बिचौलिए और दलाल नए कृषि कानूनों के खिलाफ भड़का रहे हैं किसानों को

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सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के किसानों को चाहिए कि वह सही और गलत की पहचान करे। क्योंकि हमने देखा है कि जबसे कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर हुई है तब से कांग्रेस और वामपंथी दल ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास कर रहे हैं, जो देश को अस्थिर कर सकते हैं।

वर्तमान में कृषि प्रधान देश का किसान आंदोलित है, उद्वेलित भी है। इसके पीछे का कारण यदि हम सत्ताधारी दलों को मानें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि राजनीतिक दल सत्ता प्राप्त करते ही शासकों की भूमिका में आते चले गए और देश की मूलभूत आवश्यकताओं को किनारे पर रख दिया। वास्तव में जब हम उच्चारित करते हैं कि भारत कृषि की प्रधानता के चलते ही आगे बढ़ सकता है, तब उतनी ही गति से यदि शासन स्तर पर विचार किया जाता तो किसान के समक्ष आज के जितनी कठिन स्थिति निर्मित नहीं होती। किसान को अन्नदाता और भूमिपुत्र कहकर बड़े बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन देश के राजनेता किसानों की दशा के बारे प्रारंभिक जानकारी भी नहीं रखते। इसका प्रमाण इससे भी मिल जाता है कि हमारे राजनेता कभी आलू से सोना बनाने की मशीन लगाने की बात करते हैं तो कोई नेता गमलों में गोभी उगाकर करोड़पति बन जाता है।

हमारे देश का किसान आज भी बहुत भोला है, उसे राजनीति नहीं आती। उसे जैसा बोल दिया जाता है वह वैसा ही मान लेता है। अब किसान आंदोलन को ही ले लीजिए, इसमें केवल आशंकाएं ही निर्मित की जा रही हैं। मात्र संदेह के आधार पर राजनीतिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किसानों को भ्रमित किया जाना किसानों के साथ तो अन्याय है ही, साथ ही देश के साथ भी बड़ा धोखा है। यह बात सही है कि आज किसान दुखी है, लेकिन इस दुख के लिए हमारी 70 वर्ष की शासन व्यवस्था ही जिम्मेदार है। हमारे देश के किसानों ने भी नए-नए प्रयोग करके अपनी उपज तो बढ़ा ली, लेकिन भूमि पर इसके जो दुष्परिणाम हुए हैं, उसके कारण कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ है। देश में कहीं कम तो कहीं ज्यादा फसल उत्पादन भी असमानता पैदा करता है। अभी जो कानून केंद्र सरकार द्वारा लाया गया है, उसकी पूरी जानकारी भी किसानों को नहीं है। वास्तविकता यह है कि इन कानूनों से वे लोग प्रभावित हो रहे हैं, जो बिचौलिए यानी दलाली का काम करते हैं। यही दलाल लोग किसानों को भड़का रहे हैं। जबकि छोटा किसान इन कानूनों के माध्यम से सुरक्षित हो रहा है, उसे जहां उचित कीमत मिलेगी वहां अपनी फसल बेचने का अधिकार होगा। सरकार द्वारा निर्धारित कीमत से कम में खरीदने वाले व्यापारियों के खिलाफ कठोर कार्यवाही का भी प्रावधान इन कानूनों में किया गया है।

कांग्रेस शासित राज्य पंजाब से प्रारंभ हुए किसान आंदोलन को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करने के लिए किसान संगठनों ने राजनीतिक दलों से समर्थन लेकर भारत बंद का नारा दिया है। इसे नारा इसलिए कहा गया है कि इस भारत बंद को वे ही राजनीतिक दल समर्थन कर रहे हैं, जो या तो नेपथ्य में जा चुके हैं या फिर जिनकी राजनीति केवल भाजपा विरोध पर ही आधारित है। इसमें जो किसान आंदोलन कर रहे हैं, उनकी मांगों पर मंथन किया जाना आवश्यक है, लेकिन किसान जिस प्रकार से अड़ियल रवैया अपनाए हैं, वह मंथन पर पूरी तरह से विराम स्थापित कर रहे हैं। कहा जाता है कि जब किसी आंदोलन में राजनीतिक स्वार्थ का विचार हावी हो जाता है तब उसकी दिशा बदल जाती है और परिणाम भी सार्थक दिखाई नहीं देता।

