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व्यक्तित्व

आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री का जीवन और कार्य प्रेरक एवं अनुकरणीय है

ओ३म्
-जन्म दिवस 1 जनवरी पर शुभकामनायें
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आचार्य चन्द्र शेखर शास्त्री जी का जीवन साहित्य, समाज एवं संस्कृति के प्रति पूर्णतः समर्पित हैं। वेदकथा के साथ श्रीमद्भगवद् गीता, रामायण, उपनिषद् आदि में भी उनकी गहरी पैठ है। अपने इसी गुण के कारण उन्हें देश विदेश में प्रवचनों के लिए आमंत्रित किया जाता है।

आचार्य चन्द्रशेखर शास्त्री सहज, मिलनसार एवं मृदुभाषी हैं। उनमें एक ऐसी आकर्षिणी शक्ति है कि एक बार जो भी व्यक्ति उनके सम्पर्क में आ जाता है वह फिर जन्म भर उन्हीं का बन कर रह जाता है।

आचार्य चन्द्रशेखर शास्त्री बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी है। भारतीय वेशभूषा उनके भारतीय अन्तर्मन की परिचायक है। वैदिक गुणों- उदारता, परोपकारिता, मिलनसारिता, दया, करुणा आदि को उन्होंने अपने जीवन में धारण किया है। परमशान्त, समरस एवं आत्मसन्तुष्ट आचार्य जी के जीवन का लक्ष्य ऋषिवर दयानन्द के ही समान वैदिक धर्म का प्रचार-प्रसार तो है ही कृण्वन्तो विश्मार्यम् भी है। अध्यात्म, शिक्षा, मानवसेवा, भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के प्रचार-प्रसार में संलग्न आचार्य जी के ब्रह्मत्व में देश-विदेश में शताधिक वृहदयज्ञों का अयोजन हुआ है। मनुर्भव का दिव्य संदेश देते हुए आपने असंख्य लोगों को वैदिक धर्म की ओर प्रेरित किया है और उन्हें मद्यपान, धूम्रपान एवं अन्य अनेक कुटेवों को छोड़ने की प्रेरणा दी है।

संस्कृत भारतीय संस्कृति की आत्मा है। ज्ञान विज्ञान का अक्षुण्ण कोष इसी भाषा में सन्निहित है।‘दशदिवसेषु संस्कृतं वद’ कार्यक्रम के द्वारा आपने संस्कृत के प्रचार प्रसार में महनीय योगदान किया है तथा अनेक विद्यार्थियों, सामान्यजनों, डाक्टरों, जजों आदि को संस्कृत के पठन-पाठन की प्रेरणा दी है, साथ ही नवनिर्वाचित विधायकों एवं सांसदों को संस्कृत में शपथ लेने के लिए भी प्रेरित किया है। आपके प्रेरक नेतृत्व में अनेक परोपकार के कार्य सम्पन्न हुए हैं जैसे कि रक्तदान शिविर, वृक्षारोपण, निर्धनों को शीतऋतु में कम्बल प्रदान, यज्ञ-योग शिविरों का आयोजन, निर्धन कन्याओं का विवाह आदि। बाढ़, भूचाल, सुनामी एवं प्राकृतिक आपदाओं के समय आचार्य जी ने तन-मन-धन से बढ़-चढ़ कर समाज सेवा की है। अन्तर्राष्ट्रीय कथाकार आचार्य चन्द्रशेखर शास्त्री जी ने धर्म प्रचारार्थ नैपाल, मारीशस, ह्यूस्टन, शिकागो, न्यूयार्क, न्यूजर्सी, हालैण्ड, पेरिस, कनाडा आदि देशों की यात्रायें की है।

