‘कोउ नृप होय हमें का हानि’ – का वास्तविक अर्थ और संदर्भ

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रामचरितमानस की एक चौपाई है “कोउ नृप होई हमै का हानि…”। कई दूसरी कविता-श्लोक के हिस्सों जैसा ही, इसे भी आधा-चौथाई ही सुनाया जाता है। सन्दर्भ का इस्तेमाल किये बिना जब कविता का इस्तेमाल किया जाए तो उसके काफी नुकसान होते हैं। अक्सर अर्थ का अनर्थ इसी तरीके से साबित किया जाता है। इसे समझना हो तो थोड़ी देर के लिए कविता छोड़कर अभियंत्रण (इंजीनियरिंग) के बारे में सोचना होगा। भारत नदियों का देश भी है, क्योंकि कृषि आधारित अर्थव्यवस्था, सिंचाई से लेकर तैयार माल की आवाजाही और लोगों के आवागमन के लिए भी नदियों के रास्ते पर निर्भर रहे हैं। करीब करीब सभी बड़े नगर, नदियों के किनारे ही बने-बसे दिख जायेंगे।

नदियों, कृषि और सिंचाई पर इतनी निर्भरता थी तो बांधों की भी जरूरत पड़ी। अभी जो इस्तेमाल में आ रहा, भारत का सबसे पुराना बाँध है, वो कावेरी नदी पर बना हुआ है। इसे तिरुचिरापल्ली से कुछ दूर बनवाया गया था। ये बाँध आज भी इस्तेमाल होता है। इसके इस्तेमाल में ख़ास ये है कि इसे चोल वंश के राजा करिकला चोल ने दूसरी शताब्दी में बनवाया था। जी हाँ, हम लोग करीब 1800 वर्ष पुराना बाँध भी इस्तेमाल करते हैं। कावेरी जल विवाद के बारे में बताने वालों ने शायद इस बाँध के बारे में बताना जरूरी नहीं समझा होगा। अब इस 1800 वर्ष पुराने बाँध से आगे निकलकर चार सौ साल पहले चलते हैं।

जाहिर है 1600 का दौर मुग़ल शासन का काल था। इस दौर में भारत के कुछ हिस्सों पर शाहजहाँ का भी शासन रहा था। 1629-32 तक के शाहजहाँ के शासन काल वाले हिस्से में दक्कन और गुजरात का भीषण अकाल भी पड़ा था। ऐसा माना जाता है कि इस अकाल में कम से कम चालीस लाख लोग मरे थे। इस अकाल के बाद ही, व अकाल के बाद भी, शाहजहां ने नहरें बनवाने के बजाय ताजमहल बनवाया था। बंगाल के 1770 के अकाल में बंगाल के एक करोड़ लोग मरे थे और आबादी का एक तिहाई हिस्सा ख़त्म हो गया था। ओड़िसा में 1866-67 के अकाल में और फिर दक्कन के 1876-78 के अकाल में भी एक-एक करोड़ लोग मरे थे। बंगाल के 1943 के अकाल के लिए तो सीधे चर्चिल को ही जिम्मेदार कहा जा सकता है।

ऐसा नहीं था कि 1800 वर्ष पहले बाँध बनाने की क्षमता रखने वाले लोग इस दौर में नहरें बनाना भूल गए थे। 1847 का ज़माना था। उस समय में भारत में कोई इंजीनियरिंग कॉलेज भी नहीं था। ऐसे समय में जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भीषण अकाल आया तो फिरंगी सरकार बहादुर को लगान कम मिलने लगा। उस दौर में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाके के गवर्नर थे, जेम्स थोमसन। थोमसन साहब एक तो लगान कम मिलने से परेशान थे लिहाजा उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी को ख़त लिख कर उस इलाके में नहर खुदवाने की बात की। एक चिट्ठी पर ना आया तो दूसरा ख़त लिखा। जवाब फिर भी नहीं आया तो उन्हें समझ आया कि वो तरीका सही नहीं लगा रहे।

लिहाजा तीसरे ख़त में उन्होंने लिखा कि अगर सिंचाई होगी, तो फसल ज्यादा होगी। फसल ज्यादा तो लगान ज्यादा वसूला जा सकेगा। इस बार भी हामी नहीं आई, इस बार पूछा गया कि सिंचाई की नहर तो ठीक है। मगर इंजिनियर तो हैं नहीं बनाएगा कौन नहर ? थोमसन ने जवाब दिया जी, स्थानीय लोग, देहाती, बना लेंगे नहर जी ! आप तो बस हुकुम कर दो जी ! ये कोई मामूली नाला नहीं बन रहा था। हरिद्वार के पास गंगा से नहर निकाल कर उसे दो सौ किलोमीटर के इलाके में फैलाने की बात हो रही थी। देहाती लोगों ने अपने परंपरागत कौशल से बिना इंजिनियरों के ही नहर बनाई और वो नहर आज भी है। उसके रखरखाव के नाम पर जो कॉलेज बना, उसे रुड़की के आईआईटी के तौर पर आज भी जाना जाता है।

अब वापस आते हैं कविता पर। “कोउ नृप होई हमै का हानि…” रामचरितमानस में मंथरा कह रही होती है। वो पूरे वाक्य में कहती है कि किसी के राजा होने से उसे क्या फर्क पड़ने वाला है? वो तो दासी ही रहेगी, रानी तो होगी नहीं! राजा आपके पक्ष में सोचने वाला हो तो वो सूखा आने पर ताजमहल नहीं, नहर बनवायेगा। आपके पक्ष में झुकाव रखता हो तो लगान ज्यादा मिलेगा कहकर नहर बनवाने का इंतजाम करवाएगा। फिर उस नहर के रखरखाव के नाम पर कॉलेज भी बनवा देगा। ऐसा नहीं है कि ये वो किसी और के पैसे से कर रहा है, ये आपसे लिए टैक्स का ही पैसा होगा। लेकिन आपसे जजिया वसूलकर राजमहल बनवाना है, या आपके टैक्स से नहर और कॉलेज, इसमें अंतर तो होता ही है।

बाकी जब “कोउ नृप होई हमै का हानि…” सुनाई दे तो याद रखियेगा कि बोलने वाले के मुंह से मंथरा बोल रही है। मंथरा की बात सुननी-माननी है या नहीं, इतने समझदार तो आप हैं ना?

 

आनंद कुमार जी की पोस्ट से

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