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संपादकीय

नए संसद भवन का निर्माण और कांग्रेस का वैचारिक दिवालियापन

 

राजाओं के राज भवन कैसे हों ? उसकी अपनी वेशभूषा कैसी हो? और उसकी राज्यसभा, धर्मसभा, न्याय सभा आदि कैसी हों? इस विषय में हमारे प्राचीन कालीन राजनीतिशास्त्र के मनीषियों ने बड़ा स्पष्ट लिखा है कि इन सब में वैभव और देश का गौरव स्पष्ट दिखाई देना चाहिए। राजा दीन ,- हीन, फटे हाल कपड़ों में रहने वाला ना हो ,उसके आवास विशेष वैभव से भरपूर हों। इसी प्रकार राज्यसभा, न्याय सभा ,धर्मसभा आदि के स्थल भी उसके ऐश्वर्य और वैभव को दिखाने वाले हों। ऐसा केवल इसलिए किया जाता है कि वैभव और ऐश्वर्य संपन्न आवासों और सभाओं में रहने से राजा की विशिष्टता का बोध होता है , और पूरे राष्ट्र का आभामंडल राजा के आसपास दिखाई देने लगता है। जिसमें यह स्पष्ट आभास होता है कि पूरा राष्ट्र अपनी पूर्ण आभा के साथ अपने राजा अर्थात अपने राष्ट्राध्यक्ष / शासनाध्यक्ष के साथ है । भारत की इसी परंपरा का निर्वाह सारा संसार आज भी कर रहा है।
राजा के उस आभामंडल में किसी का हस्तक्षेप पूरे राष्ट्र में किए गए हस्तक्षेप के समान माना जाता है। यही कारण है कि राजा पर यदि कोई विदेशी शत्रु हाथ उठाता है या उसके भवन में गलत दृष्टिकोण से प्रवेश करने में सफल होता है तो उसका ऐसा कृत्य पूरे राष्ट्र के लिए अपमानजनक माना जाता है।


