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यौन उत्पीड़न की जघन्य तम घटनाओं पर राजनीति क्यों और कब तक?

 

बीपी गौतम

बदायूँ काँड में कार्रवाई से जब पीड़िता के परिजन संतुष्ट हैं तो नेता राजनीति क्यों कर रहे हैं
इस घटनाक्रम में एक अहम सवाल और उठ रहा है कि देर शाम मंदिर में चल चढ़ाने की परंपरा नहीं है। शाम को दीपक जलाया जाता है, श्रृंगार किया जाता है पर, एफआईआर में कहा गया है कि मृतका जल चढ़ाने गई थी। इसके अलावा पोस्टमार्टम रिपोर्ट को दुष्प्रचारित किया गया है।

उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के थाना उघैती क्षेत्र में हुई यौन उत्पीड़न की जघन्यतम वारदात का सच पुलिस की जांच पूरी होने के बाद ही सामने आ सकेगा लेकिन स्थानीय लोग वारदात को लेकर बहुत ज्यादा गंभीर और स्तब्ध नजर नहीं आ रहे हैं। वारदात के पीछे का सच अधिकांश लोगों को पता है, जिससे स्थानीय लोग बाहरी लोगों की प्रतिक्रिया को देख कर हैरान नजर आ रहे हैं।

यह सच है कि पीड़िता की मृत्यु हुई है और वह गंभीर रूप से घायल थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतका के घाव सामने आये तो यौन उत्पीड़न का आरोप होने के कारण वारदात को जघन्यतम मान लिया गया, जबकि सच कुछ और ही बताया जा रहा है। बताते हैं कि मृतका का पति सीधा-सा है लेकिन, मृतका दूसरी पत्नी थी। पहली पत्नी तलाक के बिना ही अलग हो गई। मृतका पति की तुलना में ज्यादा सक्रिय थी, वह आंगनबाड़ी कार्यकत्री की सहायिका भी थी, घर का खर्च वह ही चलाती थी, वह घर-परिवार पूरी तरह संभालती थी, वह ही घर की मालकिन थी, उसी के आदेश-निर्देश परिवार में चलते थे, सो उससे सवाल-जवाब करने वाला कोई नहीं था, वह कब जा रही है, कहाँ जा रही है, क्यों जा रही है, कब आयेगी?, ऐसे सवाल उससे कोई नहीं करता था।

मृतका के मायके और ससुराल वाले गाँव पास ही हैं, बमुश्किल ढाई किमी का अंतर है। थाने में दर्ज कराई गई एफआईआर में कहा गया है कि 3 जनवरी को मृतका शाम 5 बजे मायके में स्थित ठाकुर जी महाराज के मंदिर पर चल चढ़ाने गई थी, उसके बाद रात के 12 बजे महंत सत्यनारायण, उसका चेला वेदराम और ड्राइवर जसपाल बुलेरो गाड़ी से लहूलुहान अवस्था में मृतका को घर पर छोड़ गये और बता गये कि वह गिरने से घायल हो गई है, इसके कुछ देर बाद उसने दम तोड़ दिया, यहाँ तक की कहानी तहरीर में सही है, इसके आगे उक्त तीनों पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है, संबंधित धाराओं में पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया है और वेदराम एवं जसपाल गिरफ्तार कर जेल भेज दिए हैं, वहीं 7 जनवरी की रात में भागने का प्रयास कर रहा महंत सत्यनारायण भी ग्रामीणों ने पकड़ लिया और बाद में पुलिस के हवाले कर दिया, वह गाँव में ही किसी के घर में छुपा था और रात में भागने का प्रयास कर था तभी ग्रामीणों ने दौड़ कर खेतों में दबोच लिया।

परिजनों का कहना है कि पुलिस को रात को ही सूचना दे दी थी लेकिन, पुलिस नहीं आई, यह आरोप भी सही लगता है लेकिन, निलंबित किये जा चुके थाना प्रभारी रावेन्द्र सिंह सुबह को गाँव पहुंचे पर, तब तक गाँव हरिपुर में कुआं में ईटें निकालते समय मिट्टी की ढांग गिरने से किशनपाल नाम का युवक दब गया। रावेन्द्र सिंह मृतका के परिजनों से यह कह कर चले गये कि वे लौट कर आते हैं, फिर पंचनामा भरने की कार्रवाई करायेंगे लेकिन, हरिपुर में किशनपाल को बाहर निकालने का कार्य दोपहर बाद तक चला, जिससे वे लौट नहीं पाये। रावेन्द्र सिंह ने संभवतः यह सोच लिया होगा कि वहां महिला मर चुकी है और यहाँ युवक के बचने की उम्मीद है, सो वे किशनलाल को बचाने में ज्यादा रूचि लेते रहे, जो गलत नहीं कहा जा सकता पर, इतनी भूल या, चूक कही जा सकती है कि वे स्वयं नहीं आ सकते थे तो, क्षेत्र के सब-इंस्पेक्टर को भेज कर पंचनामा भरवा कर शव पोस्टमार्टम के लिए जिला मुख्यालय भिजवा सकते थे, इस गलती का दंड उन्हें मिल चुका है, उन्हें और क्षेत्र के प्रभारी अमरजीत सिंह को एसएसपी संकल्प शर्मा ने निलंबित कर दिया, साथ ही दोनों के विरुद्ध के विरुद्ध 166 ए के अंतर्गत मुकदमा भी दर्ज कर लिया गया है। देवेन्द्र सिंह धामा को नया थाना प्रभारी नियुक्त कर दिया गया है।

