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आज का चिंतन

मनुष्य को सद्धर्म और देशहित का विचार करके ही सब काम करने चाहिए

ओ३म्

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हम मनुष्य कहलाते हैं। हमारी पहचान दो पैर वाले पशु के रूप में होती है। परमात्मा ने पशुओं को चार पैर वाला बनाया है। उन पशुओं से हम भिन्न प्राणी हैं। हमारे पास दो पैरों पर आसानी से खड़ा होने की सामर्थ्य होती है। हम दो पैरों से चल सकते हैं। हम अपने दो हाथों का अनेक प्रयोजनों को पूरा करने वाले कार्यों को करने वाले कार्य कर सकते हैं। हमारे पास बुद्धि भी है जिससे हम सोच, विचार, चिन्तन-मनन व सत्य व असत्य का विचार कर शास्त्रों व अपने बड़े अनुभवी पुरुषों की सहायता से सत्य असत्य का निर्णय कर करा सकते हैं। मनुष्य अल्पज्ञ प्राणी होता है। वह अनेक गुणों सहित अवगुणों में भी फंस जाता है। सत्गुणों का विकास करना कर्तव्य होता है जिसमें माता, पिता तथा हमारे आचार्य एवं स्कूलों के गुरुजनों का मुख्य योगदान होता है। हमारी पुस्तकें एवं धर्म विषयक ग्रन्थ भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हमें अपने धर्म ग्रन्थों की सभी बातों का मनन कर सत्यासत्य का निर्णय कर सत्य एवं उपयोगी बातों को स्वीकार करना चाहिये और जो बातें असत्य, अविद्यायुक्त, ज्ञान व विज्ञान के विरुद्ध तथा समाज के अन्य मनुष्यों के हितों के विरुद्ध हों, उनका त्याग करना चाहिये। ऐसा करने से ही हम सुखी व शान्त रह सकते हैं तथा देश व समाज की उन्नति हो सकती है। इसके विपरीत आचरण व व्यवहार करने से हमारा देश व समाज उन्नति न कर अनेक समस्याओं व उलझनों में फंस सकता है। अतः हमें मनुष्य शब्द को सार्थक करने के लिये अपने सभी कामों को मनन करते हुए सत्य व असत्य का निर्णय कर सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग कर करने चाहियें। यही नियम हमें वैदिक धर्म में मिलता जिसके सत्यस्वरूप का दिग्दर्शन ऋषि दयानन्द (1825-1883) ने अपने जीवन में ईश्वरीय ज्ञान वेदों का अध्ययन कर उसकी सार्वजनीन हितकर शिक्षाओं का प्रचार व प्रसार कर तथा अनेक ग्रन्थों के लेखन के द्वारा किया था। उनका बनाया हुआ एक अत्यन्त उपयोगी नियम है ‘सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी(देश व समाज का व्यापक हित करने वाले) नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम(जिससे देश, समाज तथा वयक्तिगत हित होता है, उसके पालन) में सब स्वतन्त्र रहें।’ सब मनुष्यों शब्दों से यहां यह सब देशवासियों व देश के नागरिकों को सम्बोधित किया गया है। आज की परिस्थितियों में इस नियम का सबको पालन करना चाहिये जिससे किसी भी मनुष्य व सम्प्रदाय के हितों की हानि न हो जैसा कि आजकल होता देखा जाता है।

