…और अब युवा बदलेंगे भारत की तस्वीर

yuvaप्रमोद भार्गव
देश की नई लोकसभा की तकदीर लिखने में युवाओं की भूमिका अहम होगी। लिहाजा सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की निगाहें युवाओं पर टिकी हैं। कुल 81 करोड़ मतदाताओं मे से 14 करोड़ 93 लाख 60 हजार मतदाता ऐसे होंगे, जिन्हें मतदान का पहला मौका मिलेगा। जबकि 18 से 35 साल के युवा मतदाताओं की संख्या 47 प्रतिशत है। मसलन निर्वाचन आयोग द्वारा दी गइ्र जानकारी के मुताबिक देश में कुल युवा मतदाताओं की संख्या 39 करोड़ 50 लाख है। गिरती जन्म दर के कारण अब ऐसा अवसर कई दशकों तक आने वाला नहीं हैं, जिसमें 18 से 35 आयु वर्ग के मतदाताओं को एक साथ इतनी बड़ी संख्या में मताधिकार का मौका मिले ? लगभग 350 सीटों पर युवा मतदाताओं की संख्या किसी भी प्रत्यासी को जिताने या हराने की स्थिति तक पहुंच गई है। उत्तर प्रदेश में तो हरेक लोकसभा क्षेत्र मे सवा दो लाख से ज्यादा युवा मतदाता मताधिकार का उपयोग करेंगे। तय है, नए मतदाताओं के हाथ, इन सीटों पर खड़े होने वाले प्रत्याशियों की किस्मत का फैसला होगा। जाहिर है युवाओं की अहमियत का ख्याल हरेक राजनैतिक दल को रखना होगा।
2009 के आम चुनाव में पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं की संख्या 10 करोड़ थी, लेकिन 2014 के आम चुनाव और युवा हो गए हैं। अब यह संख्या बढ़कर करीब 15 करोड़ हो गई है। इस मजबूत वोट बैंक का प्रतिशत 20 फीसदी है। जबकि 35 साल तक के युवाओ को इसमें और जोड़ दिया जाए तो ये 47 फीसदी हो जाते हैं। इस चुनाव की हवा का रूख जो भी हो, लेकिन यह तय है कि नव युग का यह मतदाता पुरानी जकडऩों और कुंठाओं से मुक्त होकर नवीन प्रगतिशील विचारों को महत्व देगा। क्योंकि यह रूढि़वादी सांप्रदायिक और जातीय सोच से भिन्न सोच रखता है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को 28 सीटों पर जीत की प्रमुख वजह यही युवा वोटर था। हालांकि अखिल भारतीय फलक पर किए गए जो राजनीतिक सर्वेक्षण आ रहे हैं, उनमे युवाओं की स्वीकार्यता नरेंद्र मोदी के प्रति ज्यादा दिखाई दे रही है। दूसरे पायदान पर राहुल गांधी और तीसरे नंबर पर आप के अरविंद केजरीवाल हैं। भाजपा और राजग के सहयोगी दल युवाओं का मन जीतने में लगातार आगे बढ़ रहे हैं। दलित, हरिजन व आदिवासी मतदाता समूह, जिन्हें अब तक भाजपा के लिए अछूत माना जाता था, यह अस्पृश्यता रामविलास पासवान की लोक जनशकित पार्टी के राजग गठबंधन से जुडऩे और प्रसिद्ध दलित बुद्धिजीवी उदितराज के भाजपा में शामिल होने से दूर हुई है। लोजपा को राजग का भागीदार बनाने में अहम भूमिका रामविलास के युवा बेटे चिराग पासवान की रही है। जाहिर है, खासतौर से बिहार में दलित युवाओं का रूख भाजपा की ओर मुड़ेगा।
उदितराज ने भाजपा में शामिल होने के साथ ही क्रांतिकारी हस्तक्षेप शुरू कर दिया है। वे संघ के उस अजेंडे को आगे बढ़ाते दिखाई दे रहे हैं जो दलित और सवर्ण समाज की दूरी कम करने में क्रांतिकारी भूमिका का निर्वाह कर रहा है। इस मकसद पूर्ति के लिए दलितों आदिवासियों को भाजपा ने मीडिया, उधोग, व्यापार, ठेकेदारी आदि में भागीदार बनाने का फैसला लिया है। संघ और भाजपा के दलित और आदिवासी उत्थान के लिए पूरे देश में ऐसे एक लाख 58 हजार सेवा प्रकल्प