निजी जीवन को बनाओ सार्वजनिक जीवन की नींव

भारत में प्राचीन काल में राजा अपने राजतिलक के पश्चात जो शपथ लेता था उसे ऐतरेय ब्राह्मण (8/15) में यूं बताया गया है-”मैं जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त का सारा समय तुम्हें समर्पित करता हूं। यदि कभी भी मैं प्रजा के साथ कोई असत्य व्यवहार करूंगा या उसके साथ कोई छल कपट करूं तो मेरा यज्ञ (सत्कर्म) उस यज्ञ और दानादि का फल मेरा राज्य एवं राजभवन यहां तक कि मेरा और मेरे वंशानुक्रम वालों का जीवन तक तुम ले सकते हो।”

यजुर्वेद (32/13) में राजा के व्यक्तिगत जीवन के उच्च और उन्नति होने के दिव्य गुणों के रहते राजा को जिन अन्य गुणों से विभूषित होना चाहिए, उनकी ओर संकेत किया गया है। वहंा हमें बताया गया है कि ”राजा (नेता) में चमत्कारी निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए वह राज्य शक्ति का प्रिय हो, अपने निजी जीवन की शुचिता और पवित्रता के कारण वह जनता के लिए कामना करने के योग्य हो, जिससे व्यक्तिगत गुणों के कारण जनता जिसकी सदा प्रशंसा करती रहे, उस के निर्णयों में बुद्घिवाद झलकता हो और वह अपने लिए गये ऐसे बुद्घिपरक निर्णयों पर सदा कटिबद्घ रहने वाला हो।”

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि राजा अथवा नेता अथवा हमारे आज के जनप्रतिनिधियों के लिए आवश्यक है कि उनका निजी जीवन  इतना आदर्श और उच्च हो कि वह जनसाधारण के लिए मार्गदर्शक बन जाए। भारत की यही परंपरा है। छोटों को सिखाने से पहले यहां सदा बड़ा पहले स्वयं ‘गुड़ खाना’ छोड़ता है। जिससे कि छोटे पर उसके आचरण का प्रभाव पड़े और वह उसे अपना आदर्श मान सके। इसीलिए हमारे ेपरिवारों तक में मुखिया अपने निजी जीवन को पवित्र बनाये रखने के प्रति सदा सावधान रहता है और कोई भी ऐसा कार्य करने से बचता है, जिसका प्रभाव बच्चों पर या उनके चरित्र पर विपरीत पडऩे की संभावना होती है। बच्चों के समक्ष बड़े लोग परिवार में अश्लील मजाक करने तक से बचते हैं, माता-पिता बड़े बच्चों के सामने एकांत सेवन तक से बचते हैं। ऐसी मर्यादित परंपराओं और उच्च विचारों ने ही भारत की संस्कृति का निर्माण किया है और इतनी समझदारी और सावधानी से ही हमारी सामाजिक परंपराएं बनी हैं। मर्यादाएं सदा गतिशील समाज का और मननशील मानव का निर्माण कराती हैं। भारत अपनी महान मर्यादाओं के कारण ही विश्व में गतिशील (गुरू) होने के गौरवमयी पद का स्वामी रहा। इसके मननशील मानव समाज को विश्व ने बहुत देर तक आश्चर्य और कौतूहल की दृष्टि से देखा।

