नए शीत युद्ध के दौर को भारत कैसे बदल सकता है एक अवसर में ?

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रंजीत कुमार

पूरे विश्व के चिकित्सा और आर्थिक क्षेत्रों में हाहाकार मचाने वाला कोरोना वायरस देशों के रिश्तों में भी भारी उलटफेर करने जा रहा है। सन 2020 में इस वायरस के खिलाफ विश्वयुद्ध सा छिड़ गया था, जिसकी आग 2021 में भी नहीं बुझने वाली। चीन के वूहान शहर से कोरोना की पहली तोप चली तो पूरा विश्व इसकी चिंगारियों से कराह उठा। नतीजतन चीन के खिलाफ पूरे विश्व में गुस्सा देखा गया। अपनी आर्थिक और सैनिक ताकत के बल पर चीन अपने को राजनयिक खींचातानी से किनारे करने में फिलहाल कामयाब दिख रहा है, लेकिन इस कोरोना की वजह से उसने पूरी दुनिया का विश्वास खो दिया है। कोरोना संक्रमण फैलने के बाद चीन के खिलाफ जिस तरह की गोलबंदी हो शुरू हो गई है, उससे दूसरे शीतयुद्ध जैसा माहौल बनता दिख रहा है।


तेज होती गोलबंदी
पिछली सदी में पचास से अस्सी के दशक तक चला शीतयुद्ध तत्कालीन सोवियत संघ और अमेरिका की अगुआई वाले देशों के बीच था। दूसरा शीतयुद्ध 21वीं सदी के तीसरे दशक के पहले साल से ही शुरू हुआ माना जा सकता है। इस शीतयुद्ध में एक तरफ चीन, रूस, पाकिस्तान, ईरान जैसे देश हैं तो दूसरी ओर अमेरिकी अगुआई में हिंद-प्रशांत के देश। इस कुनबे में अब यूरोपीय देश भी जुड़ने लगे हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया के देश चीन पर आर्थिक निर्भरता की वजह से उससे सहमे रहते हैं लेकिन जिस तरह इंडोनेशिया, वियतनाम, सिंगापुर, फिलीपींस जैसे देश हिंद-प्रशांत के साथ दिखने लगे हैं उससे लगता है कि चीन के पड़ोसी सागरीय देश भी उसके खिलाफ हो रही गोलबंदी में शामिल हो सकते हैं।
चार देशों अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के गठजोड़ क्वाड को लेकर फ्रांस, जर्मनी और नीदरलैंड जैसे यूरोप के ताकतवर देशों ने भी साथ दिखने वाले नीतिगत बयान दिए, जिससे लगा कि हिंद प्रशांत का गुट चीन के खिलाफ मजबूती हासिल कर रहा है। लेकिन सामरिक हलकों में सबसे बड़ा सवाल यह पूछा जा रहा है कि क्या चार देशों की अगुआई वाला यह चीन विरोधी गुट किसी सैनिक ताकत से लैस होगा, या बहुपक्षीय और द्विपक्षीय स्तर पर साझा सैन्य अभ्यास करके दिखावटी सैन्य एकजुटता तक ही सीमित रहेगा।
वास्तव में चीन के आक्रामक तेवर ने कोरोना के खिलाफ पहले से चल रहे विश्व युद्ध की आग में घी डालने का काम किया। जहां चीन ने भारत के पूर्वी लद्दाख के सीमांत इलाकों में घुसपैठ कर अपना दुस्साहस दिखाया, वहीं दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर के इलाकों में जापान, वियतनाम, हांगकांग, ताइवान आदि पर अपनी दादागिरी थोपने की कोशिश भी की। उसने हिंद-प्रशांत के चतुर्पक्षीय गुट को चीन के खिलाफ रणनीति बनाने पर विवश किया। मसला दक्षिण चीन सागर में चीन की दादागिरी रोकने का है, जिससे भारत के सामरिक-आर्थिक हित जुड़े हैं।
