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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

प्रगति और दुर्गति से जूझता लोकतंत्र

भारत की जनसंख्या चीन के पश्चात विश्व में सर्वाधिक है। यह देश विभिन्न संप्रदायों, जातियों वर्गों और समुदायों में बंटा हुआ है। इसलिए बहुत सारी सामाजिक विसंगतियां भी हमारे यहां बनी हुई हैं। इन सामाजिक विसंगतियों की देश में इतनी भरमार है कि कभी कभी तो इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि ये देश चल कैसे रहा है? स्पष्ट है कि इतनी सारी सामाजिक विसंगतियों के निवारण और निराकरण के लिए हमें एक निरंतर और सतत कार्यरत सक्रिय संसद की आवश्यकता है, जिसमें नित्य कार्य हो और ऐसी व्यवस्था बनायी जाये कि कार्य भी देश की समस्याओं के हल को खोजने के लिए शांतिपूर्वक होना चाहिए। अब जबकि देश में 16वीं लोकसभा के चुनाव हो रहे हैं तो यह बात और भी विचारणीय हो गयी है कि हम देश के लिए अपने कैसे जनप्रतिनिधि का चयन कर रहे हैं? पिछले 67 वर्षों में हमने निष्क्रिय अयोग्य और दादागीरी दिखाने वाले लोगों को जिस प्रकार संसद तक पहुंचाया है उससे देश के इस सर्वोच्च पंचायत घर की गरिमा गिरी है। व्यक्ति पूजा में सिद्घ हस्त लोगों ने लोकसभा में जाकर भी वही कहना और करना आरंभ कर दिया जो उनका नेता उनसे कहलवाना या करवाना चाहता है। इसलिए सपा, बसपा जैसी राजनीतिक पार्टियां केवल ‘प्राइवेट लि. कंपनी’ से आगे कुछ नही कर पायी हैं। देश के राजनीतिक परिदृश्य पर विभिन्न विचारधाराओं की उपस्थिति लोकतंत्र में अनिवार्य होती है। पर उनकी अनिवार्यता का अभिप्राय यह कदापि नही कि वे संसद में एक दूसरे के प्रति अपने बाहुबल के प्रदर्शन के लिए जायेंगी, अपितु इसका अभिप्राय है कि वे अपने-अपने ज्ञानबल और अनुभव बल से देश की समस्याओं के समाधान की दिशा में सामूहिक प्रयास करेंगी। इसका अभिप्राय है कि देश की विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के सोचने का ढंग अलग हो सकता है, पर लक्ष्य सबका एक ही होगा-राष्ट्रहित की साधना। पर हम लोकसभा को जब ‘कुश्ती का अखाड़ा’ बना हुआ देखते हैं और विभिन्न राजनीतिक दलों के महारथियों को परस्पर गुत्थम-गुत्था होते देखते हैं तो सचमुच बड़ा दुख होता है। देश की समस्याओं के समाधान के लिए कार्य दिवसों का सदुपयोग न करके संसद का अधिकांश समय परस्पर की ‘तू-तू, मैं-मैं’ में ही व्यतीत हो जाता है। रचनात्मक कार्यों के लिए प्रयास या तो किये ही नही जाते और यदि किये भी जाते हैं तो उन पर सहयोग नही किया जाता। इस स्थिति को देखकर नही लगता कि हम स्वस्थ लोकतंत्र में सांस ले रहे हैं और देश को स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था देने में भी सफल रहे हैं। अंग्रेजों के काल में तत्कालीन ‘नेशनल-असैंबली’ की सन 1931 के वर्ष में कुल 83 और सन 1933 के वर्ष में 109 बैठकें हुई थीं। जिनमें क्रमश: 394 और 510 घंटे ‘नेशनल-असैंबली’ ने अपना विधायी कार्य