भारत सहित पश्चिमी एशिया के इतिहास में गहरी जालसाजी की गई है अंग्रेजों द्वारा

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पश्चिम एसिया और भारत-भारतीय इतिहास में अंग्रेजों द्वारा इतनी भयानक जालसाजी हुयी है कि कोई भी वर्णन पश्चिम या मध्य एसिया के इतिहास से नहीं मिलता है और पूर्व भाग के बारे में बिलकुल ही भूल गये। राजतरंगिणी के अनुसार गोनन्द वंश का ६२वां राजा हिरण्यकुल था जिसने लौकिकाब्द २२५२-२३१२ अर्थात् ८२४-७६४ ई.पू. तक शासन किया। उसका पुत्र वसुकुल (७६४-७०४) तथा मिहिरकुल (७०४-६३४) ई.पू. था। उसके पूर्व इसी गोनन्द वंश का ५१वां शासक हुष्क था जिसके पुत्रों जुष्क और कनिष्क ने १२९४-१२३४ ई.पू. तक शासन किया। कनिष्क को उज्जैन के परमारवंशी राजा विक्रमादित्य (८२ ई.पू. -१९ ई) के पौत्र शालिवाहन (७८-१२८ ई.) के शक से जोड़ कर परमार वंश का नाम उड़ा दिया। यदि यह जालसाजी सही है तो सम्पूर्ण बाइबिल और इसाई इतिहास झूठा हो जायेगा। प्रायः ४ ई.पू. में विक्रमादित्य राज्य के मगध से २ ज्योतिषी गये थे जिन्होंने ईसा को महापुरुष बताया था। उस समय विक्रमादित्य और इजरायल के रोमन राज्य के बीच कोई अन्य राज्य नहीं था। शूली पर बेहोश हो कर उतरने के बाद ईसा मसीह कश्मीर आये जिनका निवास हजरत बल (बहाल = रहना) कहा जाता है। यह शालिवाहन राज्य में हुआ। इसाई मान्यता के अनुसार ईसा के शिष्य थोमस ८२ ई. में मद्रास (चेन्नई) आये थे (शालिवाहन शक के ४ वर्ष बाद)। अतः उस समय भारत आश्रय स्थल था, आक्रमण का शिकार नहीं था।

