विध्वंस का विकास हुआ तो सृजन उत्पन्न हुआ-(भाग-दो)

31_08_2012-31economygrowthराम सिंह यादव
गतांक से आगे…………..
आज की गई भूल या अनदेखी उस वक़्त काल नजर आ रही होगी। वर्तमान की एक छोटी गलती विश्व को किस मोड़ पर खड़ा करेगी उसका अंदाज़ लगाना कठिन है जिस प्रकार सिर्फ दो लोगों की क्षुद्र सत्ता भूख ने भारत और पाकिस्तान का विभाजन कराया और आज दोनों देशों को 250 से ज्यादा परमाणु बम दे दिये। आखिर कौन सी दूरदृष्टि थी इनकी, जिसने उनके ही डेढ़ अरब वंशजों को नष्ट करने की राह पर ला खड़ा किया? इसी प्रकार उत्तर कोरिया-दक्षिण कोरिया, फिलिस्तीन-इजऱाइल, इराक़-ईरान, चीन-जापान, अमेरिका-रूस, सीरिया, लीबिया, अफगानिस्तान, विएतनाम, यूक्रेन, केन्या, नाइजीरिया इत्यादि किस संतुष्टि के लिए उलझते हैं? वो किससे लडऩा चाहते हैं? वो किसको तबाह करना चाहते हैं? इसका अंजाम क्या होगा?
चाहे पारिस्थितिक असंतुलन हो, धर्मांधता हो, सत्ता संघर्ष हो, सीमाओं में बंधते देश हों या परमाणवीय विनाश का सृष्टि के ऊपर मँडराता खतरा हो. मानव अपने लोभ की वेदी पर विलुप्त होने की कगार पर है।
पृथ्वी का कुछ नहीं बिगड़ेगा वो अपनी संरचना में परिवर्तन कर लेगी, ऊर्जा फिर से बटेगी जीव में, जीवन का फिर से विकास होगा परंतु सृष्टि का सबसे उत्कृष्ट जीव – मानव समाप्त हो जाएगा। लेकिन शायद मानव अभी भी बच सकता है। ऊर्जा के दो पहलू होते हैं सकारात्मक और नकारात्मक. उसी प्रकार मानव मन में भी सदैव द्वंद चलता रहता है. एक तरफ प्रेम, सौहार्द, वात्सल्य, बंधुत्व, सामाजिकता और नैतिकता का भाव है तो दूसरी तरफ अनीति,कठोरता, घृणा, प्रतिकार, संकीर्णता, निर्दयी क्रूरता का विम्ब है। सभी जीव दोनों पक्षों के वाहक हैं लेकिन सिर्फ मानव ही इन दोनों मे भेद कर सकता है और शांत भाव से आने वाले भविष्य के लिये क्या उचित है उसका विश्लेषण कर सकता है। सम्पूर्ण मानवता दांव पर लगी हुई है और शायद ही ऐसा कोई मानव होगा जो अपनी पीढिय़ों के प्रति चिंतित न हो? कट्टर से कट्टर व्यक्ति का भी कलेजा रो पड़ता है अगर अनजाने से भी किसी अबोध बालक का खून से सना शव देख ले। अनैतिकता व घृणा सिर्फ दूसरों के सामने स्वयं की उत्कृष्टता को साबित करने का मात्र दिखावा होती है जबकि वो कठोर व्यक्ति भी एकांत में प्रेम और वात्सल्य की मूर्ति होता है।
हे मानव अपनी ऊर्जाओं को पहचान। अपने जन्म के प्रयोजन की खोज कर लेकिन भौतिकता से सृष्टि का विनाश मत कर। जीवन जीने की न्यून आवश्यकताएँ और सृष्टि द्वारा उनकी आपूर्ति को समझ। बहुत संभव है की अधिकतर लोग इस लेख को विकासविरोधी समझेंगे परंतु इस संदर्भ मे उनसे सिर्फ एक ही सवाल है की सांस लेने योग्य वायु न हो, सूखे कंठ को पानी न हो और तुम्हारी संतान तुम्हारा कपड़ा पकड़कर भूख से बिलख रही हो. उस वक़्त तुम किस विकास के पक्षधर होंगे? याद रखो केदारनाथ त्रासदी में आदमी लाखों रुपयों में एक-एक पानी की बोतल खरीद रहा था. फिलीपींस का हैयान तूफान, ब्रिटेन की प्रलयंकारी बाढ़, जापान की सुनामी और अमेरिका का पोलर वोर्टेक्स अथवा शीत चक्रवात के रूप मे टनों बर्फ विकास नहीं विनाश की आहट है।