तार्किकता, सहृदयता, मानवता एवं प्रतिभा के अद्भुत संगम आचार्य श्री चन्द्रशेखर शास्त्री को इन्हीं दिव्य गुणों के कारण आर्यजगत् के अनेक प्रतिष्ठित पुरुस्कारों एवं सम्मानों से विभूषित किया गया है। इनमें से कुछ उल्लेखनीय हैं- आर्य विभूषण पुरस्कार(योगऋषि स्वामी रामदेव जी के करकमलों से), विद्यामार्तण्ड सम्मान(माता कमला आर्या ट्रस्ट की ओर से), वैदिक विद्वान अलंकरण(पद्मश्री श्री ज्ञानप्रकाश चोपड़ा जी द्वारा)। साहित्य सृजन सम्मान(पूर्व राज्यपाल महामहिम श्री भीष्म नारायण सिंह जी एवं पद्मश्री डा. श्याम सिंह शशि जी के कर कमलों से)। बिहारीलाल भाटिया पुरस्कार (आर्य केन्र्द्रीय सभा दिल्ली राज्य द्वारा)। वैदिक विद्वान सम्मान (आर्य समाज, बी ब्लाक, जनकपुरी दिल्ली में) महाशय धर्मपाल जी (एम.डी.एच.) के पावन सान्निध्य में। मारीशस, यूरोप, अमेरिका के शिकागो शहर में भी आचार्य जी सम्मानित हुए एवं अनेक परोपकारी, सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं ने भी आचार्य जी का अभिनन्दन किया है।

आचार्य श्री चन्द्रशेखर शास्त्री जी केवल प्रवचनकर्ता ही नहीं, गंभीर चिंतक एवं सुधी लेखक भी हैं। बोलना सरल है किन्तु लिखना अत्यधिक कठिन। संस्कृत में एक उक्ति है‘शतं वद एकं मा लिख’ अर्थात् सौ बार कहो पर एक बार भी मत लिखों क्योंकि लेखन में यदि कोई त्रुटि रह जाये तो वह तुरन्त पकड़ में आ जाती है ओर व्यक्ति की पोल खोल देती है। शास्त्री जी के अब तक 40 ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं जो उनकी अजस्र साधना, विद्वता एवं चिन्तन के प्रमाण हैं। निस्पृह भाव से उन्होंने अनेक ग्रन्थों का निःशुल्क वितरण किया है जिनमें दैनिक यज्ञ पद्धति लगभग डेढ़ लाख परिवारों में वितरित की गयी है। शास्त्री जी की प्रेरणा, सौजन्य एवं सहयोग से वैदिक संध्या एवं यज्ञ की जो भव्य एवं आकर्षक वी.सी.डी. विश्व मे ंपहली बार तैयार की गयी है, उसे देखकर देश-विदेश के लोग आत्मिक आनन्द की उपलब्धि करते हैं। अभ्युदय एवं श्रेयस् की प्राप्ति के लिए शास्त्री जी का साहित्य सामान्यजनों के लिए रामबाण साबित हो रहा है। यही कारण है कि उनके कुछ ग्रन्थों के अनुवाद, अंग्रेजी, उड़िया आदि भाषाओं में हुए हैं। विश्वास है कि कालान्तर में देश-विदेश की अधिकांश भाषाओं में इनके ग्रंथ अनुदित होंगे।

ईश्वरीय वाणी वेद यद्यपि मुद्रणकला के माध्यम से विश्व में प्रचारित-प्रसारित था किन्तु आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कारों के परिपेक्ष्य में उसके प्रचार-प्रसार की महती आवश्यकता बनी हुई थी जिसकी पहली बार पूर्ति आचार्य चन्द्रशेखर शास्त्री की प्रेरणा एवं सहयोग से मानव उत्थान संकल्प संस्थान ने की है। कम्प्यूटर क्रान्ति ने विश्व की स्थिति ही बदल दी है। चारों वेदों को कम्प्यूटरीकृत आफसेट प्रणाली से मुद्रित कर उन्होंने एक नवीन कार्य किया है।
महर्षि दयानन्द के मिशन को आगे बढ़ाते हुए आचार्य चन्दशेखर जी ने प्रोफेसर विजय कुमार मल्होत्रा जी के निवास-स्थान पर वेदों का लोकार्पण किया एवं यज्ञ का ब्रह्मत्व भी किया। दिल्ली से अमृतसर तक उनके नेतृत्व में वेद प्रचार रथ यात्रा भी सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई है।

वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए आचार्य चन्द्रशेखर शास्त्री ने‘अध्यात्म पथ’ शीर्षक मासिक पत्रिका के सम्पादन का गहन दायित्व भी ग्रहण किया हुआ है। घर फूंक तमाशा देखने जैसा यह काम कितना कठिन है इसे वही लोग समझ सकते हैं जो किसी पत्रिका के सम्पादन से जुड़े हैं। इस पत्रिका की उपयोगी, दिशा-निर्देशक, प्रेरक-सामग्री न जाने कितने पतितों का उद्धार कर रही है। पत्रिका में जीवन-निर्माण की सारी सामग्री सहज सुलभ है। पत्रिका सामान्यजनों के लिए ही नहीं, विद्वद्जनों के लिए भी समानरूपेण उपयोगी है। हिन्दी के साथ संस्कृत एवं अंग्रेजी की उपयोगी एवं दिशा-निर्देशक सामग्री भी इसमें रहती है, जिससे इस पत्रिका में त्रिवेणी का संगम हो जाता है।

आचार्य चन्द्रशेखर शास्त्री की दानवृत्ति का और गुणग्राहकता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि वे प्रतिवर्ष अध्यात्म-पथ मासिक पत्रिका की ओर से आयोजित कार्यक्रमों में मूर्धन्य संन्यासियों, यज्ञ एवं वैदिक सिद्धान्तों में आस्था रखने वाले विद्वानों, धर्मप्रेमी समाज सेवियों एवं पत्रकारों को उदारता से सम्मानित करते हैं। शाल, कलात्मक प्रतीक चिन्ह, प्रशस्ति पत्र आदि के द्वारा सम्मानित करते हुए वे अध्यात्म मार्तण्ड, अध्यात्म रत्न एवं यज्ञ श्री की मानद उपाधियां प्रदान करते हैं और इस अवसर पर अध्यात्म-पथ पत्रिका एवं वैदिक साहित्य भी निःशुल्क वितरण करते हैं। आचार्य चन्द्रशेखर शास्त्री जी ने अत्यन्त पिछड़े साधन विहीन निर्धन एवं सुख सुविधाओं से रहित उड़ीसा के ग्राम भरसुजा में अध्यात्म गुरुकुल की स्थापना कर अपनी क्रान्तदर्शी दृष्टि का परिचय दिया है।
निष्कर्षतः आचार्य चन्द्रशेखर शास्त्री जी प्रख्यात वैदिक विद्वान, सहृदय कवि, प्रख्यात लेखक, उत्कृष्ट प्रवचनकर्ता, प्रशंसनीय समाजसेवी एवं वैदिक धर्म के ध्वजवाहक हैं। वे महर्षि दयानन्द के सच्चे अनुयायी हैं।

ईश्वर से प्रार्थना है कि वे अदीन व स्वस्थ रहते हुए शतायु हों, बल्कि उससे भी अधिक वर्षों तक जीवित रहें एवं इसी प्रकार अपनी मधुर, ओजस्विनी वाणी एवं गंभीर लेखनी के द्वारा वैदिक धर्म, संस्कृति एवं मानवता की सेवा में प्राणपण से लगे रहे।1 जनवरी आचार्य जी का जन्म दिन है। इस अवसर पर उनका हार्दिक अभिनन्दन हैं।

आचार्य चन्द्रशेखर शास्त्री जी के जीवन पर उपुर्यक्त लेख आर्यजगत के प्रसिद्ध विद्वान डा. सुन्दरलाल कथूरिया जी ने लिखा था। हमने कुछ परिवर्तन के साथ इसे प्रस्तुत किया है। शास्त्री जी का जीवन आर्यसमाज के बन्धुओं के लिए अनुकरणीय एवं प्रेरणादायक है। हमें भी आर्य महापुरुषों सहित उनके व्यक्तित्व से प्रेरणा लेकर कृण्वन्तो विश्वमार्यम् को पूरा करने के लिए अधिकाधिक प्रयत्न करने चाहियें। श्री चन्द्रशेखर शास्त्री जी को 1 जनवरी को जन्म दिवस के अवसर पर हमारी ओर से हार्दिक शुभकामनायें एव बधाई।

प्रस्तुतकर्ताः मनमोहन कुमार आर्य

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