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आज का चिंतन

मनुष्य को अपने प्रमुख कर्तव्यों का पालन कर उनका पालन करना चाहिए

ओ३म्

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मनुष्य एक मननशील प्राणी है। सभी मनुष्यों को परमात्मा ने मानव शरीर बनाकर उसमें पांच ज्ञान इन्द्रियां, पांच कर्म इन्द्रियां तथा मन, बुद्धि, चित्त आदि अवयव दिये हैं। बुद्धि मनुष्य को ज्ञान प्राप्ति में सहायक होती है। बुद्धि से ही सत्य व असत्य का निर्णय किया जाता व अपने कर्तव्यों का ज्ञान प्राप्त किया जाता है। बुद्धि का काम मनुष्य की आत्मा को उसके कर्तव्यों का ज्ञान कराने व चिन्तन करने में सहायता करना होता है। आत्मा अनादि, नित्य, एकदेशी, अल्पज्ञ चेतन पदार्थ है जो ज्ञान व कर्म करने की शक्ति के गुणों से युक्त है। मन, बुद्धि व सभी इन्द्रियां मनुष्य की आत्मा के साधन व सहायक होते हैं। मनुष्य को अपने कर्तव्यों का ज्ञान प्राप्त करने के लिये अपने माता, पिता, आचार्यों की शिक्षा सहित धर्म शास्त्रों जिसमें वेदों तथा वैदिक ग्रन्थों सहित सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों का मुख्य स्थान है, शिक्षा व मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिये। वर्तमान काल में हमारे माता, पिता व आचार्य भी हमें हमारे सत्य कर्तव्यों का पूर्णतया बोध नहीं करा पाते। हमारे अधिकांश धर्मशास्त्र भी इस दृष्टि से पूरी तरह से साधक व सहयोगी नहीं होते है। कई ग्रन्थों में कुछ बोध तो प्राप्त होता है परन्तु उसको करने की उचित व उत्तम विधि ज्ञात नहीं होती। ऋषि दयानन्द के सामने भी यह सभी समस्यायें थी। उन्होंने समस्त वैदिक ज्ञान व शास्त्रों का मन्थन कर मनुष्य के सभी सत्कर्तव्यों का ज्ञान प्राप्त किया और उसे अपनी वेदज्ञान-सम्पन्न-बुद्धि की तुला पर तोला तथा उसे मनुष्य के सुख व कल्याण के लिये आवश्यक जानकर अपने सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों सहित पंचमहायज्ञविधि में प्रस्तुत किया है।

वैदिक आर्यों वा मनुष्यों के पंच-महायज्ञ ही मनुष्य के पांच महान व प्रमुख कर्तव्य होते हैं जिनका करना सभी गृहस्थ मनुष्यों का कर्तव्यों का होता है। अन्य मनुष्यों को भी इन कर्तव्यों के पालन में यथाशक्ति व यथा परिस्थिति सक्रिय व सावधान होना चाहिये। ऐसा करके वह परमात्मा, माता-पिता-आचार्य एवं पृथिवी आदि भौतिक पदार्थों के ऋण से उऋण हो सकते हैं। यदि ऐसा नहीं करते तो इस संसार का व्यवस्थापक व अधिष्ठाता सृष्टिकर्ता परमेश्वर मनुष्य के कर्मों के अनुसार उसका न्याय करते हुए उसके सत्कर्मों व असत्कर्मों का यथायोग्य पुरस्कार व दण्डरूपी सुख व दुःख से युक्त फल देता है। अतः हमें अपने सभी कर्तव्यों का ज्ञान प्राप्त कर उसकी पूर्ति में सजग एवं सावधान रहना चाहिये। ऐसा करने से ही हमारा मनुष्य जीवन सार्थक एवं उपयोगी होता है। ऐसा करके हम सुखों का भोग करने सहित दुःखों को अपने जीवन से दूर करते हैं और अपना जीवन सुखमय व्यतीत कर मृत्यु के बाद सुख व दुःख रूपी जन्म व मरण, अवागमन व बार बार पुनर्जन्म से मुक्ति प्राप्त कर आनन्दमय ईश्वर में निवास व विचरण करते हैं। ऐसा ही प्राचीन काल से हमारे विद्वान ऋषि, मुनि, योगी व वैदिक धर्मी पूर्वज करते आ रहे हैं। हमें भी उन्हीं के मार्ग का अनुसरण करना चाहिये तभी हम अपने पूर्वजों के योग्य उत्तराधिकारी कहलाने के पात्र होंगे।

