राम-राम करना ही काफी नहीं

जरूरी है राम काज करना

– डॉ. दीपक आचार्य

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आज मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव है। साल भर में इसी प्रकार भगवानों, युगपुरुषों और महान लोगों के जन्मदिन मनाकर हम उनके प्रति श्रद्धा भावों की इतिश्री कर लिया करते हैं। जिस किसी का दिन हो, हम सारे के सारे उस दिशा में भाग चलते हैं और उत्सवी आनंद में सराबोर होकर लौटते हैं लेकिन बात सिर्फ एक दिन तक सिमट कर रह जाती है और अगले दिन से फिर वही ढाक के पात तीन के तीन।

हम सब लोग जयंतियां, उत्सव और पर्व मनाकर अपने आपको परम धार्मिक, भक्त, सिद्ध और सदाचारी मानकर अहंकार के पोखरों में डूब जाते हैं। हमारे भीतर से श्रेष्ठ को अंगीकार करने, बुराइयों को छोड़ने और सदाचारों में रमे रहने का माद्दा ही नहीं रहा क्योंकि हमारे जीवन के सारे लक्ष्य उल्टी दिशा में फिरने लगे हैं।

हमारी दृष्टि अब सामने की तरफ नहीं होकर अपनी तरफ हो चुकी है जहाँ हम सभी जगह अपने आपको देखना और दिखाना चाहते हैंं। जो काम हमें समाज के लिए करने चाहिएं वे सारे काम हम खुद के लिए करने लग गए हैं।

बात रामायण काल की हो या महाभारतकाल की या फिर किसी और युग की। हमारे सामने हजारों दृष्टांत ऎसे हैं जो हमें यह अच्छी तरह सिखाते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। हमारे धर्म और संप्रदाय भी अच्छी राह पर चलने का संदेश युगों से दे रहे हैं, पर हम कहाँ मानने वाले हैं।

हम वे ही काम करते हैं जो हमारे काम के हों, बाकी सारे कामों के प्रति हमारी अरुचि हमेशा बनी ही रहती है। 17cormमर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का चरित बखानता श्रीरामचरितमानस कितना ही प्रेरक और जीवनचर्या को आनंदित बनाने वाला हो, हम कहाँ उन बातों पर अमल कर पा रहे हैं।

आज सभी स्थानों पर रामायण के पारायण होते हैं, राम नाम की अखण्ड धुन से भरे माईक ज्वालामुखी हो जाते हैं, भए प्रकट कृपाला, दीन दयाला … का उद्घोष करते हुए जाने कितने रागों में उच्च स्वर से हम आरती गाते हैं, और राम के नाम पर आज के दिन जाने कितने जतन करते हैं श्रीराम प्रभु को प्रसन्न करने के।

भगवान की प्रसन्नता को पाने के उतावलेपन में हम सब यह भूल जाते हैं कि भगवान कोई वीआईपी नहीं है जो कि चापलुसी भरे स्तुतिगान, राम-राम की गूंज और धर्म के नाम पर पाखण्डों, गोरखधंधों और हीन आडम्बरों से रीझ जाए।

ईश्वर सर्वज्ञ है, उसे सब कुछ पता है। राम को पाने के लिए राम-राम का जप करना सफलता देने वाला हो सकता है मगर आजकल सभी स्थानों पर स्थितियां मुँह में राम बगल में छुरी जैसी होती जा रही हैं। और यही कारण है कि हम मुँह से राम-राम करते रहते हैं और दिमाग में षड़यंत्रों के ताने-बाने बुनते रहते हैं, हमारे चित्त में दूषित भावों का अंकुरण होता रहता है और हमारी ज्ञानेन्दि्रयां तथा कर्मेन्दि्रयां  आसुरी भावों में रमण करती हुई वे सारे काम करती हैं जिनका राम से किसी भी प्रकार का कोई मेल नहीं है। राम का प्रत्येक कर्म समाजोन्मुखी था, और हमारा …..। हमें न समाज से मतलब है, न देश से।

अपने भीतर रावणत्व और आसुरी भावों को लेते हुए जो लोग राम के नाम पर पाखण्ड और आडम्बर करते हैं उनसे राम की प्रसन्नता की कल्पना कभी नहीं की जा सकती। ऎसे लोग सौ जन्मों में भी राम को नहीं पा सकते।

राम के नाम पर अपने आपको महान भक्त, संत और कथावाचक कोई भी कहला सकता है मगर राम के मार्ग पर चलने का माद्दा रखना अलग बात है। आज हम सारे वे काम कर रहे हैं जिनके विनाश के लिए राम का अवतार हुआ था। धरती पर से पापों का बोझ हरने, असुरों से ऋषियों और सज्जनों को बचाने और अत्याचारों तथा आततायियों के उन्मूलन के लिए भगवानश्रीराम का जन्म हुआ था।

उन्होंने अपने पूरे जीवन में मर्यादाओं का पालन करते हुए राम राज्य स्थापित किया जिसे आज भी याद किया जाता है। उन्हीं राम के नाम पर धींगामस्ती करते हुए सिर्फ राम नाम की रट लगाना और राम जन्मोत्सव के नाम पर विभिन्न कार्यक्रमों और उत्सवों का आयोजन करना ही काफी नहीं है।

श्रीराम को पाने के लिए यह जरूरी है कि उन कामों को करने में प्राण-प्रण से जुटें जिनके लिए भगवान श्री विष्णु ने रामावतार लिया था। कुछ लोगों को छोड़ दिया जाए तो आज हममें से काफी संख्या में लोग उन कामों को करने में रमे हुए हैं राम को पसंद नहीं हैं। ऎसे में राम-राम करते रहना और राम के नाम पर होने वाले आयोजनों में स्वार्थ सिद्धि का नज़रिया रखना अपने आप में वो अपराध है जिसे न समाज माफ कर सकता है, न राम।

आज हम जो कुछ कर रहे हैं, कह रहे हैं, उसके बारे में किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है मगर इतना तो तय है कि हम जो कुछ कर रहे हैं वह राम के मार्ग का न होकर आसुरी मार्ग का पता देता है और ऎसे में राम को पाने के लिए किए जा रहे सारे जतन औपचारिकताओं और आडम्बरों से ज्यादा कुछ नहीं है।

ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है, जो लोग राम के नाम पर आज धींगामस्ती और शोरशराबा कर रहे हैं उन्हीं चेहरों की असलियत जानने की कोशिश कर लें तो साफ पता चल जाएगा कि इनके जीवन में कितने प्रतिशत रामत्व बचा हुआ है और इनके धंधे क्या हैं।

राम की कृपा पाने के लिए रामत्व जरूरी है, उन कामों में भागीदारी जरूरी है जो समाज और देश को आगे बढ़ाने वाले हैं, उन असुरों का स्तुतिगान, परिक्रमा और जयगान छोड़ना जरूरी है जो समाज से रामत्व की जड़ें खोद रहे हैं।

समाज में जहाँ-तहाँ बैठे हुए कालनेमियों से मुक्ति पाए बगैर रामत्व की कल्पना व्यर्थ है। हम सभी आज के दिन यह प्रण लें कि राम-राम की रटन्त विद्या से ऊपर उठकर राम-काज में जीवन समर्पित करें, तभी राम राज्य की कल्पना साकार हो सकती है।

श्रीरामनवमी की हार्दिक मंगलकामनाएँ ….

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