भारत प्राचीन काल से ही पन्थनिरपेक्ष देश रहा है। क्योंकि इसकी राज्य व्यवस्था का मूल आधार समग्र समाज की मंगल कामना रही है। राज्योत्पत्ति के लिए अथर्ववेद (19-41-1) में आया है :-
भद्रमिच्छन्त ऋषय: स्वर्विदस्तपा दीक्षां उपनिषेदुरग्रे।
ततो राष्ट्रं बलमोजश्च जातं तदस्मै देवा उपसंनमस्तु।।
अर्थात समग्र समाज के कल्याण की कामना करते हुए क्रांति दर्शी (ऐसे राष्ट्र चिंतक लोग जो राजनेता कहे जाते हैं और जो देश के भविष्य को समुज्ज्वल बनाने के लिए सदा प्रयासरत रहते हैं) अपने ज्ञान और तप से राष्ट्रबल और राष्ट्र ओज को उत्पन्न करते हैं। उस राष्ट्र की सेवा में देश के सब नागरिक (पंथीय वर्गीय या साम्प्रदायिक पूर्वाग्रहों केा त्यागकर) सदा कटिबद्घ रहें।”
यह मंत्र राजा का राजधर्म और प्रजा का प्रजाधर्म दोनों को ही घोषित कर रहा है। राजा का राजधर्म है -समग्र समाज की उन्नति के लिए अथवा कल्याण के लिए प्रयासरत रहना और प्रजा का धर्म है कि वह राजा के ऐसे कार्यों में अपने वर्गीय, पंथीय या साम्प्रदायिक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर उसकी सहयोगी बने।
वर्तमान काल में हमारी प्रवृत्ति हो गयी है कि हम राज्य से अपने-अपने अधिकारों की मांग तो करते हैं, परंतु अपने-अपने कत्र्तव्यों का निर्वाह नही करते। इसलिए राज्य और प्रजा दोनों में एक संघर्ष चलता रहता है। राज्य समग्र समाज का कल्याण नही कर पाता और प्रजा समग्र समाज का कल्याण होने नही देती। सबको अपने अपने वर्गीय, पंथीय या सांप्रदायिक हितों की चिंता है और उन्हीं के लिए लोग राज्य के प्रति सहयोगी या असहयोगी व्यवहार अपनाये रहते हैं। परिणामस्वरूप समाज के अधिकांश लोग राज्य की नीतियों से असंतुष्ट रहते हैं और उसके प्रति असहयोगी बनकर कार्य करते रहते हैं। समाज के अधिकांश लोग सत्ता विरोधी होते हैं, परंतु लोकतंत्र का चमत्कार देखिए कि इसमें अधिकांश सत्ता विरोधियों के लिए ही राजा का चुनाव होता है, अर्थात राजा अपने समर्थकों के लिए अपने विरोधियों पर शासन करता है – लोकतंत्र में।
भारत में बीते 67 वर्षों में किसी भी राजनीतिक दल या गठबंधन ने चुनाव में कभी भी 51 प्रतिशत मत पाकर बहुमत का समर्थन प्राप्त नही किया। अधिक से अधिक 30-35 प्रतिशत मत पाकर ही कोई न कोई दल अपनी सरकार बनाता रहा है। इस प्रकार 65-70 प्रतिशत लोग पहले दिन से ही सत्ता विरोधी रहे हैं। सत्ताविरोधी दल ऐसी परिस्थितियों में अपने पक्ष में मतदान करने वाले वर्गों, पंथों या सम्प्रदायों को प्रसन्न करने की युक्ति खोजते रहे हैं और इसीलिए जातीय आधार पर आरक्षण या और अन्य प्रकार की सुविधायें राजनीतिक दल अपने-अपने समर्थकों को देते रहे हैं, जिससे कि उनका वोट बैंक पक्का रहे। पिछले 67 वर्षों में समाज में तेजी से ऐसे लोग पनपे हैं, जो अपने-अपने वर्गों, पंथों या संप्रदायों के मतों की ठेकेदारी लेते हैं और किसी मनपसंद राजनीतिक दल को सत्ता दिलाकर उससे फिर मनमाफिक मुनाफा कमाते हैं। ये ठेकेदार सत्ता के वास्तविक दलाल हैं। ये नुक्कड़ सभाओं के माध्यम से या किसी अन्य प्रकार से अपने-अपने वर्गों या संप्रदायों को किसी एक दल के लिए काम करने के लिए प्र्रेरित करते रहते हैं।