मानव को अपने जीवन को बचाने के लिए स्वयं के संकल्प और क्रियान्वयन की आवश्यकता है न की किसी राजनीतिक इच्छाशक्ति या बाह्य सहायता का इंतजार। राजनीति तथा व्यवसाय सिर्फ दंभ व स्वार्थ की प्रतिपूर्ति करते हैं। स्वविनाश के लक्ष्य की ओर उन्मुख राजनीतिज्ञों, वेद में इंद्र को पुरंदर कहा गया है जो मानसृजित इमारतों, बांधों को नष्ट करता था, जो वणिकों के व्यवसाय का विरोधी था तथा जंगलों में आत्मविद्या की साधना करने वाले साधुओं की रक्षा करता था, जो वास्तव में प्रकृति संरक्षक था। ये था हमारा भारत जिसे जंगलों और प्रकृति के सान्निध्य में असंख्य साधुओं-सन्यासियों द्वारा अनवरत खोज करके लिखा गया है. अत्यधिक नूतन विज्ञान चिरकाल से भारत के जंगलों में पोषण पाता रहा है।
झूठे विकास की तरफ मत भटको, अपने भारत को बचा लो। कुछ कठोर और असहज समाधान हैं जिन्हें करना शायद आपके वश में न होगा परंतु मृत्यु की हकीकत का सामना, बच्चों और ईष्ट जनों का करूण चेहरा आपकी प्रेरणा बनेगा।
सबसे पहले ज़मीनों की खरीद फरोख्त का व्यवसाय एकदम बंद करें तथा अल्प जरूरत के मुताबिक ही जमीन में कंक्रीट बिछायेँ।
हर घर में छोटी बगिया बनाएं जिसमे लौकी, कद्दू जैसी बेल वाली सब्जियां या फिर भिंडी इत्यादि जरूरत भर की सब्जियाँ उगा सकें।
घरों को जमीन से 1-2 फुट ऊंचाई पर बनाएँ तथा उसके नीचे साफ पानी (वर्षा जल) जमा करने का उपाय करें। नालियों व नालों में बालू, मौरंग और बजरी की परत डालें जिसके घर्षण से पानी साफ होता रहे तथा सिल्ट की समस्या से बचने के साथ ही जमीन पानी भी सोखती रह सके, नालियां ऊध्र्व एल/बंध आकार की बनाएँ जो पानी को देर तक जमीन पर रोक सकें।
घरों में भी कीटनाशकों का प्रयोग कम कर दें और यदि करें भी तो उसका प्रवाह कम करें। साबुन, लोशनों, डिटर्जेंट का इस्तेमाल कम करें, इनसे मिश्रित पानी नालियों, तालाबों, नदियों व सतही पानी को बर्बाद कर देता है और उसमे मौजूद जैविक श्रंखला की मृत्यु का कारण बनता है. यह पानी किसी के उपयोग के लायक नहीं रह जाता, इससे बदबू,जहरीलापन, मच्छरों और महामारियों का जन्म होता है। नदियों में किसी भी प्रकार का कचड़ा या मूर्तियों का विसर्जन न करें, यह अवैज्ञानिक है और न ही वेदों मे वर्णित है।
तालाबों को पुनर्जीवित करें, उनका अतिक्रमण न करें और न ही कचरा डालने का साधन समझें। इनका हमारे जीवन व कृषि में अप्रतिम योगदान है, जिसकी वास्तविकता समझें. जमीन के नीचे का पानी जहरीले खनिजों व लवणों से युक्त होता है इसीलिए सृष्टि ने इस पानी को मानव की पहुँच से दूर रखा था, पीने योग्य पानी सतत बहता हुआ और ऊपरी परत का ही होता है. गुरुत्वाकर्षण द्वारा खीचें गए खनिजों से भरा जमीन का भीतरी पानी कैंसर, पथरी, हेपाटाइटिस जैसी जानलेवा बीमारियों का जनक है। हम लोगों द्वारा सतह का पानी बर्बाद किया जा चुका है लेकिन यह हम सबके सघन प्रयास से मात्र 2-5 साल की बारिश से फिर से प्राप्त किया जा सकता है।
तालाबों व नदियों के किनारे वनों व छोटे पौधों को रोपित करें तथा वहाँ से निर्माणों को हटाएँ, लगभग 50-100 घरों के आस पास एक तालाब होना नितांत आवश्यक है। अपनी नदियों तथा तालाबों को स्वच्छ करें।
