निधि समर्पण अभियान से आरक्षित के हिंदू सशक्तिकरण को मिल रहा है बल

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ललित गर्ग

एक सकारात्मक वातावरण के अन्तर्गत आने वाले समय में अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण पूरा होने तक ऐसे जागृति अभियान और हिन्दुत्व को संगठित करने के कार्यक्रम चलते रहेंगे जिनसे भारत सहित संपूर्ण विश्व में फैले हिंदुओं के अंदर हिंदुत्व चेतना जागृत रहे।

अयोध्या में भव्य श्रीराम मन्दिर निर्माण को लेकर देशभर में चल रहा निधि समर्पण अभियान जहां सामाजिक समता एवं सौहार्द का दर्पण है वहीं भारतीय जनता पार्टी एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दुत्व सशक्तिकरण का माध्यम भी है। विश्व हिन्दू परिषद इसके माध्यम से ऊंच-नीच, संकीर्णता, स्वार्थ एवं जातिवाद का भेद मिटाकर हिन्दू समाज को एकजुट एवं सशक्त करने में जुटी है। राम मंदिर निर्माण संघ के लिए हिंदुओं के पुनर्जागरण और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का लक्ष्य हासिल करने का एक महत्वपूर्ण चरण रहा है।

आजादी के बाद से ही हिन्दुत्व को कमजोर करने एवं हिन्दू आस्था केन्द्रों के प्रति राजनीतिक उपेक्षाएं बढ़ती ही गयी थीं। वैसे मध्यकाल एवं विशेष मुस्लिम शासकों ने बड़ी मात्रा में हिन्दू आस्था के केन्द्रों एवं हिन्दू-आस्था को ध्वस्त किया। संघ एवं उससे जुड़े संगठन ही एकमात्र ऐसी रोशनी रही है जिन्होंने हिन्दुओं के अंदर यह भाव पैदा किया कि उनके आस्था केंद्रों पर चोट पहुंचाई गई, उनको तोड़ा गया, दूसरे मजहब के केंद्र बनाए गए, जबरन धर्म परिवर्तन किया गया, शिक्षा पद्धति में हिन्दुत्व की उपेक्षा की गयी और अब उन सबको मुक्त कराना हमारा धर्म है एवं दायित्व भी। संघ धीरे-धीरे लोगों के अंदर ये भावनाएं पैदा करने में सफल हुआ है। उनके अंदर यह विश्वास कायम हो रहा है कि भाजपा सत्ता में रहेगी तो आस्था केंद्रों की मुक्ति का रास्ता आसान होगा, न केवल आस्था केन्द्रों का बल्कि हिन्दुत्व के अजेंडे़ को भी तभी पूरा किया जा सकेगा।

संघ और भाजपा के एजेंडे में श्रीराम मन्दिर के अलावा कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाना, समान नागरिक संहिता लागू करना, गोवंश हत्या निषेध और लव जिहाद को रोकने के आशय वाले कानूनों का निर्माण करना शामिल है। एक बड़ा मसला अब मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि और काशी में श्रीविश्वनाथ की मुक्ति का है। मथुरा से संबंधित मामले न्यायालय में विचाराधीन हैं। संघ चाहता है कि मथुरा की तरह ही काशी विश्वनाथ और संपूर्ण भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में छोटे-बड़े मंदिरों के मामले न्यायालयों में डाले जाएं। हिन्दुत्व आस्था एवं संस्कृति को बहुत जतन से बर्बरतापूर्वक कुचला गया, अब पुनः हिन्दुत्व संस्कृति को गरिमा प्रदान करते हुए उसे जीवंत करने का अभियान चल रहा है। हिन्दू घोर अंधेरी रात के साक्षी रहे हैं, एक-दूसरे का हाथ नहीं थामेंगे तो सुबह की दहलीज पर नहीं पहुंच पायेंगे।

एक सकारात्मक वातावरण के अन्तर्गत आने वाले समय में मंदिर का निर्माण पूरा होने तक ऐसे जागृति अभियान और हिन्दुत्व को संगठित करने के कार्यक्रम चलते रहेंगे जिनसे भारत सहित संपूर्ण विश्व में फैले हिंदुओं के अंदर हिंदुत्व चेतना जागृत रहे। संघ अपनी स्थापना के समय से ही हिंदू राष्ट्र की बात करता है। संघ नौ दशकों बाद दुनिया के सबसे बड़े संगठन के रूप में खुद को स्थापित कर पाया है तो इसका कारण स्पष्ट नीति, सकारात्मक सोच, संस्कृति-विचार एवं अपनी जड़ों को मजबूती प्रदान करना है।

दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना केशव बलराम हेडगेवार ने की थी। भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लक्ष्य के साथ 27 सितंबर 1925 को विजयदशमी के दिन आरएसएस की स्थापना केशव बलिराम हेडगेवार व संघ के कार्यकर्ताओं द्वारा की गई थी। हेडगेवार के साथ विश्वनाथ केलकर, भाऊजी कावरे, अण्णा साहने, बालाजी हुद्दार, बापूराव भेदी आदि थे। उस वक्त हिंदुओं को सिर्फ संगठित करने का विचार था। संघ परिवार या भाजपा का मानना है कि भारत हिंदू राष्ट्र था, है और रहेगा।

