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* वीरांगना रानी सारन्धा*

भारत के इतिहास में ऐसी बहुत-सी महिलाओं का नाम आता है जिन्होंने बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यदि हम अपने देश के इतिहास पर नज़र डालेंगे तो हमें इसमें स्त्री शक्ति का वर्चस्व भी भली-भांति देखने को मिल जाता है। ऐसे कई घटनाओं का उल्लेख मिलता है, जब हमारे देश की रानियों ने अपना सब कुछ न्योछावर करके अपने आने वाली पीढ़ियों को बचाया था। किंतु ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि उन वीरांगनाओं के बारे में बहुत कम ही लिखा गया है। आज की वीरगाथा है एक ऐसी ही वीरांगना की जिन्होंने बड़ी हिम्मत से क्रूर औरंगजेब और उसकी सेना को छकाया था। आज की कहानी है बुंदेलखंड की रानी – “वीरांगना सारन्धा” की।

✍ *● कौन थीं रानी सारन्धा*

रानी सारन्धा के जन्म से लेकर ओरछा की रानी बनने तक के विषय में इतिहासकारों ने न के बराबर ही लिखा है। किंतु एक उल्लेख के अनुसार पता चलता है कि रानी सारन्धा के बचपन का नाम लाल कुँवरी था। एक बार जब वो अपनी सखियों के साथ पूजा करने के लिए कुलदेवी के मंदिर जा रही थी, उसी समय ओरछा के राजकुमार चंपतराय की दृष्टि उनपर पड़ी। राजकुमारी को देखकर वो उन पर मोहित हो गए। और जब उन्हें पता चला कि राजकुमारी सुंदरता ही नहीं बल्कि गुणी भी हैं तो उनके मन में राजकुमारी को अपनी रानी बनाने की इच्छा प्रबल हो गई। शुभमुहूर्त पर उन दोनों का विवाह तय कर दिया गया। विवाह के पश्चात रानी सारन्धा ओरछा आ गई। कुछ ही महीनों में राजकुमार चंपतराय को सत्ता संभालने के योग्य समझकर उन्हें राजा बना दिया गया। और इस तरह लाल कुंवरी बन गईं – रानी सारन्धा। राजा चंपतराय का शुरुआती कुछ समय विरोधियों को दबाने एवं मुगलों को सामना करने में व्यतीत हुआ। इस समय रानी ने प्रजा के सुख समृद्धि पर जोर दिया। प्रजापालनहारी रानी कुछ ही समय में ही प्रजा के बीच रानी माता के नाम से प्रसिद्ध हो गईं।

✍ *● औरंगजेब का सामना बड़ी बहादुरी से किया*

धीरे धीरे रानी सारन्धा की ख्याति दिल्ली दरबार तक जा पहुंची। क्रूर औरंगजेब अब रानी सारन्धा को अपने हरम में रखना चाहता था। उसने रानी के नाम एक पत्र भिजवाया, जिसमें रानी को ओरछा का परित्याग कर दिल्ली आने के लिए कहा गया। और साथ ही ये भी चेतावनी दी कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो परिणाम बहुत बुरा होगा। जब ये पत्र ओरछा के राजा चंपतराय को मिली तो उन्हें कुछ नहीं सूझ रहा था, उनकी चिंता को देख रानी ने कहा ‘राजन आप उस औरंगजेब को प्रतिउत्तर दीजिए कि हमें मंजूर नहीं है उसके हरम में जाना, चाहे इसके लिए कोई भी परिणाम भुगतना पड़े।” क्रूर औरंगजेब ने इस तरह के उत्तर की आशा नहीं की थी अतः वो आग बबूला हो गया। अब वो रानी सारंधा से अपने अपमान का बदला लेना चाहता है। औरंगजेब ने हिन्दू सुबेदार शुभकरण को चंपतराय के विरुद्ध युद्ध अभियान पर भेजा। वैसे तो शुभकरण चंपतराय के बचपन के मित्र थे किंतु भयवश चंपतराराय के कई दरबारी के साथ वो भी औरंगजेब से जा मिले थे। पर राजा चंपतराय और रानी सारंधा ने अपना धैर्य और साहस नहीं छोड़ा। उन्होंने डटकर मुकाबला किया लेकिन औरंगजेब के सैनिकों की संख्‍या बढ़ती ही जा रही थी।

👉 लगातर आक्रमण के चलते राजा और रानी ने अंततः ओरछा से निकल जाना ही उचित समझा। ओरछा से निकलकर राजा तीन वर्षों तक बुंदेलखंड के जंगलों में भटकते रहे। राजा चंपतराय का साथ देते हुए रानी सारंधा अपना पत्नी धर्म निभा रही थी। वह भी अपने पति और परिवार के हर सुख-दुख में साहसपूर्ण तरीके से साथ देती रहीं। औरंगजेब ने चंपतराय जी को बंदी बनाने के अनेक प्रयास किए, लेकिन असफल ही हुआ। अंत में उसने खुद ही राजा चंपतराय को ढूंढ निकालने और गिरफ्‍तार करने का फैसला किया। इस बीच तलाशी अभियान में लगी बादशाही सेना हटा ली गई, जिससे राजा चंपतराय जी को यह लगा की औरंगजेब ने हार मानकर तलाशी अभियान खत्म कर दिया है। तब ऐसे में राजा अपने किले ओरछा में लौट आए। औरंगजेब इसी बात कर इंतराज कर रहा था। उसने तत्काल ही ओरछा के किले को घेर लिया। फिर वहां उसने खूब उत्पात मचाया। उस समय किले के अंदर लगभग 20 हजार लोग थे।