ऐसे में भारत की मजबूरी बन जाती है कि इस सागरीय इलाके को चीन के चंगुल से मुक्त करने के लिए हिंद-प्रशांत गुट में शामिल हो। रिश्तों का यह समीकरण फिलहाल ठोस आकार नहीं ले सका है लेकिन इसकी दिशा जरूर साफ दिखने लगी है। इस समीकरण को मजबूती तभी मिलेगी जब भारत इसका एक प्रमुख स्तंभ बनने का संकल्प दिखाएगा। क्वाड के सदस्य देश भारत की ओर इसलिए देख रहे हैं कि भारत उनकी आर्थिक ताकत को बनाए रखने में चीन का बेहतर, भरोसेमंद विकल्प बनने की संभावनाएं पेश करता है। क्वाड के झंडे तले इस सामरिक एकजुटता की पहली घातक मार चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकती है।
जापान ने इस दिशा में एक अहम पहल की है। यह पहल दर्शाती है कि चीन बनाम क्वाड के सदस्यों और समर्थक देशों के बीच व्यापार युद्ध की ज्वाला तेजी से फैलेगी। दुनिया जिस तरह औद्योगिक-तकनीकी क्षेत्र में चीन पर निर्भर हो गई है, उसे देखते हुए जापान ने सप्लाई चेन रिजिलियंस इनीशिएटिव (एससीआरआई) के जरिए आपूर्ति कड़ी में लचीलापन लाने की शुरुआत की जिसमें ऑस्ट्रेलिया और भारत को शामिल करने का प्रस्ताव रखा। साफ है कि जापान जैसे देश अपने जरूरी मौलिक औद्योगिक उत्पादों (जैसे दुर्लभ खनिज) के लिए चीन पर अपनी निर्भरता खत्म कर उसमें लचीलापन लाना चाहते हैं ताकि भविष्य में राजनीतिक रिश्ते बिगड़ने पर चीन मौलिक औद्योगिक माल की सप्लाई रोक कर ब्लैकमेल न कर पाए।
मिसाल के तौर पर चीन अगर जापान, अमेरिका जैसे देशों को दुर्लभ खनिज का निर्यात रोक दे तो इनका विकल्प खोजने की व्यवस्था जब तक की जाएगी तब तक इन देशों की अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान हो चुका होगा। भारत वैकल्पिक सप्लाई चेन की अहम कड़ी बन सकता है लेकिन इसके लिए उसे दुनिया को यह भरोसा दिलाना होगा कि यहां राजनीतिक, सामाजिक स्थिरता का वातावरण भंग नहीं होने वाला। सामाजिक समरसता का वातावरण बनाए रखकर ही भारत विदेशी निवेश के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकता है। कुल मिलाकर 21वीं सदी का तीसरा दशक भारत के लिए सामरिक और आर्थिक-व्यापारिक क्षेत्र में अनुकूल माहौल पेश कर रहा है। पर, सवाल यह उठता है कि क्या भारत इसके लिए अनुकूल घरेलू माहौल देने को तैयार है?

हिंद प्रशांत के देशों को ताकत भारत से ही मिल सकती है क्योंकि भारत जनतंत्र है, बड़ी अर्थव्यवस्था है, बड़ा बाजार है और यहां कुशल मानव संसाधन भी है। इसीलिए अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश आगामी दशक में भारत को वैकल्पिक सप्लाई चेन बनने वाले देश के तौर पर देख रहे हैं। यदि भारत ऐसा भरोसा नहीं दिला सका तो अमेरिकी अगुआई वाले देशों को मजबूरन वियतनाम और अन्य दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों की ओर देखना होगा और चीन से भी रिश्तों में संतुलन बनाकर चलना होगा। फिलहाल विश्व सामरिक संतुलन का पलड़ा भारत की ओर झुकता नजर आ रहा है लेकिन यह तभी तक झुका रहेगा जब तक भारत अपनी लोकतांत्रिक विश्वसनीयता पर आंच नहीं आने देता।

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