स्वतंत्रता के पश्चात जब मुस्लिमों और अंग्रेजों द्वारा लूटे गये इस देश के पुनर्निर्माण का समय आया तो उस समय बहुत कुछ परिवर्तन आ चुका था। सबसे दुखद बात ये रही कि उस समय देश का नेतृत्व उस व्यक्ति को मिला जो चमड़ी से तो भारतीय था परंतु विचारों से अंग्रेज था। हमारा संकेत पंडित जवाहरलाल नेहरू की ओर ही है। नेहरू जी ने अंग्रेजों की नकल करते हुए भारतीय सार्वजनिक जीवन के लिए एक मिथक गढ़ा कि नेताओं का निजी जीवन अलग है और सार्वजनिक जीवन अलग है। इसलिए लोगों को कभी भी निजी जीवन में हस्तक्षेप करने या उधर झांकने का अधिकार नही है। ये बात किसी सीमा तक उचित भी है। हम किसी के निजी और पारिवारिक जीवन के उन क्षणों में झांकने का प्रयास ना करें जब वह व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ हो या अपने बच्चों के प्रति या परिवार वालों के प्रति आदर्श रूप में अपने कत्र्तव्यों का निर्वाह कर रहा हो। हम ऐसे व्यक्ति के इस आदर्श व्यवहार को या गुण-गण को अपने चिंतन का विषय बनाकर अपने लिए आदर्श तो बना ही सकते हैं। परंतु ऐसा व्यक्ति अपनी पत्नी को छोड़कर या परिवार वालों के साथ भी छल कपट करते हुए कुछ और ही ‘उत्पात’ मचा रहा हो, और हम तब भी उसके प्रति चुप रहें, तो यह उचित नही है। जो व्यक्ति अपने निजी जीवन में ईमानदार नही है, या अपने बच्चों के संरक्षक के रूप में अपने कत्र्तव्यों का उचित निर्वाह नही कर रहा है, तो ऐसे व्यक्ति को हम देश का संरक्षक कैसे बना सकते हैं? नही बनाना चाहिए।

पर भारत में अपने ‘कुराफातों’ और उत्पातों को छिपाने के लिए नेताओं ने हमसे अपेक्षा की कि जनता उनके प्रति हर स्थिति में चुप रहे। नेहरू जी और लेडी माउंटबेटन के संबंधों पर बहुत कुछ लिखा गया है। नेहरू देश के ‘बेताज बादशाह’ कहे जाते थे और उन्होंने अपने इस आभामंडल का दुरूपयोग करते हुए देश की जनता को अपने निजी जीवन के उत्पातों से मुंह फेरकर दूसरी ओर देखने में सफलता प्राप्त की। जनता ने उस समय यह मान लिया कि जो कुछ हो रहा है, उसे होने दो, इससे हम को क्या लेना देना? पर बाद में जनता की इसी उदासीनता का और नेहरू की व्यवस्था का लाभ इंदिरा जी ने उठाया, उन पर कई प्रकार के अशोभनीय आरोप  लगे। उनके बेटों, पोतों आदि पर भ्ी ऐसे ही आरोप लगते रहे।

नेहरू की उक्त व्यवस्था और जनता की उदासीनता का परिणाम ये आया कि देश के जनप्रतिनिधियों में से अधिकांश ने अपने निजीजीवन केा निकृष्ट से निकृष्टतर बनाने का रास्ता अपना लिया। बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ सैक्स स्कैण्डलों में फंसे और विधायकों से भी अलग पार्टियों के जिलाध्यक्षों, नगरपालिकाओं के चेयरमैनों तक ने भी कई कई महिलाओं से दोस्ती बनाना अपने लिए शान की बात मान ली। सारा परिवेश ही प्रदूषित हो उठा। ‘यथा राजा तथा प्रजा’ वाली कहावत चरितार्थ हुई और हमने देखा कि कितनी ही ‘निर्भया’ रोज हमारे बहशीपन का शिकार होने लगीं। निर्भयाओं के यौन उत्पीडऩ पर या ऐसी घटना के पश्चात उनकी हत्या पर शोक व्यक्त करने या ऐसी घटना के विरोध में आयोजित किये गये जुलूसों का नेतृत्व भी कई बार निर्भयाओं के हत्यारे ही करते हैं तो उन्हें देखकर हंसी भी आती है और दुख भी होता है। क्या हो गया इस देश को? कब तक हमें मूर्ख बनाने वाले नेताओं के नेतृत्व के लिए अभिशप्त रहना पड़ेगा?

