दया के ये कैसे अर्थ?

दया का राजनीतिकरण कानून की मर्यादाओं पर अतिक्रमण करता दिखाई दे रहा है। बेशरमी की यह हद संविधान, संसद और न्यायालय को एक साथ ठेंगा दिखा रही है। केंद्र के कड़े रुख के बावजूद तमिलनाडू की जयललिता सरकार राजीव गांधी के सातों हत्यारों को रिहाई देने के फैसले पर अड़ी है। प्रदेश सरकार को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के परिपेक्ष्य में सोचने की जरूरत है कि रिहाई और माफी के बीच बड़ा फर्क है ? अदालत ने राजीव गांधी हत्या के दोषियों के प्रति अधिकतम उदारता बरतते हुए फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील किया है। ऐसा दोषियों के परिजनों द्वारा राष्ट्रपति को पेश दया याचिका पर 11 साल बाद भी फैसला नहीं होने के कारण करना पड़ा। लेकिन अदालत ने आरोपियों को दोषमुक्त नहीं किया ? जयललिता सरकार अदालत से एक कदम आगे बढ़कर दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 432 और 433 के तहत मिले अधिकारों का उपयोग करके दोषियों को बरी कर रही है। ऐसा होता है तो देश में संदेश जाएगा कि जब पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारों को सजा नहीं मिल सकती तो आम आदमी की औकात ही क्या है? यह फैसला सत्तारुढ़ दल के लिए तात्कालिक लाभ की दृष्टि से तो लोक-लुभावन हो सकता है, लेकिन अंतत: यह फैसला गैर-जिम्मेदाराना ही है।
राजीव गांधी हत्याकांड में संथम, मुरुगन और पेरारिवलन को मौत की सजा मिली थी। इन तीनों मुजरिमों ने दया याचिका के निपटारे में अधिकतम विलंब के आधार पर फांसी की सजा के निर्णय पर अमल के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया था। नतीजतन प्रधान न्यायाधीश पी. सदाशिवम की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने मृत्युदंड की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। तमिलनाडु सरकार को तो जैसे इसी फैसले का इंतजार था? उसने आनन-फानन में राजीव गांधी के सभी सातों हत्यारों की रिहाई का फरमान जारी कर दिया। तमिलनाडु के ज्यादातर राजनीतिक दल इस फैसले पर सहमति जताने पर अग्रणी दिखाई दिए। यहां तक की एक-दूसरे को फूटी आंख भी नहीं सुहाने वाले करुणानिधि ने जयललिता के इस फैसले पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी। विकृत हो रही भारतीय राजनीति की पतनशीलता का यह चरम है। मानवाधिकारवादी भी प्रसन्न हैं। उनकी दलील है कि इस फैसले की प्रतिच्छाया में हत्या और बलात्कार जैसे जघन्यतम अपराधों में सजा पाए 90 फीसदी दोषी दोषमुक्त हो जांएगे ? लेकिन विंडबना देखिए उनके मानवाधिकार-हितों की कोई परवाह नहीं कर रहा, जिनके परिजन हत्यारों की निर्ममता के षिकार हुए ? क्या उनकी कोई विषिश्ट षारीरिक संरचना है कि उन्हें कोई मानसिक संताप होता ही नहीं ? राजीव गांधी हत्या के समय उनकी सुरक्षा में लगे वे कमांडों भी मारे गए थे, जो अपने कर्तव्य का पालन कर रहे थे ? 23 साल यदि हत्यारों और उनके परिजनों ने फांसी की सजा पर असमंजस की पीड़ा झेली तो अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा की वेदना से वे लोग भी गुजरे हैं, जिनके रक्तसंबंधी दायित्व का निर्वहन करते हुए नृषंस हत्या की चपेट में आ गए थे। हत्यारों को बरी कर देने का फैसला क्या बलिदानियों के बलिदान का अवमूल्यन नहीं है? जाहिर है, सुप्रीम कोर्ट का यह तर्क भी गले उतरने वाला नहीं है कि यदि दया याचिका के निराकरण में देरी हो रही है तो दुर्दांत अपराधियों की सजा कम कर दी जाए?