मनुष्य संसार में एकदेशी व अल्पज्ञ प्राणी है। यह जन्म के समय अपने अपने माता व पिताओं को नाना प्रकार से कष्ट देता है। माता का दुग्धपान करता व उसके गर्भ में रहने से माता को कष्ट होता है। माता-पिता मिलकर सन्तान का पालन करते हैं जिसमें भी माता-पिता को नाना प्रकार के कष्ट उठाने पड़ते हैं। सन्तानों की शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था करना व उन्हें ज्ञान सम्पन्न करना माता, पिता सहित आचार्यों का कार्य होता है। इन सब कार्यों से सभी मनुष्य अपने माता, पिता तथा आचार्यों के ऋणी होते हैं। परमात्मा ने भी जीवों के सुख व दुख भोग तथा अपवर्ग वा मोक्ष की प्राप्ति के लिये इस संसार को बनाया है। वही इसका पालन कर रहा है। परमात्मा हमारे सुख के लिये एकक्षण भी विश्राम नहीं करता। एक अरब छियानवें करोड़ आठ लाख त्रेपन हजार एक सौ इक्कीस वर्ष पूर्व इस सृष्टि को स्थापित करने के बाद परमात्मा ने एक क्षण भी विश्राम नहीं किया। वह निरन्तर सभी जीवों के सुख के लिये इस ब्रह्माण्ड को धारण किये हुए है और सृष्टिगत सभी अपौरुषेय कार्यों को अति उत्तम रीति से सम्पन्न कर रहा है। अतः ऐसे परमात्मा के प्रति भी सभी मनुष्यों व जीवों का कर्तव्य होता है कि वह उसकी सभी आज्ञाओं को जानें व उनका पालन करें। परमात्मा की सभी आज्ञायें हमें चार वेदों से प्राप्त होती हैं। यदि सभी मनुष्य ऐसा करते हैं तो ईश्वर से पुरस्कार पाने के अधिकारी होते हैं और नहीं करते तो दण्ड के अधिकारी होते हैं।

