गतांक से आगे….
इस व्याकुलता को सांड, भैंसा, बकरा आदि तुरंत ही मालूम कर लेते हैं और गर्भ स्थापन कर देते हैं। जिन मादा पशुओं को आवश्यकता नही है, उनके नर उनकी ओर दृष्टिपात भी नही करते। किंतु मनुष्य में यह बात बिलकुल नही पाई जाती। न तो ऋतुमती स्त्री को ही कोई विलक्षण व्याकुलता होती है, न पुरूष ही को उसके गंध, रूप स्पर्श आदि से उसकी इच्छाओं का भान होता है और न समीप जाने से कोई उत्तेजना ही होती है। यदि ऐसा होता तो संसार की समस्त सामाजिक व्यवस्था ही बिगड़ जाती। ऐसी दशा में मनुष्य रतिविषयक नियम कुदरत के सहारे पर नही बना सकता। उसे तो इतने दिन ऋतु के छोड़कर और इतने इतने दिन अन्य तिथियों के छोड़कर केवल अमुक दिन अमुक समय हो आदि नियम बनाने पड़ेंगे, जो बिलकुल उसके विचारों से ही संबंध रखते होंगे, कुदरत से नही।
जो हाल विहार का है, उससे भी अधिक जटिल समस्या आहार की है। संसार में देखते हैं कि जो पशु मांस खाता है, वह घास नही खाता और जो घास खाता है, वह मांस नही खाता। किंतु मनुष्य फल दूध अन्न और मांस आदि सभी कुछ खा जाता है। यहां तक कि वह मिट्टी भी खाने लगता है। आहार के लिए कुदरत उसे बिलकुल मदद नही देती। वह नही बतलाती कि उसकी निजी खुराक क्या है? उसे तो अपनी ओर से ही दांत, आंत और मेदे आदि की देखभाल करके निश्चित करना पड़ता है कि मनुष्य की खुराक क्या है? जीवन के इन दोनों प्रधान विषयों में मनुष्य बिना अपने निर्धारित नियमों के, कुदरती प्रेरणा से कुछ भी नही कर सकता। इसलिए केवल कुदरत की पुकार करने से ही काम नही चल सकता। प्रत्युत यह जानने की आवश्यकता होती है कि यथार्थ में हमें अपना आहार विहार किस प्रकार बनाना चाहिए।
दूसरी त्रुटि यह है कि जो रहन-सहन कुदरत की ओर लौटाने वाले विद्वानों ने बतलाई है, वह कुछ ही खास आदमियों के पालन करने योग्य है, किसी देश या जाति के लिए नही। क्योंकि इस प्रकार के सीधे सादे नियमों के पालन करने वाले व्यक्ति या समाज दुष्टों से अपनी रक्षा नही कर सकता। भारत वर्ष इस बात का ज्वलंत प्रमाण है। आंख के सामने एक सहस्र वर्ष से सीधे सादे हिंदुओं को विदेशी कुचल रहे हैं। इसलिए इन विद्वानों को यह भी बतलाना चाहिए था कि कुदरत के अनुसार बर्तन वाले सीधे सादे मनुष्य दुष्ट और आसुरी संपत्तिवालों के हाथ से कैसे बच सकेंगे।
तीसरी त्रुटि है-आदिम अवस्था की जांच की। कुदरत की ओर इशारा करने वाले विद्वान मनुष्य ही रहन सहन का सच्चा सांचा ढूंढऩे के लिए मनुष्य की आदिम अवस्था की जांच करते हैं। उनका विश्वास है कि मनुष्य अपनी आदिम अवस्था में सच्चे रहन-सहन के साथ था। हम भी कहते हैं कि ठीक है, था। परंतु प्रश्न तो वही उपस्थित है कि आदिम अवस्था में वह अपने लिए आजकल की ही भांति आहार बिहार के नियम सोच विचार कर निश्चित करता था, या पशु पक्षियों की भांति उसे कुदरत स्वयं वैसा करने के लिए विवश करती थी? हम देखते हैं कि आज कुदरत उसे कुछ भी शिक्षा नही देती। अत: आदिम अवस्था में भी यही हाल रहा होगा। मनुष्य और पशु में अंतर ही यह है कि मनुष्य अपने नियम स्वयं बनाता है और पशु कुदरती जीवन व्यतीत करता है। अतएव मनुष्य के पास सोच विचार कर बनाये हुए कुछ नियम अवश्य होंगे, जो आज तक पाए जाते हैं। परंतु इन विद्वानों ने उन नियमों के ढूंढऩे की कुछ भी चेष्टा नही की। संभव है कोई विद्वान इस प्रश्न का यह उत्तर दे कि आरंभ में मनुष्य के अंदर कुदरत के नियमों के पालन करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति उसी तरह थी, जिस प्रकार पशुओं में है, तो हम नम्रतापूर्वक निवेदन करेंगे कि वह मनुष्य पशु ही था, मनुष्य नही। उसका मनुष्य नाम तो मनन अर्थात स्वतंत्र चिंतन से ही पड़ा है।
