सेवक बन जाएंगे। फेफड़ों का जीवन पराक्रम अधिक से अधिक वायु भीतर भरकर अधिक से अधिक वायु बाहर निकालने पर निर्भर है।
दीर्घ और नियमित श्वांस-प्रश्वास से मन की एकाग्रता करने में निश्चय सहायता मिलती है। अभ्यास करने वालों को चाहिए कि पहिने हुए कपड़ों को ढीला करके अपने फेफड़ों को मंद तथा एक सा वायु से पूर्णतया भर लेवें। श्वास को बिना अति उद्योग के रोके रहें और धीरे-धीरे एक सा बाहर को फेंके। इस अभ्यास से शांत और ओजस्विनी अवस्था प्राप्त होती है, जो कि एक शक्तिशाली व्यक्ति के लिए आवश्यक है। जब श्वास ले रहे हों, तब प्रेम, स्वास्थ्य या आनंद की एक गंभीर भावना को अंदर प्रवेश करें। जब तक श्वास रोके रहें, तब तक उसी भावना को रोके रहें और प्रश्वास के समय उसको भी बाहर फेंक दें। इन क्रियाओं के द्वारा पाश्चात्य विद्वानों ने प्राणायाम को सिद्घ कर लिया है। वे मनमाने समय तक बिना श्वास लिये मृतवत रह सकते हैं। एडिनबरो के डॉक्टर डंगन एक विद्यार्थी के विषय में लिखते हैं कि वह भी कर्नल टौनशैंड की तरह मृतवत होकर सफलतापूर्वक प्राण लौटा लिया करता था। उन लोगों के हालात लिपिबद्घ हो चुके हैं, जिन्हें हृदय की गति को इच्छापूर्वक रोकने की शक्ति प्राप्त है। नामी यंत्र भी बन गया है जिससे प्राणायाम सीखने में सुगमता होती है। योरप के कई एक स्थानों की शिक्षा प्रणाली में भी प्राणायाम जोड़ दिया गया है और यह यंत्र भी काम में लाया जाता है।
आहार-विहार
दीर्घ आयु, समता और सभ्यता के जीवन में जो सबसे बड़ी बात है, वह आहार और विहार की है। निरामिष और अमादक पदार्थों को खा-पीकर ब्रह्मचर्यपूर्वक सादा जीवन बिताना ही उच्च और सात्विक जीवन कहलाता है। भारत देश के दो चार महापुरूषों के कारण योरप निवासियों के आहार, विहार और आचार में भी क्रांति हो रही है। स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी आदि के विचारों ने वहां जो काम किया है, वह नीचे लिखे दो चार पत्रों से ज्ञात होता है। स्वामी दयानंद को ष्टह्वद्वड्ढद्गह्म्द्यड्डठ्ठस्र से रूह्म्. रूद्बद्यस्र, रू.ष्ठ. ने तारीख 17-6-1879 के पत्र में लिखा था कि मेरी कामना केवल यही नही है कि सत्य को जानूं प्रत्युत यह है कि जहां तक मेरी आत्मा और शरीर से हो सके यथाशक्ति सत्य का जीवन व्यतीत करूं। दूसरे पत्र में एक दूसरे सज्जन क्कद्गह्लद्गह्म् ष्ठड्ड1द्बस्रशह्यठ्ठ ने स्ष्शह्लद्यड्डठ्ठस्र से लिखा था कि मैंने मांस खाना छोड़ दिया है और मद्यपान आदि नशों को भी त्याग दिया है। यद्यपि मेरा विवाह हो चुका है, परंतु मैं ब्रह्मचारियों सा जीवन व्यतीत कर रहा हूं। मुझे धन और सांसारिक पदार्थों की अभिलाषा नही है। मेरी जिज्ञासु आत्मा के भीतर केवल यही प्रेरणा होती है कि इस बात का ज्ञान हो कि मनुष्य वास्तव में क्या है और वह क्या बन सकता है? साथ ही मैं सदाचार में अपने आपको निपुण करना चाहता हूं जिससे मैं इस योग्य बन जाऊं कि ब्रह्मा के साथ अपनी आत्मा को मिला सकूं ।