जमीन का अतिक्रमण रोकें, खाली पड़ी फैक्ट्रियों और उनकी ज़मीनों का नयी फैक्ट्रियों तथा आवासों के लिए उपयोग किया जाये।
शहरों में मकानों को आवंटित किया जाये न की बेचा जाये जिससे अमूल्य भूमि का खेती व स्वनिर्भरता के लिए सदुपयोग हो सके साथ ही साथ पैतृक मकान के साथ पीढिय़ों का जुड़ाव रह सके।
शहरों में न तो सड़कों की कमी है और न ही आदमियों की अनियंत्रित भीड़, बल्कि कारों, बाइकों व ट्रकों का जाम है, इनके ऋण की व्यवस्था को सीमित किया जाये तथा उपयोग को हतोत्साहित किया जाये।
पब्लिक ट्रांसपोर्ट को सरकार बढ़ावा दे, साइक्लिंग, कार पूलिंग, टैंपो, बसों का उपयोग गौण न समझें बल्कि भविष्य के लिये ऊर्जा का संरक्षण करें।
प्लास्टिक, काँच, पेपर, तथा आर्गेनिक कचरों को घरों से ही अलग अलग करके उचित निस्तारण करें, अन्न का उपयोग सीमित व जरूरत के आधार पर करें उसका एक दाना भी बर्बाद न करें। जाने कितने भूखे पेट उस दाने का इंतज़ार कर रहे हैं।
पारिस्थितिक तंत्र के अनुसार नैसर्गिक पौधों व वृक्षों को बढ़ावा दें. सजावटी, प्रसंस्कृत पेड़ पौधे जैव विविधता प्रभावित करते हैं और जलवायु व सामाजिक विकृति लाते हैं।
परमाणु बमों व सृष्टि को नष्ट करने वाले पदार्थों के घटकों का अध्ययन कर उनको उन्हीं जगहों पर नष्ट किया जाये जहां से उन्हे निकाला गया था। सृष्टि के अपने तंत्र में इनका निस्तारण करने की प्रक्रिया वहीं मौजूद होती है जहां वो यौगिक पाये जाते हैं।
ऊर्जा व अन्य साधनों का सीमित प्रयोग करें तथा धीरे धीरे उनपर निर्भरता कम करें, जिससे आने वाले समय में जब इनकी कमी हो जाये तब भी हम जीवित रह सकें।
अतिवादी संस्कृति की पराकाष्ठा मे निहित विनाश का अपने हर कदम पर चिंतन करें, अपने मस्तिष्क के सकारात्मक पहलू को उजागर करें।
पश्चिमी विकास के पक्षधर मेरे दोस्तों जरा विश्लेषण करो उस दशा की जब सीमित ऊर्जा का स्त्रोत खत्म हो जाएगा तब ऊर्जा के अभाव में न बिजली होगी और न ट्रांसपोर्ट के साधन काम कर रहे होंगे उस वक़्त गहरी जमीन में दबा पानी कैसे निकालोगे, नदियों-तालाबों – झीलों का वैसे भी नामोनिशान मिटा चुके होगे, पेट भरने के लिए पौधे, सब्जियाँ या घास पत्ते कहाँ से पाओगे अपनी कंक्रीट या बंजर हो चुकी जमीन पर? भूख और प्यास से तड़पते वक़्त न तुम्हें नैतिकता का ख्याल रहेगा और न समाज का डर लगेगा। राष्ट्र,अनुशासन, राजनीति, प्रांत, धर्म, भाषा, शिक्षा, प्रवचन, संस्कार, वर्ण, सिद्धान्त, पैसा, बिल्डिंगें, पुल, विकास जैसे असंख्य शब्दों का अस्तित्व खत्म हो जाता है पेट के आगे। महंगाई अपने चरम पर होगी और भूखा मानव हर अपराध करने पर विवश होगा क्यों की भूख से अपराध का सीधा रिश्ता है।
हे महामानवों स्वार्थ, वैमनस्य, विकास में छुपे विनाश और वर्तमान की राजनीति मत करो, बल्कि भविष्य की राजनीति करो।