इस घटनाक्रम में एक अहम सवाल और उठ रहा है कि देर शाम मंदिर में चल चढ़ाने की परंपरा नहीं है। शाम को दीपक जलाया जाता है, श्रृंगार किया जाता है पर, एफआईआर में कहा गया है कि मृतका जल चढ़ाने गई थी। इसके अलावा पोस्टमार्टम रिपोर्ट को जिस तरह से दुष्प्रचारित किया गया है, उसको लेकर डीएम कुमार प्रशांत ने मजिस्ट्रियल जाँच के आदेश दे दिए हैं। एडीएम (वित्त) नरेंद्र बहादुर सिंह को जाँच सौंपी गई है।

पुलिस की लापरवाही और पोस्टमार्टम के आधार पर खबरें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संज्ञान में पहुंचीं तो, उन्होंने एडीजी से रिपोर्ट तलब कर ली, साथ ही एसटीएफ को जांच में जुटा दिया। एडीजी मौके पर पहुंचे, इसके बाद घटना पर राजनैतिक प्रतिक्रिया आना शुरू हो गईं। अखिलेश यादव, मायावती और प्रिंयका गाँधी के ट्वीट आ गये। ट्विटर पर घटना ट्रेंड करने लगी। समाजवादी पार्टी ने धर्मेन्द्र यादव के नेतृत्व में मौके पर जाने के लिए प्रतिनिधि मंडल गठित कर दिया। धर्मेन्द्र यादव 7 जनवरी को गाड़ियों के विशाल काफिले के साथ मौके पर पहुंचे, उन्होंने परिजनों से वार्ता करने के बाद परिवार को 25 लाख रुपया, मृतका के बेटे को नौकरी देने के साथ सीबीआई जाँच कराने की मांग की। हालाँकि 6 जनवरी को क्षेत्रीय सपा विधायक व पूर्व राज्यमंत्री ओमकार सिंह यादव और उनके बेटे डीसीबी के पूर्व चेयरमैन ब्रजेश यादव पीड़ित परिवार से मिल आये थे।

धर्मेन्द्र यादव के बाद राज्यमंत्री महेश चंद्र गुप्ता, सांसद संघमित्रा मौर्य, राज्यसभा सदस्य वीएल वर्मा भाजपा के तमाम पदाधिकारियों के साथ पहुंच गये, उन्होंने भी परिजनों से वार्ता कर घटना पर दुःख जताया, उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार पीड़ित परिवार के साथ है और हर संभव मदद करने के साथ ही आरोपियों को कड़ी सजा दिलाई जायेगी, इसके अलावा आम आदमी पार्टी भी भाजपा सरकार पर लगातार हमला कर रही है।

उधर कोई वारदात राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित हो जाती है तो, उसके बाद जाने-अनजाने कई सारी गलतियाँ होने लगती हैं, उस घटना के माध्यम से स्वयं को भी प्रचारित करने का ट्रेंड चल रहा है। जैसे कि राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य चंद्रमुखी आईं तो, वे संयोग से कह गईं कि महिलाओं को समय-असमय नहीं पहुंचना चाहिए, संध्या के समय नहीं जाती तो, संभवतः ऐसी वारदात नहीं होती, इस तरह की बयानबाजी से विपक्ष को अवसर मिलता रहता है, जबकि उनका काम बयान देना नहीं बल्कि, राष्ट्रीय अध्यक्ष को रिपोर्ट प्रेषित करना था।

पूरे घटनाक्रम में दो बातें मुख्य हैं। एक पुलिस की चूक और दूसरी पोस्टमार्टम रिपोर्ट का दुष्प्रचारित हो जाना। चूक करने वाले थाना प्रभारी को दंड मिल चुका है लेकिन, दूसरे की गलती का दंड किसी निर्दोष को नहीं मिलना चाहिए। संविधान भी कहता है कि भले ही दोषी छूट जाये पर, निर्दोष को सजा नहीं मिलना चाहिए। इधर मृतका के परिजन पुलिस-प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई से पूरी तरह संतुष्ट नजर आ रहे हैं। मृतका का बेटा स्वयं को कार्रवाई से संतुष्ट बताते हुए सरकारी नौकरी की मांग रहा है। कहा जा सकता है कि जब पीड़ित परिवार कोई सवाल नहीं कर रहा तो अन्य के द्वारा किये जा रहे सवालों का बहुत ज्यादा महत्व बचता नहीं है, सो अब उक्त वारदात पर सवाल-जवाब करने का क्रम थम जाना चाहिए।

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