हम मनुष्य कहलाते हैं तो इसका अर्थ व अभिप्राय भी हमें पता होना चाहिये। साधारण मनुष्य न तो मनुष्य शब्द पर ध्यान देते हैं न कभी उनको इसका अर्थ बताया जाता है। ऋषि दयानन्द ने अपनी लघु पुस्तक‘आर्योद्देश्यरत्नमाला’ में मनुष्य शब्द के अर्थ व भाव पर प्रकाश डाला है। वह लिखते हैं‘जो विचार के बिना किसी काम को न करे, उसका नाम‘मनुष्य’ है।’ मनुष्य मनन अर्थात् विचार करके अपने सभी कार्यों को करने वाले व्यक्ति को कहते हैं। मनन का अर्थ उचित-अनुचित, सत्य-असत्य तथा अपने व दूसरों के हित व अहित का ध्यान करना होता है। जो विचार कर ऐसा करते हैं वही मनुष्य कहलाते हैं। ऋषि दयानन्द ने मनुष्य किसे कहते हैं व मनुष्य को क्या करना होता है, इस पर अपने अमर ग्रन्थ ‘सत्यार्थप्रकाश’ में प्रस्तुत अपने ‘स्वमन्तव्यामन्तव्य-प्रकाश’ में प्रकाश डाला है। वह लिखते हैं ‘मनुष्य उसी को कहना कि जो मननशील हो कर स्वात्मवत् अन्यों के सुख-दुःख और हानि-लाभ को समझे। अन्यायकारी बलवान् से भी न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे। इतना ही नहीं किन्तु अपने सर्व सामथ्र्य से धर्मात्माओं कि चाहे वे महा अनाथ, निर्बल और गुणरहित क्यों न हों, उन की रक्षा, उन्नति, प्रियाचरण और अधर्मी चाहे चक्रवर्ती सनाथ, महाबलवान् और गुणवान् भी हो तथापि उस का नाश, अवनति और अप्रियाचरण सदा किया करे अर्थात् जहां तक हो सके वहां तक अन्यायकारियों के बल की हानि और न्यायकारियों के बल की उन्नति सर्वथा किया करे। इस काम में चाहे उस(मनुष्य) को कितना ही दारुण दुःख प्राप्त हो, चाहे प्राण भी भले ही जावें परन्तु इस मनुष्यपनरूप धर्म से पृथक् कभी न होंवे।’ मनुष्य क्या व कैसा होता है व होना चाहिये, इस पर ऋषि दयानन्द ने जो प्रकाश डाला है वह सर्वमान्य सिद्धान्त है परन्तु इसका पालन होता हुआ कहीं देखने को नहीं मिलता।

मनुष्य को परमात्मा से बुद्धि प्राप्त है अतः उसे सत्य व असत्य, उचित व अनुचित तथा अपने हित व दूसरों के हितों सहित अन्यों के हित व अहितों पर भी विचार कर निर्णय करने चाहिये। ऐसा करके ही मनुष्य सच्चा व मनुष्य शब्द के अर्थ को सार्थक करने वाला मनुष्य बन सकता है। मनुष्य को मनन वा सत्यासत्य का विचार कर सत्य व विद्या से युक्त आचरण करने योग्य मान्यताओं का विचार भी करना चाहिये। मनुष्य का सदाचार से युक्त जीवन ही धार्मिक जीवन कहलाता है। जिसके जीवन में सदाचार व दूसरों के लिये प्रेम व सहयोग की भावना, देश का हित व उसकी उन्नति के लिये कार्य करने की भावना नहीं है, जो अपने व दूसरे मत के व्यक्ति का उचित सम्मान व आदर नहीं करता, जो किसी से अकारण घृणा करता है, जो अपने को श्रेष्ठ व दूसरों को दीन हीन समझता है, वह न तो तो सच्चा व आदर्श मनुष्य होता है न ही उसे धार्मिक मनुष्य कहते हैं। सत्य को धारण कर ही मनुष्य ज्येष्ठ व श्रेष्ठ मनुष्य बनता है। ऐसा ही सबको बनना भी चाहिये। इसी लिये परमात्मा ने सृष्टि के आदिकाल में ही मनुष्यों को वेदज्ञान देकर उन्हें श्रेष्ठ आचरण को धारण करने की शिक्षा दी थी। वेद मनुष्य को मनुष्य बनने की शिक्षा व व प्रेरणा करते हैं। वेदों में ‘मनुर्भव’ कहकर मनुष्य को मननपूर्वक कार्य व आचरण करने की प्रेरणा की गई है। अतः हमें वेदों से प्रेरणा लेकर व सत्यासत्य का विचार कर ही अपने जीवन के सभी कार्यों को करना चाहिये। हमारे सभी ऋषियों, जिन्होंने अपनी बुद्धि का पूर्ण व अधिकतम विकास किया था, जो महान ज्ञानी-विज्ञानी मनुष्य थे, उन्होंने वेदों की परीक्षा कर पाया था कि वेद समस्त संसार में ज्ञान व विज्ञान से युक्त सब सत्य विद्याओं के आदर्श ग्रन्थ हैं। वेद ही मनुष्य मात्र का सर्वमान्य ग्रन्थ हो सकता है। वेद की सभी शिक्षाओं मानवमात्र व प्राणी मात्र की हितकारी हैं। वेदाध्ययन कर मनुष्य का वर्तमान जीवन ही नहीं सुधरता व सवंरता है अपितु उसका लोक व परलोक दोनों ही सुधरते, संवरते व बनते हैं। बहुत से लोगों व मतों को परलोक का भी यथावत् ज्ञान नहीं है। अतः उनको वेदों से ही परलोक, पुनर्जन्म के सिद्धान्तों, परजन्म में आत्मा की गति, कर्मानुसार जन्म व सुख दुख विषयक मान्प्यताओं व सिद्धान्तों को स्वीकार करना चाहिये। ऐसा करके मनुष्य अपना ही हित करेंगे और उससे समाज व देश को भी लाभ होगा।