👉 किले की घेराबंदी को तीन सप्ताह हो गए थे। राजा की शक्ति दिन प्रतिदिन क्षीण होती जा रही थी। रसद और खाद्य सामग्री लगभग समाप्त हो रही थी। राजा उसी समय ज्वार से पीड़ित हो गए। एक दिन ऐसा लगा की शत्रु सेना आज किले में दाखिल हो जाएगी। तब उन्होंने रानी सारंधा के साथ विचार विमर्ष किया। रानी ने संकट के समय प्रजा को छोड़कर जाने को उचित नहीं समझा। तब रानी ने अपने पुत्र राजकुमार छत्रसाल को बादशाह के पास संधि पत्र लेकर भेजा, जिससे निर्दोष लोगों के प्राण बचाए जा सके। अपने देशवासियों की रक्षा के लिए रानी ने अपने प्रिय पुत्र को संकट में डाल दिया। जैसी आशंका थी औरंगजेब ने छत्रसाल को अपने पास रखा लिया और ओरछा की प्रजा को कुछ न करने का प्रतिज्ञापत्र भिजवाने का सुनिश्चित किया। रानी को यह प्रतिज्ञा पत्र उस वक्त मिला जब वह मंदिर जा रही थी। उन्हें पढ़कर प्रसन्नता हुई लेकिन पुत्र के खोने का दुःख भी। अब रानी सारंधा के समक्ष एक ओर बीमार पति थे दूसरी ओर बंधक पुत्र था। फिर भी उन्होंने साहस से काम लिया और अब चंपतराय को अंधेरे में किले से निकालने की योजना बनाई। साथ ही उन्होंने अपने भाइयों एवं विश्वसनीय सैनिकों को राजकुमार छत्रसाल को छुड़ाने के लिए भेज दिया।

✍ *● अंतिम समय तक आत्मसमर्पण नहीं किया !*

औरंगजेब की सेना राजा एवं रानी को ढूंढ रही थी। यह जानकर अचेतावस्त्रा में रानी अपने राजा को किले से 10 कोस दूर ले गई। तभी उन्होंने देखा कि पीछे से औरंगजेब के सैनिक आ रहे हैं। राजा को भी जगाया। किंतु राजा ने कहा कि मैं उस औरंगजेब के बंधक बनने से अच्‍छा है कि यहीं वीरगती को प्राप्त हो जाऊं। राजा के साथ कुछ लोग थे जिन्होंने बादशाह के सैनिकों से मुकाबला किया। रानी का अंतिम सैनिक भी जब वीरगती को प्राप्त हो गया तो डोली में बैठे राजा ने रानी से कहा आप मुझे मार दें क्योंकि में बंधक नहीं बनना चाहता। रानी ने भारी मन से ऐसा ही किया। औरंगजेब के सैनिक रानी के साहस को देखकर दंग रह गए। कुछ ही देर बाद उन्होंनें देखा की रानी ने भी अपनी उसी तलवार से स्वयं की गर्दन उड़ा दी।

👉 उधर राजकुमार छत्रसाल को उनके मामा के साथ गए सैनिकों ने बड़ी सूझबूझ से औरंगजेब की कैद से छुड़ा लिया। किंतु जब तक वे महाराज-महारानी तक पहुंचे तब तक अनहोनी घट चुकी थी। 12 वर्षीय राजकुमार छत्रसाल के सामने उनके बहादुर माँ-पिताजी के शव पड़े हुए थे। इतिहासकार के.पी.सिंह लिखते हैं कि ऐसी परिस्थिति को देखकर कोई भी टूट जाएगा, किंतु राजकुमार छत्रसाल ने अपने माँ-पिताजी के रक्त से स्वयं का तिलक किया एवं प्रण लिया कि बुंदेलखंड से औरंगजेब का राज समाप्त कर के ही दम लेंगे। बाद में यही राजकुमार छत्रसाल, बुंदेल केसरी महाराजा छत्रसाल के नाम से प्रसिद्ध हुए। किंतु इन सब में कहीं न कहीं रानी सारन्धा के बलिदान को भूला दिया गया है, जिन्होंने बड़ी सूझबूझ से बुंदेल की प्रजा एवं उनके भावी राजा को बचा लिया।

✍ *टिप्पणी :* रानी सारन्धा एक दृढ़ इच्छाशक्ति की परिचायक थीं। वो चाहतीं तो महाराज चंपतराय एवं राजकुमार छत्रसाल को लेकर ओरछा से निकल जातीं और उनके प्राण भी बच जाते। किंतु उनके लिए स्वयं से पहले प्रजा थी, जिनकी रक्षा करते हुए उन्होंने मरना भी स्वीकार कर लिया। दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसी वीरांगनाओं के बारे में इतिहास की किताबों में आपको कोई वर्णन नहीं मिलेगा। उनकी उपलब्धि बस बुंदेलखंड क्षेत्र के लोकगीतों तक ही सीमित रह गई हैं। जबकि उनके बारे में हम सभी को जानने की आवश्यकता है। रानी सारन्धा मध्यकालीन इतिहास की सशक्त महिलाओं में से एक हैं जिन्होंने आत्मसम्मान की ख़ातिर आत्मघात कर लिया किंतु औरंगजेब के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं किया। हम नमन करते हैं वीरांगना रानी सारन्धा को जिन्होंने अभूतपूर्व साहस एवं सूझबूझ का परिचय देते हुए इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी है।

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