यह ठीक है कि संविधान में दया याचिकाओं के निपटारे की कोई समय-सीमा तय नहीं है, लेकिन इसका आशय यह कतई नहीं है कि दया याचिकाएं अनंतकाल तक लटकी रहें? गौरतलब है कि आठवें दशक तक दया याचिकाओं के निराकरण में इतना समय नहीं लगता था। न्यूनतम 15 दिन और अधिकतम एक वर्ष की अवधि में फैसला ले लिया जाता था। किंतु नवें दशक के अंत तक पहुंचते-पहुंचते यह अवधि बढ़कर औसत चार वर्ष हो गई और 21वीं सदी के पहले दशक में तो अनिश्चितकाल तक निर्णय टाले जाते रहे। यही वजह रही कि 12 साल तक दया याचिका पर कोई निर्णय नहीं होने पर सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार विलंब को आधार बनाकर 22 जनवरी 2014 को 15 दोषियों को मिले मृत्युदंड को उम्रकैद में बदला। इनमें कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन के चार सहयोगी शामिल थे, वहीं राहत पाने वालों में एक गुरमीत सिंह भी था जिसने एक ही परिवार के 13 लोगों की नृशंस हत्या कर दी थी। इसी कड़ी में राजीव गांधी के हत्यारों को सजा में रियायत को दी और तमिलनाडु सरकार ने अगले ही दिन हत्यारों के बरी होने का राज्य मंत्रीमण्डल में फैसला ले लिया। क्या मानवता के ऐसे दुश्मनों पर रहम बरतना उचित है ? क्योंकि ये सब वे हत्यारे हैं, जिनकी सजा की तस्दीक सुप्रीम कोर्ट भी कर चुकी है। तब क्या सुप्रीम कोर्ट की जवाबदेही पर सवाल खड़ा नहीं होता ?
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों फैसलों में दोषियों की सजा कम की है, उन्हें दोषमुक्त नहीं किया ? जबकि जयललिता सरकार ने राजनीतिक लाभ की दृष्टि से हत्यारों को बरी करके न केवल कानून का मखौल उड़ाया है, अलबत्ता भारतीय न्याय व्यवस्था के जगहंसाई का इंतजाम भी कर दिया है। क्योंकि इसी कड़ी में खालिस्तानी लिबरेशन फोर्स के आतंकवादी देविंदरपाल सिंह भुल्लर की दया याचिका विचाराधीन है। भुल्लर को 1993 में भारतीय युवक कांग्रेस के दिल्ली स्थित मुख्यालय पर हुए बम विस्फोट के अपराध को अंजाम तक पहुंचाने के जुर्म में मौत की सजा सुनाई गयी थी। इस वारदात में नौ लोग मारे गए थे और उग्रवाद के विरुद्ध निरंतर संघर्ष कर रहे तत्कालीन युवक कांग्रेस अध्यक्ष एमएस बिट्टा समेत 25 अन्य लोग जख्मी हुए थे। इस हमले में बिट्टा स्थायी विकलांगता के भी शिकार हुए हैं। हालांकि भुल्लर की याचिका 14 मई 2011 को राष्ट्रपति ने खारिज कर दी है, लेकिन पंजाब में उग्रे कौमी भावना के चलते निश्चित तारीख को पंजाब सरकार भुल्लर को फांसी नहीं दे पाई। अब भुल्लर की पत्नी नवनीत कौर ने विलंब के आधार पर अदालत से दया की गुहार लगाई है। जाहिर है, सुप्रीम कोर्ट को सजा में तब्दीली पर पुनर्विचार करना होगा ? यदि ऐसा नहीं होता है तो 1984 के सिख विरोधी दंगों के जो संदिग्ध दोषी हैं, वे भी इस मामले में बार-बार जांच से हो रही मानसिक पीड़ा के बहाने दया की भीख मांगने अदालत की शरण में चले आएंगे ? दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इन दंगों की जांच के लिए विशेष जांच दल गठित कर चुके हैं। अरविंद को ऐसा इसलिए करना पड़ा, क्योंकि दंगे भड़काने के लिए जिन नेताओं को जि

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