यही कारण रहा कि भारत के राजा व सम्राटों के राजभवन और आवास स्थल प्राचीन काल से ही वैभव और ऐश्वर्य संपन्न दिखाई देते रहे हैं । जबकि एक ऋषि के गुरुकुल में इन सब चीजों का दिखावा नहीं होता था। क्योंकि वह ज्ञान संपन्न व्यक्तित्व का स्वामी होता था। जिसके पास भौतिक ऐश्वर्य का कोई दिखावा इसलिए नहीं होता था कि वह सीमाओं में बांधा नहीं जा सकता था। राजा एक देश का राजा होता है, इसलिए उसका ऐश्वर्य और उसकी शक्तियां एक सीमित क्षेत्र तक दिखाई देती हैं ।जबकि ऋषि का चिंतन असीम होता है। वह ससीम नहीं होता। वह अनंत में मिल जाना चाहता है। इसलिए उसकी सीमाओं को बांधा नहीं जा सकता। इसीलिए उसके सामने अच्छे-अच्छे राजा, महाराजा व सम्राट आकर शीश झुकाते रहे हैं।
स्वतंत्रता के उपरांत भारत ने भी अपने राजकीय व शासकीय आवासों को पूरी भव्यता ,ऐश्वर्य और वैभव प्रदान करने का कार्य किया। तत्कालीन कांग्रेस सरकारों के द्वारा भी यदि ऐसा निर्णय लिया गया तो यह राजकीय और शासकीय नियमों और मर्यादाओं के अनुकूल ही था । इस सब के उपरांत भी नेहरू का व्यक्तिगत स्तर पर वैभव और शानोशौकत के साथ रहना देश के गरीबों का वास्तव में उपहास उड़ाने के समान था। जिनकी अचकन पर दिखाई देने वाला गुलाब का फूल भी उस समय गांव मालचा सोनीपत से ले जाया जाया करता था । जिस पर उस मन्दे जमाने में भी ₹100 रोजाना खर्च होते थे । नेहरू जी के कपड़े पेरिस धुलने जाते थे । जिन पर उस समय कितना खर्च होता होगा सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है ? कांग्रेस का यह बेताज का बादशाह देश के गरीबों का उपहास करता रहा और कांग्रेस ‘सारे जहां से अच्छा हिंदुस्ता हमारा’ – गीत गाती रही। तब उसे तनिक भी आभास नहीं हुआ कि उनका ‘बादशाह’ किस प्रकार देश के गरीबों का उपहास कर रहा है? इतना ही नहीं नेहरु जी राष्ट्रपति भवन में देश के गरीबों और गरीबी के वास्तविक प्रतिनिधि डॉ राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति के रूप में पहुंचाने के भी विरोधी थे।
यद्यपि उस समय अधिकांश ऐसे भवनों को ही शासकीय और राजकीय कार्यों में प्रयोग करने का निर्णय लिया गया जो पूर्व में अंग्रेज सरकार या देसी रियासतों के किन्हीं राजाओं या नवाबों के द्वारा इस रूप में प्रयोग किए जाते रहे थे। भारत की संसद और भारत के राष्ट्रपति का आवास अर्थात राष्ट्रपति भवन भी अंग्रेजों के द्वारा निर्मित किए गए भवन थे। जिन्हें स्वतंत्र भारत की सरकारों ने यथावत थोड़े से नाम और स्वरूप परिवर्तन के साथ अपने शासकीय कार्यों के लिए स्वीकार कर लिया।
यदि देश की संसद की बात करें तो आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप यह भवन अब हमारे लिए उपयुक्त नहीं रह गया है और इसका सबसे पहले आभास केंद्र की यूपीए सरकार ने उस समय किया था जिस समय लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार थीं। तब इस भवन को फिर से निर्मित करने का निर्णय लिया गया था। वास्तव में देश के मंत्रालयों के लिए जिन भवनों को किराए पर लेकर सरकार काम चलाती रही है उनका किराया भी सरकार को बहुत बड़ी रकम के रूप में प्रतिवर्ष चुकाना पड़ता है। यदि मंत्रालयों के ये भवन आदि सब एक स्थान पर केंद्रित हो जाएं तो उस किराए से भी देश को मुक्ति मिल सकती है जिसे दंड के रूप में सरकार प्रतिवर्ष भुगतान कर रही है। साथ ही लोगों को भी अपने मंत्रियों या अधिकारियों से मिलने में होने वाली असुविधा से भी बचाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त मंत्रियों व अधिकारियों को भी एक दूसरे के साथ समन्वय स्थापित करके शासन चलाने में सुविधा अनुभव होनी निश्चित है।
नए संसद भवन के निर्माण को कांग्रेस की यूपीए सरकार ने अपनी स्वीकृति प्रदान की, उसकी योजना पर काम भी किया। परंतु कांग्रेस के राहुल गांधी और पार्टी के अन्य नेता अपनी आदत से मजबूर हैं, इसलिए बेचारे मोदी सरकार द्वारा बनाए जा रहे संसद भवन के निर्णय का न केवल उपहास कर रहे हैं बल्कि उसे अनावश्यक भी बता रहे हैं। उनका कहना है कि जब देश पहले ही गरीबी की मार झेल रहा है तब संसद भवन पर खर्च करना मोदी सरकार की फिजूलखर्ची का ही एक उदाहरण है।
वैसे एक आंकड़ा यह भी है कि जब कांग्रेस की यूपीए सरकार ने 2012 में नई संसद भवन की योजना पर काम करना आरंभ किया था तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह थे ,और उस समय नए संसद भवन का क्षेत्रफल 35,000 वर्ग मीटर व
लागत 3000 करोड़(महंगाई के अनुसार 2020 के लिए रकम होगी- 3900 करोड़) आंकी गई थी।
मोदी सरकार ने 2020 में जब नए संसद भवन के निर्माण पर कार्य करना आरंभ किया है तो इस नए भवन का क्षेत्रफल 65,000 वर्ग मीटर और लागत: ₹ 970 करोड़ निर्धारित की गई है। इस आंकड़े से स्पष्ट हो जाता है कि मोदी राज में क्षेत्रफल दोगुना किया गया है, लेकिन लागत एक चौथाई है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहीं नहीं बोला है कि यूपीए सरकार के द्वारा जिस संसद भवन का निर्माण किया जा रहा था ,उसमें भी एक घोटाला हो रहा था । परंतु घोटाले वालों को अपने आप घोटाले का भंडाफोड़ होने का डर सता रहा है । उनकी आत्मा उन्हें कोस रही है कि तुम जिस कार्य को 3900 करोड़ में करने जा रहे थे मोदी उसे एक चौथाई लागत में पूर्ण करने जा रहा है और वह भी लगभग दोगुने क्षेत्रफल पर संसद भवन का निर्माण करके।
हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि गरीबों का रोना रोने वाली कांग्रेस गरीबों के नाम पर क्रूर खेल खेलती रही है । कांग्रेस की इस क्रूरता का उदाहरण है नई दिल्ली में गांधी, नेहरू और इंदिरा के समाधि स्थल। इन तीनों महापुरुषों के समाधि स्थलों का कुल क्षेत्रफल 142 एकड़ है। हम किसी भी महापुरुष के ऐसे समाधि स्थलों के बनाए जाने के विरोध में नहीं हैं, क्योंकि उनसे भी इतिहास को सुरक्षित रखने और गौरव पूर्ण ढंग से अपनी आने वाली पीढ़ियों के सामने प्रस्तुत करने में सहायता मिलती है । परंतु जब कांग्रेस का गरीबों के हित में रोना सुनते हैं तो ऐसे समाधि स्थलों के बारे में भी सोचने को विवश हो जाना पड़ता है । क्योंकि अपने शासनकाल में कांग्रेस ने इतने बड़े भूभाग पर सरकार का पैसा पानी की तरह बहाया था ।वर्तमान बाजार मूल्य में यह भूमि 171500 करोड़ की है। कहने का अभिप्राय है कि जिस भूमि का इस समय राष्ट्रहित में कोई उपयोग नहीं हो रहा है ,उसके रखरखाव आदि पर तो कांग्रेस आज भी विपुल धनराशि खर्च कर सकती है। पर जिन स्थलों या सभा भवनों से देश का शासन चलता रहा है या चलाया जाएगा उन पर खर्च करते हुए मोदी सरकार को देखकर उसे आपत्ति हो रही है ? वास्तव में कांग्रेस का यह दोगलापन ही उसे वैचारिक दिवालियापन की स्थिति तक ले आया है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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