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विशेष संपादकीय

हताश, निराश और उदास लोगों का तीसरा मोर्चा

2014 के लोकसभा चुनावों की पूर्व संध्या पर 11 राजनीतिक दलों ने देश की राजधानी दिल्ली में फिर अवसरवादी राजनीति को बढ़ावा देते हुए एक संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया और एक गैर भाजपा व गैर कांगे्रसी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक और जनोन्मुखी विकास करने वाले राजनैतिक मोर्चे को जन्म दिया। इस मोर्चे को भारतीय राजनीति की पारम्परिक भाषा में ‘तीसरा मोर्चा कहा जाता है। यह मोर्चा अब से पूर्व भी अस्तित्व में आता रहा है और जैसा कि इसके नाम से ही विदित होता है कि इसने कभी भी स्वयं को सत्ता का पहला या दूसरा नही बल्कि तीसरा विकल्प माना है। भारतीय राजनीति में तीसरा मोर्चा एक अद्भुत प्रयोग है, क्योंकि हर लोकतांत्रिक देश में पहले और दूसरे मोर्चों के बीच लड़ाई होती है और सत्ता उन्हीं में से किसी एक के पास आती जाती रहती है। लेकिन भारत में ‘तीसरा मोर्चा भी आता है और यह केवल पहले दूसरे मोर्चे को सत्ता से दूर रखकर केवल उन दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों या परिणामों के लिए सत्ता संघर्ष किया करता है जो किसी मोर्चे या राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत से या तो दूर रखे या सरकार बनाने से रोके। इस प्रकार यह ‘तीसरा मोर्चा दुर्भाग्य से जन्मता है, दुर्भाग्य के लिए जीता है और हमेशा दुर्भाग्य के लिए ही मर जाता है। इस मोर्चे के अनुसार लोकतंत्र की परिभाषा भी जनता का जनता के द्वारा जनता के लिए शासन न होकर दुर्भाग्य का दुर्भाग्य के द्वारा दुर्भाग्य के लिए शासन है।
हम इस तीसरे मोर्चे को दुर्भाग्य इसलिए कह रहे हैं कि इस मोर्चे में एक रूपये को विभिन्न घटकों की दस्सी-पंजी से मिलाकर बनाया जाता है और जितनी जिस घटक की कीमत होती है, उसी अनुपात में वह सत्ता में अपनी भागीदारी निश्चित करता है। इसमें ‘272 प्लस के लिए कोई मिशन तय करके लड़ाई नही होती है, अपितु भाजपा और कांग्रेस को ‘272 मायनस रखकर कांग्रेस के सहयोग से सत्ता पर कब्जा करना अपना लक्ष्य होता है, जिसे गैर कांग्रेसी सरकार कहा जाता है। उसमें सबसे बड़ा घटक या उसकी सत्ता की सबसे बड़ी बैशाखी कांग्रेस ही होती है। फिर भी कहा जाता है कि ये ‘गैर कांग्रेसी सरकार है। कांग्रेस चूंकि स्वयं को इस मोर्चे का घटक नही मानती इसलिए वह पहले दिन से ही सरकार गिराने के बहाने खोजना आरंभ कर देती है, इसलिए दुर्भाग्यवश घटी घटना को सभी स्वार्थी लोग अपने अपने लिए ‘सौभाग्य बनाने की कोशिश करते रहते हैं।
अब जो ‘तीसरा मोर्चा बनाया जा रहा है, या बनाया गया है, उसमें विशेष भूमिका इस बार वामदलों ने निभाई है। जिन्होंने संप्रग की भ्रष्टाचार तथा जनविरोधी नीतियों तथा भाजपा की साम्प्रदायिकतापूर्ण नीतियों के विरूद्घ ‘तीसरा मोर्चा खड़ा करने की बात कही है। वस्तुत: संप्रग और राजग से बिखरे हुए मतों का धु्रवीकरण कर सत्ता की चाबी अपने पास रखने की कवायद का एक हिस्सा है ये वामदलों की योजना। इस बैठक में इस बार चार वामदलों के अलावा समाजवादी पार्टी, जदयू, अन्नाद्रमुक, जद (एस) एवं झारखंड विकास मोर्चा सम्मिलित हंै। बीजद और अगप इस बैठक से अनुपस्थित रहे हैं। जिनके विषय में माकपा के महासचिव प्रकाश करात ने पत्रकारों से बातचीत में कहा है कि ये दोनों दल भी उनके साथ ही हैं।