इसी तरह के पत्र महात्मा गांधी के नाम भी आए हैं, जिनमें से दो पत्र यहां दिये जाते हैं। आस्ट्रिया निवासी एक दंपत्ति के पत्रों में से पत्नी का पत्र इस प्रकार का है कि यहां सब लोग हिंदोस्थान को विचित्र प्राणियों और चमत्कारिक घटनाओं का संग्रहस्थान समझते हैं। जो अहिंसा संसार को तारने वाली है और जिस अहिंसा द्वारा हिंद के लोग संसार की सेवा करने वाले हैं, उसकी किसी को कुछ भी खबर नही है। मेरे पति के साथ मेरा संबंध आध्यात्मिक है। इसके कारण हम लोग एक दूसरे को दूसरे विवाहित जोड़ों की अपेक्षा अधिक अच्छी प्रकार समझते हैं। ब्रह्मचर्य पालन करना मेरे पति को प्रारंभ में बहुत कठिन लगा, इससे मैंने कई बार अपने को उलाहना भी दिया, परंतु आपका लेख पढ़कर तो हम लोगों ने समझ लिया कि इसमें मेरे पति की आत्मोन्नति ही है। इसके वास्ते आपका कितना उपकार मानूं? पश्चिम के विज्ञान में नास्तिकता भरी हुई है। इतना ही नही किंतु पश्चिम की कला में भी मैंने नास्तिकता ही देखी है। हमारे यहां भी धर्म है। परंतु यहां का समाज धर्म पाल ही नही सकता। हमको सादगी पसंद हो, हम अपना काम अपने हाथ से कर लें और हम अपनी छत पर पक्षियों को दाना चुगायें, तो यह भी लोगों को चुभता है। हम जीव दया की बात कहते हैं, तथा वृक्षों और तरूओं के बचाने की बात कहते हैं, तो लोग हम पर हंसते हैं।
यहां की शराबखोरी से तो बस तौबा है, हर प्रकार से यहां के लोग विषयों में लीन हैं। परंतु हम समझते हैं कि हमको अधीर न होना चाहिए। हमको भी अपना धर्म संभालना चाहिए। परमेश्वर ने हमें जहां पैदा किया है वहां हमारा धर्म क्या है, यह समझकर ही चलना चाहिए। परमेश्वर की कृपा से हमको एक आश्वासन मिला है-हम भगवतगीता बांचने लगे हैं। गीता जैसा शांतिप्रद ग्रंथ साहित्य में दूसरा कोई नही है।
भारत में मैंने जो कुछ प्राप्त किया है, उस ऋण का बदला वहां जन्म लेकर और उसकी सेवा करके ही चुकाया जा सकता है।
पति का पत्र इस प्रकार का है-मेरी उम्र 40 वर्ष की है। बीस वर्ष तक मैं जिस वस्तु के लिए मारा-मारा फिरता हूं, वह वस्तु मुझको मिल गयी है। आपके लेखों के पढऩे से मानव बंधुओं और मानव जाति से निम्न श्रेणी के प्राणियों के प्रति मेरे भाव बिलकुल बदल गये हैं। विश्वविद्यालय में मैं रोग शास्त्र का शिक्षक हूं। इतने अनुभव के परिणाम से मैं देखता हूं कि रोग निवारण करने में कुदरती इलाज-सूर्य प्रकाश, हवा, पथ्याहार और जीवनक्रम आदि-जैसी दूसरी एक भी वस्तु नही है। मैं तो खास अपने उद्घार के लिए आज तक आरोग्यविषयक सामान्य ज्ञान नामी पुस्तक पढ़ता हूं। ‘गृहप्रकरण’ में आपने जो विचार दर्शाए हैं उसका अमल बहुत से लोग अवश्य समझते हैं पर हम उनका पालन कर रहे हैं। मुझको प्रतीत हेाता है कि मनुष्य के विकास का माप उसका विषयेन्द्रिय पर काबू है। जो शांति और संतोष मुझको पश्चिम का विज्ञान नही दे सका, वह अब मुझको मिल गया है और परम शांति का साधन मार्ग मेरी समझ में आ गया है। मैं आपके सिद्घांतों के योग्य बनने का प्रयत्न करूंगा, तथा अपनी आत्म मति और शक्ति के अनुसार अपने आसपास के वायुमण्डल में आपके सिद्घांतों के प्रचार का प्रयत्न करूंगा।
इसी प्रकार स्वामी विवेकानंद से दीक्षित होकर आज अमेरिका के सैकड़ों योग्य विद्वान संन्यास धारण कर संन्यासी जीवन बिता रहे हैं और भारत माता की महिमा गा रहे हैं। पाश्चात्य विज्ञान बड़ी अशांति फेेलाने वाला है, इसलिए सब लोग भारत माता की ओर देख रहे हैं। पेरिश से लूर्ड फ्लिंच कविता द्वारा लिखते हैं कि हे भारतमाता! हम तेरे पुत्र हैं, तू हमें सहायता दे। तेरी सहायता और सहानुभूति के लिए हम टकटकी लगाये हैं। हमारा मार्ग अशांत और कण्टकमय है। हम तेरे पुत्र हैं। तू हमारे आविर्भाव के पहले ही उन्नति के उच्चतम शिखर को पहुंच चुकी है। हम तेरे असल वैदिक पुत्र हैं, हम तेरी ही सहायता से संसार में उन्नति कर सकते हैं, अतएव हे भारत माता तू हमें सहायता दे।
क्रमश:

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