इस देश को आजाद कराने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले महात्मा गांधी के विषय में गिरजा कुमार ने अपनी पुस्तक ‘महात्मा गांधी और उनकी महिला मित्र’ में जिस प्रकार गांधीजी के कथित ब्रह्मचर्य का वर्णन किया है, उसे पढ़कर गांधीजी के विषय में आपकी धारणा का भवन पल भर में भूमिसात हो सकता है। नेहरू जी गांधीजी के उत्तराधिकारी थे। गांधीजी अपने विचारों से बहुत दूर रहने वाले सरदार पटेल को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी क्यों नही बना पाए या क्यों नही बनाना चाहते थे, यह भी उस पुस्तक के पढऩे से स्वत: स्पष्ट हो जाएगा। गांधीजी नेहरू के विषय में पूर्णत: आश्वस्त थे कि ये व्यक्ति निजी जीवन और सार्वजनिक जीवन के बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर देगा जिसके पीछे तेरे अपने ‘पाप’ भी छिप जाएंगे। परंतु ‘पटेल’ यदि आ गया तो वह निजी जीवन को व्यक्ति के सार्वजनिक जीवन की नींव मानने या मनवाने की ‘भूल’ कर सकता है। और तब तेरे पाप सबके लिए घृणित हो जाएंगे। इस प्रकार निजी जीवन को सार्वजनिक जीवन के लिए आदर्श मानने या न मानने के इस विवाद ने स्वतंत्र भारत के पहले बादशाह की ताजपोशी करा दी थी। इसकी ओर हमारा ध्यान आज तक नही गया है।

अब हमारे सामने कांग्रेस की इस अमानुषिक और भारतीय संस्कृति और संस्कारों के विपरीत अपनायी गयी विचारधारा का नया संस्करण कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह का नाम आया है। जिन्होंने 67 वर्ष की उम्र में राज्यसभा टीवी एंकर 43 वर्षीय एक महिला अमृता राय से अपने संबंधों की अपवित्रता को पवित्र मानकर निर्लज्ज्ता से स्वीकार किया है। अपनी निर्लज्जता को उन्होंने ‘साहस’ के नाम से संबोधित किया है। अभी तक भारत में इतनी आयु के व्यक्ति से अपेक्षा की जाती रही है कि वह 40-50 वर्षीय महिलाअेां केा अपनी बेटी के समान समझता है। परंतु अब दिग्गी राजा ने नई परंपरा और नई संभावनाओं को जन्म दिया है। निश्चय ही इससे समाज में कुछ नयी विकृतियां जन्म लेंगी और इस देश में भी ‘अरब के अमीरों’ की भांति कुछ समय पश्चात हर आयु वर्ग की उसकी पत्नी मिल सकती है। तब ब्रह्मचर्य की साधना कर मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ाने वाले इस भारत देश में सर्वत्र हिंसा और व्यभिचार का ही बोलबाला होगा। निश्चित रूप से यह व्यवस्था भारत की नारी के लिए ही सर्वाधिक खतरनाक होगी। क्योंकि तब वह केवल उपभोग की वस्तु बनकर रह जाएगी।

समय करवट ले रहा है। करवट लेटे समय की आहट को यदि नारी संगठन से गंभीरता से लें तो इसके गंभीर परिणामों से बचा सकता है। निजी जीवन और उसकी स्वतंत्रता की सचमुच अपनी कुछ सीमाएं हैँ यदि उन सीमाओं की मर्यादाओं का उल्लंघन किया गया तो लाखों करोड़ों वर्ष से हमारा मार्गदर्शन करती आ रही भारतीय संस्कृति का नाश तो हो ही जाएगा साथ ही मानवता का भी नाश हो जाएगा। दिग्गी जैसे लोग भारत के आदर्श नही हो सकते। इस व्यक्ति ने अब तक अपनी भावी पत्नी के साथ छुप-छुपकर जो कुछ भी किया है वह समाज के विरूद्घ किया गया एक अपराध है। समाज चुप है और एक गलती के पश्चात दूसरी गलती के लिए अनुमति देने का मन बना रहा है कि ये दोनों विवाह कर लें तो ठीक है। क्योंकि समाज पर अभी यह झूठ अपना रंग दिखा रहा है कि निजी जीवन अलग है और सार्वजनिक जीवन अलग है। हमें स्वस्थ बहस को जन्म देकर व्यक्ति निजी जीवन को उसके सार्वजनिक जीवन की नींव घोषित करना चाहिए। तभी ब्रह्मचर्य की महिमा जानने वाले हम देश से दिग्गी जैसे व्यभिचारियों का सफाया हो सकता है और तभी हर निर्भया का शीलहरण होने से बच सकता है।

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