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विशेष संपादकीय

जब कलम से कांपते थे राजमहल

bikaner2राजा सर रामपाल सिंह हिंदू महासभा के अध्यक्ष थे। उन्हीं के द्वारा ‘हिंदुस्तान’ पत्र का शुभारंभ किया गया था। पत्र के पहले संपादक थे महान हिंदूवादी और प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक पंडित मदन मोहन मालवीय। मालवीय जी ने अपनी नियुक्ति से पहले ही राजा के समक्ष यह प्रस्ताव रख दिया था कि वे उन्हें कभी भी रात को अपने कार्यालय या घर पर नही बुलाएंगे। मालवीय जी जानते थे कि राजा को ‘पीने’ की लत है और वे यदि उन्हें रात में अपने कार्यालय या घर पर बुलाएंगे तो निश्चय ही कहीं न कहीं कलम की स्वतंत्रता बाधित होगी। इसलिए दूरदृष्टि का परिचय देते हुए मालवीय जी ने राजा को वचनबद्घ करने का प्रयास किया। समय बीतता गया। एक दिन राजा ने किसी काम के लिए पंडित मदन मोहन मालवीय को रात्रि में ही घर पर बुला भेजा। मालवीय जी समझ गये कि आज ‘हिंदुस्तान’ में बैठने का उनका अंतिम दिन आ गया है। वह उठे, एक कागज लिया उस पर दो वाक्य लिखे और उसे अपनी जेब में रखकर चल दिये।
राजा ने बड़ी आवभगत के साथ मालवीय जी को अपने घर में बैठाया। बातचीत की और जिस बात के लिए उन्हें बुलाया था वह भी पूरी की। मालवीय जी भी बड़ी आत्मीयता से बैठे बातें करते रहे, परंतु जब उठे तो जेब में रखे कागज को उन्होंने निकालकर राजा के सामने रख दिया। राजा ने कागज को देखा तो अवाक रह गये। उस पर महामना ने अपना संपादकीय दायित्वों से त्यागपत्र लिख दिया था। राजा ने आश्चर्य से पूछा-”यह क्या?”
”वही महाराज, जो मेरे आपके बीच पहले दिन ही निश्चित हो गया था कि आप मुझे घर पर बुलाएंगे तो मैं संपादकीय दायित्वों का निर्वाह करने के स्थान पर उससे त्यागपत्र दे दूंगा।
राजा ने भरसक प्रयास किया कि मालवीय जी अपने त्यागपत्र को वापस ले लें, लेकिन मालवीय जी तो ‘महामना’ थे इसलिए फिर कभी ‘हिंदुस्तान’ कार्यालय नही गये।
सुप्रसिद्घ पत्रकार रामानंद चटर्जी एक बार गंगा स्नान के लिए इलाहाबाद गये। वहां वह पानी में अंदर एक ऐसे स्थान पर पहुंच गये जहां वे डूबने लगे। उन्हें डूबते देखकर किसी दयालु व्यक्ति ने उन्हें निकालकर बचा लिया। चटर्जी बहुत प्रभावित और प्रसन्नचित थे। उन्होंने बचाने वाले उस व्यक्ति से प्रसन्न होकर कह दिया कि मैं अमुक समाचार पत्र का संपादक हूं, कभी आना मैं आपकी सहायता करूंगा।
बचाने वाला वह व्यक्ति कुछ कालोपरांत अपने हाथ से लिखा एक कागज लेकर गया। संपादक ने वह कागज पढ़ा और छापने में असमर्थता व्यक्त कर उसे वापस लौटा दिया। यही सिलसिला तीन बार चला। तीसरी बार वह व्यक्ति झल्ला उठा। कहने लगा कि आपने तो मुझे सहायता का आश्वासन दिया था कि आप आना और मैं आपकी सहायता करूंगा। पर मैं यह क्या देख रहा हूं कि आप कोई भी सहायता देने के लिए तैयार नही है?”
संपादक महोदय ने आगन्तुक के प्रति कोई भी उग्रता प्रदर्शित न करते हुए विनम्रता से उससे कहा-”बन्धु आप चाहें तो मुझे नदी में वहीं ले जाकर डुबो दें, जहां से आपने मुझे बचाया था। परंतु मैं अपनी लेखनी के साथ कोई समझौता नही कर सकता।”
आगन्तुक निरूत्तर होकर चला गया। बीते हुए समय में लोग सचमुच पत्रकारिता को एक मिशन बनाकर आया करते थे। उस समय पत्रकारिता के माध्यम से लोग जनसेवा को अपना उद्देश्य माना करते थे। समय बदल गया, और पत्रकारिता के मानदण्ड भी बदल गये। अब सबसे सस्ती कलम हो गयी। संपादक नौकरी करने लगे और मालिक की जी हुजुरी उनके लिए जरूरी हो गयी। अपवादों को नमन करते हुए कहा जा सकता है कि राजमहलों और राजमुकुटों की जी हुजूरी में ही वक्त कट जाता है-आज के कलमकार का। इसलिए वो दिन हवा हो गये हैं जब कलमकार की कलम से राजमुकुट और राजमहल दोनों कांप जाया करते थे, आज तो राजमुकुट और राजमहल की घुड़की से उल्टे कलमकार ही कांप जाते हैं। ऐसी स्थिति देखकर अनायास ही मुंह से निकल पडता है-कहां गये वो लोग जिनके सामने ‘सर’ रामपाल सिंह जैसे राजा गिडगिड़ाते थे और वो अपने आदर्शों से हिलते नही थे?

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