मनुष्य जीवन की सार्थकता सद्धर्म को स्वीकार कर उसके अनुसार आचरण करने में है। विचार व परीक्षा करने पर वेदमत जिसका प्रचार प्राचीन काल में हमारे ऋषि मुनि करते थे और इसकी व्याख्या में उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति तथा संस्कार आदि ग्रन्थ लिखे गये, उनकी विद्या व बुद्धि के अनुकूल जो लाभकारी बातें हैं, उन्हें स्वीकार करना चाहिये। मनुष्य किसी भी मत को मानें, उन्हें अपनी सभी मान्तयताओं के सत्यासत्य पर अवश्य ही विचार करना चाहिये। इसका कारण यह है कि यदि हम श्रेष्ठ विचारों व सिद्धान्तों को नहीं अपनायेंगे और असत्य व अश्रेष्ठ को नहीं छोड़गें, तो उसका फल व परिणाम व्यक्ति विशेष को ही परमात्मा की न्याय-व्यवस्था से भोगना पड़ेगा तब उसे बचाने कोई नहीं आयेगा। उसके सत्यकर्म व सत्य कर्मों के संस्कार ही उसके सहायक होकर उसे दुःखों से बचाकर सुख प्राप्त करने-कराने में सहायक होंगे। अतः हमें वेदों की मान्यताओं से युक्त सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ, जिसमें धार्मिक मान्यताओं के सत्य व असत्य दोनों पक्षों को निष्पक्ष रूप में प्रस्तुत किया गया है, अध्ययन करना चहिये और अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार जिसे आत्मा स्वीकार करे, उन उन सत्य मान्यताओं का ग्रहण व धारण तथा असत्य का त्याग करना चाहिये। ऐसा करके ही हम अपनी आत्मा, शरीर तथा जीवन की उन्नति कर सकते हैं। ऐसा करके ही हमारा देश व समाज भी श्रेष्ठ व महान बन सकता है। अज्ञान व अन्धविश्वासों को मानकर कोई भी देश व समाज सहित मत-मतान्तर महान नहीं बन सकता। ऋषि दयानन्द ने सभी मत-मतान्तरों के अज्ञान व अन्धविश्वासों का दिग्दर्शन सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में कराया है। अन असत्य विचारों व मान्यताओं को सबको छोड़ना उचित व हितकर है। इससे व्यक्तिगत लाभ सहित देश व समाज भी लाभान्वित होंगे तथा देश सहित विश्व में शान्ति का वातावरण बनाने में सहयोग प्राप्त होगा। ऐसा करके व्यक्ति विशेष का यह जन्म भी सुख-शान्ति व आत्मिक उन्नति से व्यतीत होगा तथा परजन्म व पुनर्जन्म में भी उस मनुष्य व जीवात्मा को श्रेष्ठ योनि व परिवेश प्राप्त होगा। वह मनुष्य से इतर पशु, पक्षी आदि नीच योनियों में जाकर दुःख भोगने से बच सकते हैं।

हम किसी भी मत व धर्म को मानें परन्तु हमें अपने देश व समाज के हित का सर्वोपरि ध्यान रखना चाहिये। अपने स्वार्थों के लिये दूसरों को प्रसन्न करने की तुष्टिकरण की नीति उचित नहीं होती। इस पर विजय पाना अत्यन्त कठिन है। ऐसा करना मनुष्यता के अनुकूल नहीं होता। मनुष्य को वही करना चाहिये जो मनुष्य के निजी हित सहित देश व समाज के व्यापक हित में हो। हमें ऐसे ही लोगों का मान सम्मान करना चाहिये व उन्हीं को सहयोग करना व सहयोग देना चाहिये जो मनुष्य को मननशील मनुष्य बनाने के साथ देश व समाज हित को सर्वोपरि महत्व देते हों तथा निजी व दलगत स्वार्थों से ऊपर उठे हुए हों। हमें समाज के सभी हितकारी मनुष्यों तथा अहितकारी लोगों को भी पहचानना चाहिये। असत्य की हानि व सत्य की उन्नति करनी चाहिये तभी हमारा मनुष्य होना सार्थक होगा। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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