ऐसे ठेकेदार समाज के लोगों से कहते हैं कि हम तुम्हारे लिए अमुक दल से या सत्ताधारी पार्टी से अमुक सुविधा दिलाते हैं, और उधर किसी राजनीतिक दल से कहते हैं कि हमारे लोगों को यदि आप अमुक अमुक सुविधायें दे दें तो हम आपको चुनावों में इतना लाभ प्रदान करा सकते हैं। बड़ी चतुरता से ऐसे लोग राजनीतिक दलों को अथवा राज्य व्यवस्था को जनता से और जनता को अपनी राज्यव्यवस्था से मिलने नही देते हैं और बीच में बैठकर ‘मुनाफाखोर दलाल’ की भूमिका निभाते हैं। यह एक कड़वा सच है कि ऐसा कुसंस्कार भारतीय राजनीति और राजनीतिक व्यवस्था में एक कोढ़ बनकर फेेल गया है। इस व्यवस्था से वेद की समग्र समाज के कल्याण की भावना का क्षरण हुआ है और हमारी सारी राजनीतिक व्यवस्था ही एक मृगतृष्णा का शिकार होकर रह गयी है। राष्ट्रओज और बल से हीन हो चुका है और बहुत से अनिर्णीत अन्तद्र्वद्वों में हम फंसकर रह गये हैं।
इन्हीं अन्तद्र्वद्वों में फंसी राजनीति ने अपना पथ धर्मनिरपेक्षता को बना लिया। जिससे राजनीति में सैक्यूलरिज्म का प्रचलन तेजी से बढ़ा। परंतु व्यवहार में राजनीति वर्गों, पंथों और संप्रदायों का तुष्टिकरण करती रही। जिससे राजनीति ही साम्प्रदायिक हो गयी। जिन चिंतनशील लोगों ने इस अवधि में पंथनिरपेक्षता और भारतीय राजनीति के इस अवैध संबंध पर शोध किया उन्होंने अपनी मान्यता स्थापित की कि चोरी-चोरी जो कुछ किया जा रहा है वह नितांत तुष्टिकरण है और वोटों को दूषित राजनीति के माध्यम से भारत की आत्मा के साथ छल है। इसलिए यह छल प्रपंचों का खेल अब समाप्त होना चाहिए। जो लोग ऐसा कह रहे थे उन्हें दक्षिणपंथी कहा गया, और साम्प्रदायिक कहा गया। इन्हें हिंदुत्ववादी शक्तियां कह कर अपमानित करने का प्रयास किया गया। ये प्रयास उन लोगों ने या दलों ने किये जो अपने-अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए राष्ट्र को लूट रहे थे अथवा उसका मूर्ख बना रहे थे। इस हिंदुत्व के प्रबल पैरोकार के रूप में मोदी का आगमन हुआ है। इस आगमन को सत्ता के दलालों और वोटों के सौदागरों ने इतना कोसा है कि देश से बाहर ऐसा संदेश गया है कि जैसे अब भारत में प्रलय ही आने वाली है। इतने शोर को सुनकर सारे संसार के कान खड़े हो गये। सबने भारत में रूचि लेनी आरंभ की और इस बात पर शोध करना आरंभ किया कि मोदी के आगमन से देश के अल्पसंख्यकों का क्या होगा?