निपटाया। सन 1952 में जब पहली लोकसभा का गठन हुआ तो वर्ष में 123 बैठकों में 880 घंटे विधायी कार्य हुआ। सन 1955 के वर्ष में लोकसभा ने 139 बैठकें कीं और अब तक के सर्वाधिक 1026 घंटे काम किया। बीच में यह स्थिति कुल मिलाकर संतोषजनक रही। परंतु सन 1989 में हमारी लोकसभा ने सन 1931 के वर्ष के बराबर की कुल 83 बैठकें कीं जिनमें 564 घंटे विधायी कार्य हुआ। इसके पश्चात इन बैठकों में निरंतर ठहराव या पतन होता गया। सन 1989 के पश्चात अभी तक हमने किसी भी वर्ष में सौ से अधिक बैठकें नही की हैं। जबकि सन 1955 की अपेक्षा हमारी जनसंख्या और जनसमस्याओं में लगभग चार गुणा वृद्घि हुई है। इस दृष्टि से हमारी लोकसभा की वार्षिक बैठकें लगभग प्रतिदिन होनी चाहिए थीं। इंदिरा गांधी के काल में सांसदों को केवल एक बात सिखायी गयी कि तुम्हें केवल ‘इंदिरा इज इण्डिया’ और इंडिया ‘इज इंदिरा’ बोलना है। इसी बात के लिए तुम देश के खजाने को लूटते रहो और मौज करते रहो, जब आवश्यकता हो, तब आकर किसी विधेयक पर सरकार के समर्थन में हाथ उठा देना या शोर मचा देना, बस इससे आगे तुम्हें कुछ नही करना। धीरे-धीरे कांग्रेस की नेता की इसी सोच को देश के लगभग सभी दलों ने अपना लिया। फलस्वरूप लोकसभा अनुभवी और ज्ञानवृद्घ लोगों का एक उत्कृष्ट संगम न होकर पारस्परिक संघर्ष को बढ़ावा देने वाले लोगों का जमावड़ा होकर रह गयी। यही कारण रहा कि सांसदों ने अपनी सांसद निधि से अपने प्रिय ठेकेदारों को काम दे-देकर उनसे कमाने का उद्योग स्थापित करने को प्राथमिकता दी। बहुत से सांसद इसी धंधे में लगे हुए हैं, और इसी धंधे को जमाने के लिए बहुत से लोग सांसद बनना चाहते हैं। यह प्रवृत्ति भी देखने को मिल रही है कि लोग अपने ‘बड़े व्यापार’ को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त कराने के लिए सांसद बन जाना चाहते हैं, जिससे कि उनके माल वाहक ट्रकों को कोई अनावश्यक रोके-टोके नही। इस प्रकार ‘लोकतंत्र का व्यापारीकरण’ कर दिया गया है। फिर भी हम अपने लोकतंत्र को विश्व का सबसे उत्तम लोकतंत्र कहे जा रहे हैं। पता नही क्यों? चिंतन के लिए कुछ और भी बिन्दु हैं। जैसे कि हमारे देश के सांसदों (लोकसभा के सदस्यों) की कुल संख्या इस समय 543 है। जिससे देश के कुल मतदाताओं की संख्या के अनुसार लगभग सोलह लाख मतदाताओं पर एक सांसद बनता है। सोलह लाख की आबादी की कितनी समस्याएं होंगी यदि उन पर विचार किया जाए तो सोलह लाख पर एक सांसद का यह अनुपात नितांत अनुचित है। विशेषत: तब जबकि चीन में लगभग साढ़े चार लाख मतदाताओं पर एक सांसद के होने का आंकड़ा हमारे पास उपलब्ध हो। इस दृष्टि से तो हमारे वर्तमान सांसदों की संख्या 543 से बढ़ाकर चार गुणा अर्थात लगभग बाईस सौ करनी होगी। आज हमारे सांसद केवल उद्घाटन कराने के लिए नियुक्त किये गये सरकारी व्यक्ति या जनप्रतिनिधि से बढ़कर कुछ नही हैं। वह फीता काटने और वहां उपस्थित लोगों को संबोधित करने के लिए तो खुश रहते हैं, परंतु अपने निवास स्थान पर मिलने