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पाकिस्तान में हिंदू समाज की बड़ी जीत तोड़े गए मंदिर का पुनर्निर्माण तय

 

सुरेश हिन्दुस्थानी

हिन्दू मंदिर विध्वंस मामले में पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय में हुई सुनवाई में न्यायालय ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि खैबर पख्तूनख्वा की सरकार मंदिर के साथ ही परमहंस जी महाराज की समाधि का दो सप्ताह के अंदर पुनर्निर्माण कराया जाए।

पड़ोसी देश पाकिस्तान में हिन्दू आस्था केंद्रों के जय जयकार का उद्घोष होना यूँ तो कालबाह्य हो गया है। लेकिन अभी हाल ही में जिस प्रकार से एक मंदिर को तोड़ा गया है और उसके बाद आक्रोशित हिन्दू समाज ने जो प्रतिक्रिया दी, वह अपने अस्तित्व को बचाने के लिए एक शक्तिशाली कदम माना जा रहा है। उसी की परिणति स्वरूप पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने खैबर पख्तूनख्वा प्रांत की सरकार को आदेशित किया है कि मुल्ला मौलवियों की उपस्थिति में विध्वंस किए मंदिर को पुनर्स्थापित किया जाए। इसमें खास तथ्य यह है कि इस मंदिर को बनाने में जो व्यय आएगा वह मंदिर तोड़ने वालों से ही वसूल किया जाएगा। इस कदम को पाकिस्तान में हिन्दू समाज की बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। क्योंकि पाकिस्तान के न्यायालय ने अल्पसंख्यक समाज की भावनाओं का सम्मान करते हुए जो कदम उठाया है, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। क्योंकि वहां के कट्टरपंथी मुस्लिम यह कभी नहीं चाहते कि उनकी धरती पर हिन्दू समाज के श्रद्धा केंद्रों का अस्तित्व रहे। हालांकि इससे पूर्व करतारपुर साहिब गुरुद्वारे के मामले में भी पाकिस्तान को झुकना पड़ा था। यह सब भारत की बढ़ती हुई शक्ति का ही परिचायक है।

कभी भारत का हिस्सा रहे पाकिस्तान की धरती पर आज भी हिन्दू आस्था केन्द्रों के चिन्ह मिल जाते हैं, लेकिन इन आस्था स्थलों के प्रति पाकिस्तान की जनता के मन में कितना जहर भरा हुआ है, यह कई बार दृष्टव्य हो चुका है। स्वतंत्रता के बाद पाकिस्तान में कई मंदिरों के निशान तक मिटा दिए गए। इतना ही नहीं पाकिस्तान की धरती को हिन्दू समाज विहीन करने का भी षड्यंत्र भी लगातार चल रहा है। जिसके चलते कई हिन्दू परिवारों ने या तो पाकिस्तान छोड़ दिया है या फिर भय के कारण मुस्लिम बन गए।

अभी लगभग एक सप्ताह पहले ही में पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में करक जिले के टेरी गांव में कुछ मौलवियों की उपस्थिति में किए गए मंदिर के विध्वंस मामले में हिन्दू समाज ने जो प्रतिरोध दिखाया, वह निश्चित रूप से पाकिस्तान के प्रताड़ित हिन्दू समाज में अपने धर्म के प्रति जीने का उत्साह जगाने वाला है। इसका आशय यह भी हो सकता है कि बार-बार मरने जैसे वातावरण में जीने से अच्छा है कि एक बार शक्ति का प्रकटीकरण किया जाए। इसी शक्ति प्राकट्य के आक्रोश के बाद न्यायालय और प्रशासन ने यह कठोर कार्यवाही की है। जिसमें लगभग सौ उपद्रवियों को गिरफ्तार किया है। इतना ही नहीं 8 पुलिस अधिकारियों का निलम्बन भी किया गया है। महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि इन उपद्रवियों पर आतंक फैलाने वाली धाराओं के अंतर्गत कार्यवाही की गई है।

मंदिर विध्वंस मामले में पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय में हुई सुनवाई में न्यायालय ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि खैबर पख्तूनख्वा की सरकार मंदिर के साथ ही परमहंस जी महाराज की समाधि का दो सप्ताह के अंदर पुनर्निर्माण कराया जाए। यह हालांकि पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दू समाज के लिए कुछ हद तक राहत प्रदान करने वाली खबर हो सकती है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ऐसे कार्य करने वाले विध्वंसकारी मानसिकता के लोग अपने आप में परिवर्तन ला सकेंगे। समझा जाता है कि पाकिस्तान में हिन्दू समाज को प्रताड़ित करने के लिए सुनियोजित प्रयास किए जाते रहे हैं। इन्हीं प्रयासों के अंतर्गत हिन्दू युवतियों का अपहरण भी कर लिया जाता है और उसके बाद या तो उस युवती का जबरदस्ती निकाह करा दिया जाता है या फिर उसे मौत के घाट उतार दिया जाता है। इतना ही नहीं हिन्दू कन्याओं के साथ कभी-कभी अमानवीय कृत्य तक किए जाते हैं। पिछले वर्ष एक चिकित्सक युवती के साथ हुई दुर्दान्त घटना को याद करते हुए सिहरन पैदा होती है। लम्बे समय से पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति वैमनस्यता के भाव से कार्रवाई की जाती रही है, इतना ही नहीं इन हिन्दू विरोधी घटनाओं के पीछे वे लोग भी शामिल होते हैं, जो अपने आपको भाईचारा स्थापित करने का ठेकेदार मानते हैं। खैबर पख्तूनख्वा के मंदिर मामले में न्यायालय ने संवैधानिक मर्यादाओं की रक्षा करते हुए मंदिर बनाने का आदेश दिया, जो हिन्दू समाज की एक बड़ी जीत के रूप में देखी जा रही है। लेकिन इस आदेश के बाद भी पाकिस्तान में मंदिर सुरक्षित रह सकेंगे, इस बात की कोई गारंटी नहीं है क्योंकि पाकिस्तान की जनता के मन में हिन्दू समाज के प्रति समन्वय का भाव नहीं है। इसके पीछे मुख्य कारण यही माना जाता है कि पाकिस्तान के राजनेता और मुस्लिम धर्म गुरु वहां की जनता के मन में हिन्दू समाज के प्रति जहर भरते हैं। वही जहर मंदिरों और अल्पसंख्यक समाज के विरोध में सामने आता है। कहा जाता है कि पाकिस्तान के कई स्थानों पर हिन्दू समाज को प्रताड़ित करने की हद ही पार हो गई है, जिसके कारण वहां का हिन्दू समाज अपने लिए सुरक्षित ठिकाने की तलाश में इधर-उधर भटकता रहता है। ऐसे ही कई परिवार आज विदेशों की धरती पर शरणार्थी बनकर जीवन जी रहे हैं। ऐसे कई परिवार भारत में भी हैं। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान के मौलवियों को चाहिए कि वह वहां की जनता के मन में समन्वय का भाव प्रवाहित करें और इस्लाम धर्म के मूल उद्देश्यों को प्रकट करें।

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