वास्तव में जितने दल भी साथ बैठे हैं, उनके पास कोई भी एक ऐसा चेहरा नही है जो देश में भाजपा के मोदी या कांग्रेस के राहुल गांधी की तरह लोगों को अपनी ओर खींच सकें। इसलिए इन दलों को ‘सत्ता का बंटवारा करने में सरलता रहती है, क्योंकि सबके सब बराबर के ही होते हैं। यह अलग बात है कि सत्ता में आने पर ये लोग अपनी अपनी महत्वाकांक्षाओं को इतना बढ़ाते हैं कि ये सब आपस में झगड़ पड़ती हैं, और दुर्भाग्यवश घटी एक घटना का पटाक्षेप भी दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से ही हो जाता है। सबको पता है कि यदि इनके सौभाग्य से किसी प्रकार सत्ता इन्हें मिल भी गयी तो इनका ‘राजा एच.डी. देवेगौड़ा नही होगा। परंतु फिर भी बैठक उन्हीं के घर पर आयोजित करके यह संकेत दिया गया है कि हम भी नेता के मसले पर एक हैं। जबकि एच.डी. देवेगौड़ा के जनता दल को मिट्टी में मिलाने की कोशिश खुद तीसरे मोर्चे के लोग ही करेंगे ताकि सत्ता के निकट होने पर एच.डी. देवेगौड़ा को सत्ता से दूर रखा जा सके। तब सत्ता के लिए वह घटक दावेदारी करेगा जो ‘सबसे अधिक सिरों को अपने साथ तीसरे मोर्चे में लाकर देगा। यदि वह व्यक्ति मजबूत हुआ तो उसके नाम पर असहमति का इतना शोर मचेगा कि वह स्वयं ही अपने को पीछे हटाने पर सहमत हो जाएगा। तब फिर किसी एच.डी. देवेगौड़ा को तलाशा जा सकता है। क्योंकि दुर्भाग्य से जुड़े लोगों को अपना सौभाग्य सबसे कमजोर आदमी के साथ लगने में ही सुरक्षित दीखा करता है। फिलहाल मुलायम सिंह यादव को अपना दुर्भाग्य दीख रहा है, इसलिए अगले पी.एम. के लिए सपने देखने और उन्हें परोसने के उनके स्वर धीमे पड़े हैं। यही स्थिति जदयू की है। जदयू के नेता शरद यादव की समझदारी पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश ने पानी फेर दिया और अब नीतीश की नासमझी से पार्टी को अस्तित्व की लड़ाई लडऩी पड़ रही है। शरद यादव और नीतीश दोनों में से कोई सा भी सत्ता के लिए राजा के चुनाव में उम्मीदवार नही हो सकता। इसलिए उनका चयन भी संदिग्ध ही है। प्रकाश करात का यह कहना ही अभी संतोषजनक लगता है कि हम चुनाव के पश्चात ही तय करेंगे कि हमारा पी.एम. कौन होगा? पहली बार है कि तीसरे मोर्चे के सारे नेता अपनी अपनी स्थिति के लिए फिलहाल स्वयं सशंकित है और कुछ भी कहने की स्थिति में नही है। यदि सत्ता किसी ‘राहुल के पास पीछे चली गयी तो तीसरा मोर्चा पहले दिन ही विधवा हो जाएगा और यदि इनके मनमाफिक हो गया तो साल छह महीेने बाद ‘विधवा हो जाएगा। कुछ भी हो इतना तो तय है कि ‘वैधव्य तो इसे मिलना ही है। आने वाला समय वर्तमान के इतिहास को जब अपने अंक में समेटेगा तो इस काल को एक ‘घोर विडंबना के रूप में ही निरूपित करेगा।

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