उससे पूर्व असीरिया का उदय नबोनासर काल में होने पर भारत पर पहला आक्रमण ८२४ ई.पू. में हुआ जिसका प्रतिरोध खारावेल की गज सेना ने मथुरा में किया (खारावेल प्रशस्ति, शासन के ४ वर्ष बाद नन्द शक १६३४ ई.पू. का ८०३ वर्ष, राज्य के ११ वर्ष पर मथुरा में शकों की पराजय)। यह विफल होने पर रानी सेमिरामी (ग्रीक नाम) ने सभी पड़्सी राज्यों की सहायता से ३५ लाख की सेना इकट्ठी की तथा ऊंटों को खोल पहना कर १०,००० नकली हाथी तैयार किये (होमर के ट्राय या भास के स्वप्नवासवदत्ता की तरह)। यह असुरों का सबसे बड़ा आक्रमण था जिसके प्रतिरोध के लिये विष्णु अवतार बुद्ध मगध में अजिन ब्राह्मण के पुत्र रूप में उत्पन्न हुये। सिद्धार्थ बुद्ध (१८८७-१८०७ ई.पू.) ने मगध राजाओं से दोस्ती कर केवल सारनाथ-गया के बीच के लोगों को मोहित किया था, असुरों को नहीं। उसके बाद गौतम बुद्ध (५वी सदी ई.पू.) ने वैदिक मार्ग नष्ट करने के लिये उत्तर प्रदेश में प्रयत्न किये। इन दोनों ने केवल वेद का विरोध किया असुरों का नहीं।
विष्णु बुद्ध ने ७५६ ई.पू. में आबू पर्वत पर ४ राजाओं का संघ राजा शूद्रक की अध्यक्षता में किया। इस समय शूद्रक शक आरम्भ हुआ (यल्ल का ज्योतिष दर्पण)। शूद्रक का नाम इन्द्राणीगुप्त (मृच्छकटिकम्) था, ब्राह्मण होने पर भी ४ राजाओं का प्रधान सेवक (जैसे आज प्रधान मन्त्री अपने को कहते हैं) होने के कारण उनको सम्मान के लिये शूद्र कहा गया। ४ जो भारत रक्षा में अग्रणी होने के कारण अग्निवंशी कहे गये-परमार प्रतिहार, चाहमान और शुक्ल (चालुक्य)। इन सबकी वंश परम्परा ७५६ ई.पू. से आरम्भ होती है पर कर्नल टाड ने उन सभी को हूण वंशी सिद्ध करने के लिये उनका काल ७३० ई.पू कर पुराना सभी अन्धकार युग कर दिया। इसके लिये उसको राणा कुम्भा का ताम्र-पट्ट तोड़ना पड़ा जिसमें उन्होंने अपने को ब्राह्मण बप्पा रावल का वंशज कहा था जो गोरखनाथ के आदेश से राजा बने थे। यही उनके द्वारा गीतगोविन्द व्याख्या की भूमिका में भी है। स्वयं गोरखनाथ को भी लुप्त कर यह शंकराचार्य का काल कर दिया जो अंग्रेजों के अनुसार मुस्लिम आक्रमण होने पर बौद्धों का विरोध कर रहे थे। सबसे बड़े असुर आक्रमण (७५६ ई.पू. सेमिरामी की ३५ लाख सेना + घुड़सवार+नकली हाथी प्रायः ४ लाख) को इसी संघ ने पराजित किया। सभी पाश्चात्य इतिहास इसका वर्णन करते हैं पर भारत में इसके २०० वष बाद से राज्य व्यवस्था कही जाती है। ६१२ ई.पू. में दिल्ली के चाहमान राजा ने असुर (असीरिया) राजधानी निनेवे को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया जिसका बाइबिल में ५ स्थानों पर वर्णन है। इस समय चाहमान शक आरम्भ हुआ जिसका प्रयोग वराहमिहिर तथा ब्रह्मगुप्त (बृहत् संहित १३/३) ने किया है। इसके बाद ४५६ ई.पू. में शक आक्रमण हुये जिनका प्रतिरोध मालवा के राजा श्रीहर्ष ने कर मालव गण समाप्त कर दिया (राजतरंगिणी, कथा सरित् सागर, अलबिरुनि आदि)। श्रीहर्ष शासन समाप्त होने पर आन्ध्र वंशी राजाओं के सेनापति घटोत्कच (मेगास्थनीज आदि ग्रीक लेखकों द्वारा इसका अनुवाद नाई किया है) ने उसे समाप्त कर अपने पुत्र चन्द्रगुप्त-१ को राजा बनाया। इस समय सिकन्दर का आक्रमण हुआ था और उसके लेखकों ने आन्ध्र राजाओं की सेना का तथा चन्द्रगुप्त समुद्रगुप्त का वर्णन किया है। उसके बाद सेल्यूकस आक्रमण का समुद्रगुप्त के इलाहाबाद स्तम्भ लेख में वर्णन है। उसके पुत्र चन्द्रगुप्त-२ ने उसे पराजित कर उसकी पुत्री से विवाह किया जिसका विस्तृत वर्णन देवी-चन्द्रगुप्तम् नाटक तथा उसके आधार पर जयशंकर प्रसाद के ध्रुवस्वामिनी नाटक (१९३० ई.) में है। गुप्त काल समाप्त होने पर ८२ ई.पू. में उज्जैन के परमार राजा विक्रमादित्य का साम्राज्य बना जिस काल में ईसा मसीह का जन्म, सीजर की पराजय, बन्दी बनना और इस कारण ब्रूटस द्वारा उसकी हत्या तथा ४६ ई,पू. मे विक्रम वर्ष १० के पौष मास से मिलाने के लिये जूलियन वर्ष ७ दिन बाद आरम्भ हुआ। उनके पौत्र शालिवाहन काल में ईसा तथा उनके शिष्यों ने भारत में शरण लिया। गणना के लिये शालिवाहन शक तथा पर्व के लिये विक्रम सम्वत् आज भी चल रहे हैं। शक सम्वत्सर का अर्थ नहीं समझने वालों द्वारा बनाया गया राष्ट्रीय-शक-सम्वत् न तो राष्ट्रीय है, न शक है, न सम्वत् है। विक्रमादित्य राज्य के बाद कुछ समय विप्लव स्थिति थी जब (१९-३० ई.) में तातार, तुर्क, हूण और चीनी लोगों ने आक्रमण किये जिनका तिब्बत तथा चीन इतिहास में भी उल्लेख है। इस समय गुप्तवंश की एक शाखा ने गुजरात के वलभी में राज्य स्थापित किया, जिसके नष्ट होने पर ३१९ ई. में वलभी भङ्ग शक आरम्भ हुआ (अलबिरुनि)। प्रायः इसी समय अंग्रेजों ने मूल गुप्त राज्य का आरम्भ कर दिया है।
जिस समय हूण शकों का आक्रमण कहा जाता है उस समय उत्तर भारत में हर्षवर्धन तथा अग्निवंशी राजाओं का शासन था। हुएनसांग या फाहियान ने इस काल में किसी शक आक्रमण का नाम नही सुना था जो मध्य एसिया रास्ते से ही आये थे।
✍🏻अरुण उपाध्याय

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