देश में किसान कानून के विरोध के नाम पर चल रहे राजनीतिक खेल पर उस समय प्रमाणित मुहर लगती दिखाई दी, जब 20 छोटे बड़े राजनीतिक दलों ने भारत बंद का समर्थन कर दिया। मात्र आशंकाओं के आधार पर किए जा रहे इस किसान आंदोलन को लेकर सवाल तो उस समय ही खड़े हो गए थे, जब खालिस्तान समर्थक विदेशी ताकतों ने इसका समर्थन कर दिया। स्वाभाविक ही है कि आज विश्व के कई देश भारत की बढ़ती ताकत से परेशान हैं। इसलिए किसी न किसी कारण भारत में ऐसी स्थितियां पैदा करने के प्रयास किए जा रहे हैं, जो राजनीतिक अस्थिरता का कारण बन सके। इसके लिए वो ताकतें भी जिम्मेदार मानी जा रही हैं, जो अपनी गलत नीतियों के कारण राजनीतिक पराभव के दौर से गुजर रहीं हैं। इसलिए इस आंदोलन को किसान आंदोलन कम, राजनीतिक आंदोलन ज्यादा माना जा रहा है।

देश के किसानों को चाहिए कि वह किसी की बातों में न आकर पहले इन कानूनों का अध्ययन करे और फिर किसी निष्कर्ष पर पहुंचे। अभी जो आंदोलन किया जा रहा है, उसके चलते अगर किसान कानून वापस भी हो जाए तो इससे छोटे किसानों को कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन किसानों के नेता बने बड़े व्यापारी जरूर फायदे में रहेंगे। जैसी आशंका प्रचारित की जा रही है कि सरकार खेती को देश के बड़े उद्योगपतियों को देने जा रही है, यह आशंका ही निर्मूल है। क्योंकि इस कानून में ऐसा कुछ भी नहीं है। इस कानून को लेकर देश में वैसा ही भ्रम फैलाने का प्रयास किया जा रहा है, जैसा नागरिकता कानून के बारे में फैलाया गया था। उस कानून में केवल विदेशी घुसपैठियों को बाहर निकालने की ही बात थी, लेकिन राजनीतिक दलों ने देश के नागरिकों के समक्ष ऐसा भ्रम उपस्थित किया कि यह मुसलमानों को बाहर निकालने का कानून है। ऐसा ही खेल कृषि कानूनों को लेकर खेला जा रहा है। सुनने में तो यह भी आ रहा है कि इस किसान आंदोलन में पर्दे की पीछे शाहीन बाग के षड्यंत्रकारी भी भूमिका निभा रहे हैं।

देश के किसानों को चाहिए कि वह सही और गलत की पहचान करे। क्योंकि हमने देखा है कि जबसे कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर हुई है तब से कांग्रेस और वामपंथी दल ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास कर रहे हैं, जो देश को अस्थिर कर सकते हैं। चाहे वह पुरस्कार वापसी का मामला हो या फिर जेएनयू का देश विरोधी छात्र आंदोलन। सवाल यह भी उठ रहा है कि वामपंथी राजनीति देश को भ्रमित क्यों कर रही है और कांग्रेस इसका आंख बंद करके समर्थन क्यों कर रही है? आज देश के लिए एक अच्छी बात यह है कि देश में केंद्र सरकार ने शासन स्तर पर कोई भ्रष्टाचार नहीं किया। केंद्र सरकार आज एक बड़ी आशा का केंद्र बनती जा रही है। विपक्षी दलों को कोई मुद्दा नहीं मिल रहा है। इसलिए वह जबरदस्ती मुद्दे बनाने का प्रयास कर रहे हैं। किसान आंदोलन भी उसी रणनीति का हिस्सा है।

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