संघ का दावा है कि उसके एक करोड़ से ज्यादा जीवनदानी समर्पित सदस्य हैं। संघ परिवार में 80 से ज्यादा समविचारी या आनुषांगिक संगठन हैं। दुनिया के करीब 40 देशों में संघ सक्रिय है। मौजूदा समय में संघ की 56 हजार से अधिक दैनिक शाखाएं लगती हैं। करीब 13 हजार 847 साप्ताहिक मंडली और 9 हजार मासिक शाखाएं भी हैं। संघ ने अपने लंबे सफर में कठोर संघर्ष के उपरान्त कई उपलब्धियां अर्जित कीं जबकि तीन बार उस पर प्रतिबंध भी लगा। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या को संघ से जोड़कर देखा गया, संघ के दूसरे सरसंघचालक गुरु गोलवलकर को बंदी बनाया गया। लेकिन 18 महीने के बाद संघ से प्रतिबंध हटा दिया गया। दूसरी बार आपातकाल के दौरान 1975 से 1977 तक संघ पर पाबंदी लगी। तीसरी बार छह महीने के लिए 1992 के दिसंबर में लगी, जब 6 दिसंबर को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी गई थी। तमाम वितरीत परिस्थितियों एवं अवरोधों के, संघ हर बार अधिक तेजस्विता एवं प्रखरता से उभर कर सामने आया।

 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सम्पूर्ण साहस, सूझबूझ एवं तय सोच के साथ वैसे कदम उठा रहे हैं जिनकी चाहत संघ परिवार के एक-एक कार्यकर्ता और समर्थक के अंदर सालों से कायम रही है। दिशा एवं दशा, समय और संयोग भी उनका साथ दे रहा है। उदाहरण के लिए अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का रास्ता उच्चतम न्यायालय ने साफ कर दिया। इसके पूर्व तीन तलाक को अपराध करार देने के कानून का आधार भी न्यायालय के फैसले ने ही प्रदान किया। अयोध्या पर न्यायालय के फैसले के बाद पूरा संघ परिवार मंदिर निर्माण की प्रक्रिया को अपनी सोच के अनुसार आगे बढ़ा रहा है। संपूर्ण देश को इससे जोड़ने का कार्यक्रम भी अनुकूल माहौल निर्मित कर रहा है। क्योंकि संघ ने धीरे-धीरे अपनी पहचान एक अनुशासित और राष्ट्रवादी संगठन की बनाई। जिससे न केवल देश में बल्कि दुनिया में इसके समर्थन का माहौल बन रहा है। सच तो यह है कि संस्कृति, मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं का कोई मजहब और सम्प्रदाय नहीं होता। अगर संवेदनहीनता एक तरफ है और वह समस्याओं की जड़ में है, तो वैसी ही संवेदनहीनता उस तरफ भी पायी जाती है जिधर आरोप लगाने वाले होते हैं। सबसे बड़ी बात अपने भीतर के न्यायाधिपति के सामने खड़े होकर खुद को जांचने, सुधारने, संगठित होने और आगे का रास्ता तय करने की होती है।

संघ साफ तौर पर हिंदू समाज को उसके धर्म और संस्कृति के आधार पर शक्तिशाली बनाने की बात करता है। संघ से निकले स्वयंसेवकों ने ही भाजपा को स्थापित किया। संघ एवं भाजपा के प्रयासों से आज समूचा देश राममय बना है, भगवान श्रीराम सबके हैं, इसलिये उनके मन्दिर निर्माण में सबसे सहयोग लेने के प्रयास हो रहे हैं। इसी मन्दिर के लिये गुरु गोविन्द सिंह ने भी दो बार युद्ध लड़ा। गुरुनानक देवजी जब अयोध्या आये थे तब अपने शिष्य मर्दाना को बोला था कि यह मेरे पूर्वजों की धरती है। जैन धर्म के 24 में से 22 तीर्थंकरों की यह कल्याणक भूमि है तो महात्मा बुद्ध श्रीराम के वंश से जुड़े थे। बाबा साहब अंबेडकर ने कई बार अयोध्या का जिक्र किया तो महात्मा गांधी ने तो अपने प्राण ही श्रीराम को पुकारते हुए त्यागे थे। हिन्दू संस्कृति सबसे प्राचीन ही नहीं, समृद्ध और जीवंत संस्कृति भी है। यह राष्ट्रीयता की द्योतक है। अतः राष्ट्रीयता को सशक्त एवं समृद्ध हमें अपने सांस्कृतिक तत्वों से करना चाहिए अन्यथा मानसिक दासता हमें अपनी संस्कृति के प्रति गौरवशील नहीं रहने देगी। यह भारत भूमि जहां राम-भरत की मनुहारों में 14 वर्ष पादुकाएं राज-सिंहासन पर प्रतिष्ठित रहीं, महावीर और बुद्ध जहां व्यक्ति का विसर्जन कर विराट बन गये, श्रीकृष्ण ने जहां कुरुक्षेत्र में गीता का ज्ञान दिया और गांधीजी संस्कृति के प्रतीक बनकर विश्व क्षितिज पर एक आलोक छोड़ गये, उस देश में एक समृद्ध संस्कृति को धुंधलाने के प्रयत्न होना, सत्ता के लिये मूल्यों एवं संस्कृति को ध्वस्त करना, कुर्सी के लिये सिद्धान्तों का सौदा, वैभव के लिये अपवित्र प्रतिस्पर्धा और विलास के हाथों राष्ट्र को कमजोर करने का षड्यंत्र होना लगातार चुभन पैदा करता रहा है, अब इन धुंधलकों के बीच रोशनी का अवतरण हो रहा है तो उसका स्वागत होना चाहिए। संघ परिवार एवं भाजपा इस दिशा में जितना प्रखर होकर चलेंगे, देश उतना ही सशक्त होगा। जितने मजबूत इनके इरादे होंगे, उतना ही जन-समर्थन बढ़ेगा।

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