पर मोदी भी भारत की मिट्टी से बने हैं, इसलिए मोदी ने हिंदुत्व का अल्पसंख्यक विरोधी अर्थ करने वालों को आड़े हाथों लेकर स्पष्ट कर दिया कि वह भारत की उसी सनातन परंपरा के शासक होंगे जिसमें सर्व समाज के कल्याण की कामना की जाती रही है और जिसमें शासक के लिए प्रजा हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई आदि ना होकर केवल प्रजा होती है। मोदी ने अपना राजधर्म घोषित कर दिया है कि हिंदू मुस्लिम सब मेरे हैं और मैं सबका हूं। इसलिए समाज के सभी वर्गों से जुड़कर चलूंगा।
मोदी की यह घोषणा वीर सावरकर के विचारों के अनुकूल भी है। वीर सावरकर की मान्यता भी यही थी कि राज्य कभी भी और किसी भी कीमत पर तुष्टिकरण ना करे और जनता के लोग देश की इस पावन भूमि को अपनी पितृभू: और पुण्यभू: स्वीकार करें। उन्होंने 1937-38 में हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में जो भाषण दिये थे, उन्हें पढऩे समझने और स्वीकार करने की आवश्यकता है। मोदी मोती चुन रहे हैं-सावरकर के व्याख्यानों से। मोदी बात वही कह रहे हैं जो सावरकर ने कही थी परंतु उसका अर्थ और संदर्भ भिन्न है। मोदी ने अभी एक टीवी साक्षात्कार में भी कहा है कि उनसे कुछ ऐसे लोगों को तो (उनके सत्ता में आने पर) डरना ही पड़ेगा जो देश विरोधी कार्य कर रहे होंगे। परंतु जो देश की मुख्यधारा में जुड़कर चलने में विश्वास रखते हैं, उनको डरने की आवश्यकता नही है। कुछ ऐसा ही सावरकर का मानना था। उन्होंने 1937 में अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था-”हमें हिंदू मुस्लिम एकता के लिए मुसलमानों के पीछे नही भागना चाहिए। बल्कि आओगे तो तुम्हारा स्वागत है, नही आओगे तो तुम्हारे बिना स्वराज्य तो हम लेंगे ही, यदि विरोध करोगे तो तुम्हारे खिलाफ भी डटकर मुकाबला किया जाएगा, किसी भी स्थिति में हिंदू राष्ट्र तो अपना भविष्य निर्माण करेगा ही।”
जिन लोगों को हिंदू शब्द से, हिंदू राष्ट्र से चिढ़ है उन्हें 7 अप्रैल 1989 को चुनाव याचिका संख्या 1988 पर दिये गये माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का अवलोकन करना चाहिए। जिसमें माननीय न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि वास्तव में (हिन्दुत्व में) इस पर किसी संप्रदाय या मत के लिए पारंपरिक संकीर्ण लक्षण उतरते नही दिखाई देते। इसे मुख्य रूप से एक जीवन पद्घति ही कहा जा सकता है, इसके अतिरिक्त कुछ और नही।
इसके लिए एक्साईक्लोपीडिया ब्रिटानिका का कहना है-”सिद्घांतत: हिन्दुत्व समस्त विश्वासों, श्रद्घा रूपों और उपासना विधियों को समाविष्ट करता है, इसी कारण हिन्दुत्व सभ्यता भी है और धार्मिक मतों का एक विराट संपुजन भी है।”
अब बीबीसी की ओर से एक लेख जारी किया गया है कि अब ‘हिंदुत्व की राजनीति का धर्मनिरपेक्षीकरण’ हो रहा है। लेखक ने यह मान्यता मोदी के उपरोक्त स्पष्टीकरण के संदर्भ में बनायी है। सचमुच लेखक की बौद्घिक क्षमताओं पर तरस आता है। क्योंकि हिंदुत्व ही वह विचारधारा है जो अपने मौलिक स्वरूप में समग्र समाज के कल्याण के लिए कार्य करती है और वह ऐसी ही राज्यव्यवस्था का समर्थक है। भारत में जिस राज्य व्यवस्था को धर्मनिरपेक्ष माना गया है वह धर्मनिरपेक्ष न होकर भारत की आत्मा के संदर्भ में तो ‘मर्मनिरपेक्ष व्यवस्था’ ही सिद्घ हुई है। अब मोदी भारत की वैदिक परंपरा और सावरकरवादी परंपरा के अनुसार यदि इस ‘मर्मनिरपेक्ष राज्यव्यवस्था’ को पंथनिरपेक्ष बनाने की बात कह रहे हैं तो इसमें नया कुछ नही है, अपितु पुरातन का नूतन संस्करण मात्र ही होगा। सचमुच हमें गर्व है अपनी भारतीय संस्कृति पर जिसके लिए सावरकर लिखते हैं :-
”यह भूमि वशिष्ठ नामदेव आदि ऋषियों द्वारा अभिमंत्रित जन से पवित्र की गयी है, महर्षि व्यास की वाणी और कृष्ण की गीता का ज्ञान इसकी उत्कट गंध है। रामायण हमारा क्षीरसागर है। दमयंती सावित्री, गार्गी, गीता इसी भूमि के उदर से हुईं। कणाद, कपिल…..सरीखे धर्मवेत्ता इस धरती की यज्ञशाला से दिग्विजयी धर्मसम्राट बने। चित्तौड़ के प्रताप, बुंदेला के छत्रसाल….सभी मिलकर जिसका स्तोत्र गा रहे हैं, उस महान भूमि को हमारा वंदन है। शत शत अभिनंदन है।”
आज यह पावन वंदनीय अभिनंदनीय भारत भूमि अपना इतिहास लिखने को आतुर है, सारी मिथ्या मान्यताओं को बदल देना चाहती है। होली जलने से पहले बी.बी.सी. चुप रहे तो ही अच्छा है।

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