याद करो तुम भारत के जंगलों से निकले हुए वो मानव हो जिन्हें इस ब्रह्मांड की सबसे सरल जलवायु व जीवन मिला है। लौट आओ अपने जंगलों की ओर, और फिर से नष्ट होती प्रकृति तथा मानव संतति को उज्जवल भविष्य दो। तुम संसार के अग्रज हो जहां माँ का सम्मान था, जहां नारी पुरुष का आधार थी, जहां सीताराम, राधेश्याम या गौरीशंकर जैसे शब्दों का अस्तित्व था। जहां विश्व की सबसे उन्नत चिकित्सा व्यवस्था थी। जहां आर्यभट्ट जैसे मानव ने हजारों साल पहले ही पृथ्वी की गोलाई, नक्षत्रों, सूर्य की दूरी, सौर मण्डल,पाई इत्यादि जान लिए थे। जहां स्त्री स्वयंवर मे खुद वर चुनती थी। जहां स्त्री पीढिय़ों की शिक्षक व अभिभावक थी। मातृ और वात्सल्य प्रधान भारत आज गर्त की ओर अग्रसर है क्योंकि वो उन भौतिकवादियों और अत्यंत पिछड़े विश्व का अनुसरण कर रहा है जिनका अनुसंधान, जिनकी रूढिय़ाँ, जिनका विज्ञान, जिनकी सभ्यता हम जंगलियों से हजारों साल बाद की है।
हां हम वो जंगली हैं जिसे दस वर्ष की आयु तक माँ ने पढ़ाया है, जिसका गुरुकुल जंगल है, जिसकी प्रयोगशाला जंगल है, जो 25 से 50 साल तक गृहस्थ है। हम वो जंबूद्वीप वासी हैं जहां जन्म जंगल है, जहां मृत्यु जंगल है, जहां उल्लास जंगल है, जहां प्रलाप जंगल है, जहां एकांत जंगल है, जहां अध्यात्म जंगल है. जहां ऊर्जा का सिद्धांत है, जहां पृथ्वी गर्भ है, जहां विश्व कुटुम्ब है, जहां सीमाएं नहीं हैं, जहां धर्म नहीं है, जहां प्रत्येक जीव आत्मा है, जहां सत्ता की लालसा नहीं है, जहां झूठा दिखावा नहीं है, जहां शान या प्रतीकार नहीं है, जहां मानव शांत है। जहां हजारों सालों से अतिक्रमण में भी जीवित निरपेक्ष साधुओं या फकीरों की वो जमात है जो जंगलों में बैठे इस सवाल का जवाब खोज रहे हैं कि-
मानव क्या है? वो क्यों आया इस धरा पर? क्या वो भी अन्य जीवों की तरह जीवन जीने का यत्न करे और उसके बाद प्राण त्याग दे? आओ दोस्तों चलें अब वापस अपने जंगलों की तरफ जहां सीमाओं में बंधे राष्ट्रों की तरह विध्वंस और मृत्यु का विकास नहीं है जहां विकास है मानव का पारलौकिक विज्ञान, प्रकृति और मानवता में। जहां स्वयं की खोज है।

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
Kolaybet Giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
bettilt giriş
Betgaranti
betgaranti
betgaranti giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
Betgaranti Giriş
Kolaybet Giriş
betgaranti giriş
holiganbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
perabet giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betnano giriş
Kolaybet
kolaybet giriş
betnano giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betorder giriş
betorder giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betorder giriş
betorder giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
betgaranti international
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
kolaybet
kolaybet giriş
kolaybet güncel giriş
kolaybet
sahabet giriş
onwin giriş
kolaybet giriş
onwin giriş
kolaybet giriş
Kolaybet Giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet güncel giriş
sahabet güncel giriş
onwin güncel giriş
onwin güncel giriş
betpark
sahabet güncel giriş
sahabet güncel giriş
sahabet güncel giriş
sahabet güncel giriş
betpark
sahabet güncel giriş
sahabet güncel giriş