चल रहे हैं, जिनके माध्यम से वंचित समाज को शिक्षित व स्वावलंबी बनाए जाने के प्रयत्न किए जा रहे है। सांगठनिक रूप से जागरूकता का यह काम अब तक न कांग्रेस ने किया, न ही मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने ? सामाजिक नव-निर्माण के इसी संकल्प को युवा आईआईटी टापर लाहिड़ी गुरू भी आगे बढ़ा रहे हैं। उनकी कोशिश है कि भारत में जातिविहीन समाज की स्थापना हो। भाजपा की ये कोशिशें दलित-आदिवासी युवा मतदाताओं को लुभाने वाली हैं। इसीलिए एक ताजा सर्वे के अनुमान के मुताबिक 40.5 फीसदी युवा मतदाताओं का मानना है कि भाजपा युवाओं को सही प्रतिनिधित्व दे सकती है। दूसरी ओर 30 प्रतिशत युवा मानते हैं कि कांग्रेस युवाओं को सही प्रतिनिधित्व दे सकती है।
केंद्र की डा. मनमोहन सिंह नेतृत्व वाली संप्रग सरकार युवाओं को इसलिए आकर्षित नहीं कर पा रही है, क्योंकि वहां एक ओर तो भ्रष्टाचार व मंहगाई का चरम है, दूसरी ओर अनिर्णय की स्थिति है। राहुल गांधी अपनी सभाओं में जिस सुशासन और राजनीति में युवाओं के भागीदारी की बात करते हैं, उसे वे कांग्रेस पार्टी में ही अमल में नहीं ला पा रहे हैं। सरकार में भागीदारी की तो बात ही अलग है ? दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी नेतृत्व, सुशासन, विकास और स्थायित्व की बात कर रहे हैं, जो युवाओं लुभाने वाले मुददे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे 9 करोड़ 10 लाख युवाओं का सीधा हस्तक्षेप है, जो मोदी के पक्ष में माहौल बनाने का काम कर रहे हैं। मोदी जाति व संप्रदाय से ऊपर उठकर देश की संपूर्ण आबादी की बेहतरी की बात करते हैं। जज्बाती और भड़काऊ भाषणों से भी मोदी ने दूरी बना ली है। ये ऐसी बातें हैं, जो करोडों युवाओं को लुभाती हैं। इनके सामने पहाड़ सी लंबी जिंदगी है। यही वजह है कि युवा मतदाता जातीय व सांप्रदायिक, स्थानीय व भाषाई और नस्लीयता जैसे भावुक और पूर्वग्रहों के दूराग्रहों से उबर रहे हैं। अब दल और नेताओं के प्रति अंधश्रद्धा का भाव रखने की बजाय, वे उनसे जवाबदेही तय करने की बात करते हैं।तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के मुददे को युवा कश्मीर से खदेड़े गए चार लाख पंडितों से जोडऩे लगे हैं। गुजरात दंगों की तुलना 1984 के दंगों से करने लगे हैं। करोड़ों बांग्लादेशी घुसपैठियों पर भी अब युवा बेबाकी से जवाब तलब करने लगे हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं की घटती चिंता भी उनका प्रमुख विषय है। जाहिर है, द्विपक्षीय या सर्वसमावेशी होते प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने इकतरफा बना दी गईं अवधारणाओं को बदलने का काम किया है। इसलिए युवाओं की पूर्वग्रही सोच और पुरानी समझ बदल रही है। उनकी बढ़ती जागरूकता अनुत्तरित सवालों और मुददों पर पुनर्विचार की मांग करने लगी है। जाहिर है, युवा मतदाताओं को अब किसी भी दल के लिए बरगलाना मुमकिन नहीं है। लिहाजा उम्मीद है कि युवा व देश के अन्य मतदाताओं की परिपक्व होती सोच, उपलब्ध विकल्पों के बीच से सर्वश्रेष्ठ का चयन करते हुए समझदारी का परिचय देंगे। तय है, देश के नए युवा भाग्य विधाताओं के हाथ नई लोकसभा के निर्माण की बागडोर है।

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