संसार में जितने भी जीव व प्राणी हैं, वह सब समान हैं। सभी प्राणियों में मनुष्यों के समान ही आत्मा होता है जो हमारे समान ही सुख व दुःख का अनुभव करता है। इन प्राणियों की रक्षा करना व उनके साथ न्याय का व्यवहार करना सभी मनुष्यों का कर्तव्य होता है। अन्य प्राणियों के प्रति कैसा व्यवहार किया जाये, इसकी शिक्षा भी हमें अपने विद्वानों, आचार्यों एवं शास्त्रों की वेदानुकूल शिक्षाओं से लेनी चाहिये। ऐसा करके हम अहिंसा से युक्त सब जीवों को सुख प्राप्ति कराने वाले संसार के निर्माण में सहयोगी हो सकते हैं। इन सब बातों का समावेश हमारे प्राचीन ऋषियों ने सभी मनुष्यों द्वारा किये जाने वाले पांच दैनिक कर्तव्यों में किया है जिन्हें सभी गृहस्थियों द्वारा किया जाना आवश्यक होता है। यह पांच कर्तव्य ही पांच महायज्ञ कहलाते हैं। क्रमानुसार यह कर्तव्य हैं ब्रह्मयज्ञ, सन्ध्या व ईश्वरोपासना, देवयज्ञ अग्निहोत्र, पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ तथा बलिवैश्वदेवयज्ञ। ब्रह्मयज्ञ में ईश्वर के उपकारों को स्मरण कर वेदमन्त्रों के पाठ व चिन्तन द्वारा ईश्वर की उपासना की जाती है जिससे हमारी कामनाओं की पूर्ति व सिद्धि होती है तथा हम ईश्वर के ऋणों से कुछ मात्रा में उऋण होते हैं। दैनिक देवयज्ञ अग्निहोत्र करने से वायु व वर्षाजल की शुद्धि सहित अनेक लाभ होते हैं। हम जो जीवन व्यतीत करते हैं उससे वायु प्रदुषण होता है। प्रदुषित वायु में श्वास लेने से हमें ही हानि व रोग होते हैं। देवयज्ञ अग्निहोत्र करने से हम व अमारे परिवार सहित इष्ट मित्र भी रोगों से बचते व स्वस्थ व दीघार्यु को प्राप्त करते हैं। यज्ञ करने से भी मनुष्य की सभी कामनाओं को परमात्मा पूरी करते हैं। माता-पिताओं का ऋण उतारने के लिये व मनुष्यवत् सद्व्यवहार करने के लिये हम उनके प्रति भी कृतज्ञतापूर्वक उनकी तन, मन व धन से सेवा करते हैं। इससे माता-पिताओं की आत्मायें सन्तुष्ट होकर अपनी अपनी सन्तानों को आशीर्वाद देती हैं जिनको परमात्मा पूरा करते हैं। इसी प्रकार से अतिथि यज्ञ के अन्र्तगत विद्वान आचार्यों, धार्मिक प्रचारकों व पुरुषों का हम आतिथ्य एवं सत्कार कर उनका आशीर्वाद भी प्राप्त करते हैं। बलिवैश्वदेव-यज्ञ में हम सभी पशु, पक्षी आदि योनियों के प्राणियों का सत्कार करते हैं। इससे हमें यह भी लाभ होता है कि पुनर्जन्म में यदि हम पशु या पक्षी बनेंगे तो हमें भी इस परम्परा का लाभ मिलेगा। अतः हमें वेद व मनुस्मृति आदि में वर्णित अपने पांच महायज्ञों वा कर्तव्यों का पालन पूर्ण श्रद्धा भक्ति से करना चाहिये तभी हमारा व्यक्तित्व एक सच्चे मनुष्य के अनुरूप होगा और हम कृतघ्नता के पाप से बच सकेंगे।

मनुष्य अपने कर्तव्यों को जानकर उनका पालन करता है तो इससे परिवार व समाज व्यवस्थित रहते हैं। समाज में सुखों में वृद्धि होती है। मनुष्य की आत्मा का कल्याण व उन्नति होती है तथा उसके परजन्मों में सुधार व उन्नति होती है। इसके विपरीत आचरण करने से मनुष्यों को नाना प्रकार की हानियां एवं दुःख प्राप्त होने सहित वह आवागमन के चक्र में फंसे रहते हैं और निरन्तर दुःख पाते हैं। अतः मननशील मनुष्यों को शास्त्रों की सहायता से अपने कर्तव्यों को जानकर उनका विधि विधान पूर्वक निर्वाह करना चाहिये। इससे उनकी शारीरिक, आत्मिक एवं सामाजिक उन्नति होगी और उनको अनेकानेक सुखों सहित आत्म सन्तुष्टि का लाभ भी प्राप्त होगा जो कि पंचमहायज्ञों को करने वाले मनुष्यों को विशेष रूप से होता है। पंचमहायज्ञों को करने से मनुष्य रोग रहित होकर दीर्घायु को प्राप्त करते हैं। अतः पंचमहायज्ञ रूपी कर्तव्यों का पालन सभी मनुष्यों को करना चाहिये। पंचमहायज्ञों से इतर भी मनुष्य के जो जो कर्तव्य होते हैं उन्हें पूरी श्रद्धा भक्ति, प्रेम, सदभावना व अनुशासित रूप से करना चाहिये। ऐसा करके हम ईश्वर द्वारा प्रेरित सत्य परम्पराओें को करने से यश व सुख के भागी होंगे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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