मनुष्य जाति के नियम बड़े विलक्षण हंै। उसके समस्त नियमों में मर्यादा है और मर्यादा में अपवाद है। शेष जितने प्राणी हैं, उनके लिए कुदरती नियम मुकर्रर हैं। वे उनको तोड़कर अपवाद नही कर सकते। परंतु मनुष्य अपने नियमों को मर्यादित करता है और उस मर्यादा के ही अंदर अपवाद भी रखता है। मनुष्य के आहार और विहार आदि में मर्यादा और अपवाद दोनों पाये जाते हैं। किंतु पाश्चात्तय विद्वानों द्वारा जो नियम निकाले गये हैं, उनमें केवल पशुदशा पर ही प्रकाश डाला गया है। कुदरती जीवन पर ही जोर दिया गया है, मर्यादा और अपवाद पर नही। योरप वालों में यह त्रुटि है कि वे जब भौतिक उन्नति की ओर मुड़े तो उसका अंत कर दिया और जब कुदरत की ओर मुड़े तो पशुओं की तरह जंगलों में नंगे रहने लगे। उनको सामंजस्य उत्पादक मानवी नियम सूझते ही नही। यद्यपि पाश्चात्यों का ध्यान भारतवर्ष की प्राचीन संस्कृति की ओर भी आकर्षित हो रहा है, आर्य सभ्यता की खोज वे बड़े यत्न से कर रहे हैं, खोज ही नही करते, प्रत्युत अपना वैसा ही जीवन बनाने का भी प्रयत्न कर रहे हैं। तथापि अब तक आर्य सभ्यता के मूल सिद्घांत (1) आरंभिक ज्ञान, (2) मर्यादित नियम और (3) अपवादों की व्यवस्था की ओर उनका ध्यान नही गया। भारत की वैदिक आर्य सभ्यता न तो जंगली मूर्ख असभ्यों की सी है और न वर्तमान भौतिकवादी पाश्चात्यों की सी। वह अपने ढंग की निराली है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति और समस्त मानव तथा प्राणिसमूह को एक समान ही लाभ पहुंचाने का आयोजन है। अत: जब तक उसकी आरंभिक ज्ञानावस्था मर्यादा और अपवाद की त्रिपुटी पूर्ण रीति से स्वीकार न कर ली जाए, तब तक संसार की कोई भी व्यवस्था चिरस्थायी नही हो सकती। समाज चाहे जितना उत्तम बनाया जाए, उसमें अपवाद रूप से दुष्ट मनुष्य अवश्य पैदा हो जाएंगे। इसीलिए मर्यादित नियमों में अपवादक नियम अवश्य बनाने पड़ेंगे, फिर चाहे वे आहार विहार, युद्घ-राज्य और प्रेम, दया आदि किसी विषय से संबंध रखते हों।
आदि सृष्टि में ऐसे ही नियम थे। परंतु स्मरण रखना चाहिए कि ये आदिम नियम ऐसी वस्तु नही है कि जो वैज्ञानिकों की प्रयोगशाला या दार्शनिकों के विचारों से निकल पड़ें। इन नियमों का पता तो आर्यों के इतिहास से ही लग सकता है कि आदि सृष्टि में मर्यादा और अपवाद अर्थात धर्म और आपद्घर्म की क्या व्यवस्था थी? हमारा जवाब है कि वेद ही आदि सृष्टि (आरम्भिक अवस्था) का ईश्वरीय कानून है। वेदों में सदैव के लिए मर्यादित धर्म और अपवादों के लिए आपद्घर्म का वर्णन है। अत: जो कुछ वेदों में कहा गया है, मनुष्यजाति को उसी के अनुसार व्यवहार करने से लाभ हो सकता है, कुदरत के अनुसार नही। इसलिए इस उपक्रम के पश्चात आगे के प्रकरणों में हम आप देखेंगे कि वेद कितने प्राचीन हैं, किस प्रकार अपौरूषेय है और उनमें मनुष्य के लिए मर्यादा और अपवाद अर्थात धर्म और आपद्घर्म की क्या अवस्था है?

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