में खुश नही रहते। कारण कि यदि सोलह लाख की आबादी में से 1600 लोग भी उनसे प्रतिदिन मिलने पहुंच जायें तो व्यक्ति इतने लोगों की समस्याओं को अलग-अलग नही सुन सकता। हर व्यक्ति का दिमाग 100-50 लोगों की जनसमस्याओं को अलग अलग सुनने पर ही झल्ला जाता है। तब इतने अधिक लोगों को कोई अकेला व्यक्ति कैसे झेलेगा? ऐसी परिस्थिति में हमारे जनप्रतिनिधि लोगों से मिलने से बचते हैं या उनकी समस्याओं के समाधान अपने अलग-अलग क्षेत्रीय प्रतिनिधि बनाकर उनके माध्यम से कराते हैं। इससे उन प्रतिनिधियों के माध्यम से सांसदों पर काम का बोझ तो हल्का हो जाता है परंतु ये क्षेत्रीय प्रतिनिधि उन लोगों से कार्य के बदले ‘सुविधा शुल्क’ लेने की दुकान खोलकर बैठ जाते हैं, जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। हमारे लोकसभाई क्षेत्रों के परिसीमन का काम सन 2026 तक नही हो पाएगा। संसद ने यह अवधि निश्चित कर दी है और सन 2031 की जनगणना के पश्चात ही अब यह परिसीमन का कार्य हो पाएगा। तब तक हम इसी व्यवस्था में जीने के लिए बांध दिये गये हैं। हम चुनाव सुधारों की ओर लगता है कि देखना भी पसंद नही करते हैं। जबकि देश में चुनाव सुधारों तथा व्यवस्था में व्याप्त त्रुटियों के सुधार की व्यापक संभावनाएं हैं। हम विचार करें कि हमारी पहली लोकसभा ने अपने गठन की तिथि सत्रह अप्रैल सन 1952 के पश्चात तेरह मई सन 1952 को हुई अपनी पहली बैठक से लेकर चार अप्रैल सन 1957 तक (भंग होने तक) कुछ 677 बैठकें कीं और 3784 घंटे विधायी कार्य किया। 14वीं लोकसभा ने इतने ही काल में 1736 घंटे और पचपन मिनट कार्य करते हुए कुल 332 बैठकें कीं। निश्चित रूप से चौदहवीं लोकसभा का यह आंकड़ा निराशाजनक है जो कि संसद के प्रति हमारे जनप्रतिनिधियों की उदासीनता को प्रकट करता है। तेरहवीं लोकसभा के नेता अटल जी थे, जो आजीवन संसद की गरिमा के प्रति निष्ठावान रहे, परंतु उनके काल में भी लोकसभा ने 1945 घंटे और उनतालीस मिनट ही कार्य किया, जो पहली लोकसभा से काफी कम
Untitled-1-copy है। इसका कारण केवल ये है कि जहां पहली लोकसभा में तपे तपाये अधिकतर राजर्षि लोग संसद में जाकर देश की समस्याओं के समाधान के लिए प्रति पूर्ण समर्पण रखते थे, वहीं तेरहवीं या चौदहवीं लोकसभा में ‘राजनीति के व्यापारीकरण’ की प्रक्रिया के प्रति समर्पित लोगों का वर्चस्व समाप्त हो गया। सन 1952 से लेकर 13वीं लोकसभा तक हमसे एक ‘महत्वपूर्ण संस्कार’ कहीं विलुप्त हो गया और हम भांग पीकर कहे जा रहे हैं कि हमारा लोकतंत्र निरंतर प्रगति कर रहा है। यदि लोकतंत्र प्रगति कर रहा है-तो देश में दुर्गति क्यों बढ़ रही है? क्या सोलहवीं लोकसभा भी इस प्रश्न का उत्तर खोज पाएगी? आज के परिप्रेक्ष्य में इस प्रश्न का उत्तर खोजना आवश्यक है, अन्यथा हमारा लोकतंत्र प्रगति और दुर्गति के इस दुश्चक्र से जूझते-जूझते ही दम तोड़ जाएगा और हम यह भी नही खोज पाएंगे कि ऐसा क्यों हो गया?

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