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आज का चिंतन

यज्ञ ही है हमारे जीवन का आधार

आचार्य करणसिह नोएडा

 

सप्तास्यासन्परिधयस्त्रि:सप्त समिधः कृता:।देवायद्यज्ञं तन्वाना अवध्नन् पुरूष पशुम्।।यजु• ३१\१५।। यज्ञेनयज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।ते ह नाकं महिमानः सचन्तअत्र पूर्वे साध्या सन्ति देवा।।१६ इस यज्ञ की सात परिधिया या लपेटे हैं, 21 इसकी सुविधाएं हैं। इस चीज को विस्तृत करते हुए विद्वान लोग जानने योग परमात्मा को अपने हृदय में बांधते व स्थिर करते हैं । विद्वान लोगों ने यज्ञ के द्वारा ही यज्ञ किया , यह आरंभ काल से ही धर्म है। इन महिमा संपन्न यज्ञ करने वालों ने पूर्ण सुख को प्राप्त किया जिसे पूर्व काल में भी साधन और देवों ने प्राप्त किया। 15 मंत्र में पहले भाग में सात परिधियो वा लपेटा और 21 समिधाओं का वर्णन है। जहां विशेष संख्याएं आ जाती हैं, मंत्र का आशय स्पष्ट नहीं होता। प्रत्येक पाठक को जो सूझता है, बही ग्रहण करता है। पुरुष सूक्त के सारे मंत्र यजुर्वेद के ३१वे अध्याय के पहले 16 मंत्र भी हैं।

स्वामी दयानंद जी ने इन मंत्रों का अर्थ वेद भाष्य भूमिका और यजुर्वेद भाष्य में किया है। भूमिका में 7 परिधियो पर लिखते हुए कहा है कि प्रत्येक लोक के अंदर सात आवरण व पर्दे हैं–समुद्र,त्रसरेणु, मेघ मंडल का वायु, वृष्टि जल, इस जल के ऊपर का वायु, सूक्ष्म वायु,धनंजय और अति सूक्ष्म वायु सुत्रात्मा।यजुर्वेद भाष्य में जिसे भूमिका से पीछे लिखा, गायत्री आदि 7 छन्दों को 7 परिधियां बताया है,और इस यज्ञ को लोकातंरो के अर्थ में नहीं बल्कि मानव यज्ञ के अर्थ में लिया है। 21 संविधान की बाबत भी दोनों स्थानों में कुछ भेद है। 5 सूक्ष्म भूत, 5 स्थूल भूत, पांच ज्ञानेंद्रियां दोनों में आते हैं। शेष छह सुमिधाएं भूमिका के अनुसार से हैं। पांच कर्मेंद्रियां और छठी प्रकृति+ बुद्धि+ जीव,जो तीनों अत्यंत सूक्ष्म पदार्थ हैं। यजुर्वेद में 6 पदार्थ कहे हैं।प्रकृति महत्तत्व, अहंकार, सत्व, रजस् और तमस्। इस भेद का अर्थ यही है कि इन शब्दों को एक से अधिक अर्थों में समझा जा सकता है। मंत्र के दूसरे भाग में कहा गया हैकि विद्वान लोग भी विश्वयुज्ञ की महिमा को देखकर यज्ञ को अपने जीवन के लिए नियम बनाते हैं। यह कर्तव्य वा धर्म है। धर्म का तत्व अपने आपको ईश्वर- परायण करना है; परमात्मा को हृदय सिंहासन पर विराजमान करना उसे वहां बांधना, स्थिर करना है। मंत्र के दूसरे भाग का अर्थ यो भी हो सकता है– देवों ने जिस यज्ञ का विस्तार किया उसने पुरुष को पशु रूप में बांध दिया। इस अर्थ में भी कर्तव्य की महिमा वर्णन की गई है। विश्व में जो भी यज्ञ विश्व की शक्तियों की ओर से हो रहा है,उस में मनुष्य का स्थान क्या है?उपनिषदों में कहा है कि मनुष्य देवताओं का पशु है। पशु को बोझ उठाना पड़ता है और काम करना पड़ता है, काम करना और बोझ उठाना तो हम सब के भाग्य में है। जैसा अन्य पशुओं के भाग्य में है विचार करने का प्रश्न तो यह है कि वह बोल किस प्रयोजन से उठाते हैं, और किसके आदेश में काम करते हैं? देवों के व असुरों के आदेश में आदर्श जीवन तो यही है कि हम देवों के पशु हो।देव कौन सा बोझ हमारे सर पर और कंधों पर रखते हैं? यह बोझ धर्म यज्ञ का कर्तव्य का बोझ है। पशु पक्षियों के लिए तो कर्तव्य अकर्तव्य का भेद है ही नहीं। आचार के जीवन में कोई छुट्टी का दिन नहीं। कोई ऐसा समय नहीं जिसमें हम मनुष्य कह सकें कि इस वक्त इस समय कर्तव्य धर्म के विचार को हम एक और रख देते हैं। हमें तो इस अनुसार रूपी यज्ञशाला में पशु बना कर कर्तव्य की रस्सी से बांध दिया गया है। यही मनुष्य की विशेषता है जो उसे अन्य पशुओं से इतना ऊंचा उठा देती है। सोलहवे और अंतिम मंत्र में इसी स्थान को और जोर से कहा गया है। देवताओं ने यज्ञ के द्वारा ही यज्ञ किया। त्याग या कुर्बानी तो हम मेंसे बहुतेरे करते हैं।जहां प्रत्येक स्वार्थ का ही ध्यान करें,वहां सामाजिक जीवन हो ही नहीं सकता।त्याग, सच्चा त्याग तभी होता है, जब यह त्याग के भाव से किया जाए। देवता का यज्ञ, यज्ञ के द्वारा यज्ञ को करना होता है,यज्ञोयज्ञेन कल्पन्ताम्। यह सनातन धर्म है,यह अच्छे जीवन का नियम है। यह जैसा अब सत्य है, वैसा ही सत्यपहले भी था। जैसे अब यज्ञ के भाव से यज्ञ करने वाले परम गति को प्राप्त करते हैं,वैसे ही इसे पूर्व होता रहा है।साध्य और देव इस गति को प्राप्त करते हैं। जिसकी प्राप्ति के लिए ज्ञान व प्रकाश और साधना व उपयोगी कर्म साधन है। इसी सत्य को प्रकट करने के लिए उपनिषद ने कहा है कि परमात्मा का दर्शन सांख्य और योग से होता है, और इस वर्णन के बाद मनुष्य सब बंधनों से मुक्त हो जाता है। हमें यज्ञ के द्वारा परमात्मा की उपासना को करते हुए सभी बंधनों से मुक्त होने का पुरुषार्थ करना चाहिए।

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