प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता संभालने के बाद बदल गया है राजनीति का तौर तरीका

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अजय कुमार

उत्तर प्रदेश में शिक्षक कोटे की जिन छहः सीटों पर चुनाव हुए उसमें से तीन पर भाजपा और एक पर सपा उम्मीदवार जीता। दो निर्दलीय शिक्षक प्रत्याशियों ने भी जीत दर्ज की। कांग्रेस प्रत्याशियों को यहां भी शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा।

भारतीय जनता पार्टी ने सियासत का तौर-तरीका ही बदल दिया है। अब पार्टी घिसे-पिटे मापदंडों पर नहीं चलती है। बल्कि उसका सारा फोकस इस बात पर रहता है सभी क्षेत्रों में कैसे पार्टी का जनाधार बढ़ाया जाए। अब भाजपा नगर निगम, शिक्षक/स्नातक क्षेत्र के विधान परिषद से लेकर पंचायत तक के चुनाव जीतने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा देती है। चुनाव किसी भी स्तर का हो भाजपा के दिग्गज नेता चुनाव प्रचार के लिए मैदान में कूद पड़ते हैं। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे नामी नेता यदि हैदराबाद नगर निगम के चुनाव में प्रचार करने के लिए पहुंच जाते हैं तो भाजपा के जुझारूपन का अंदाजा लगाया जा सकता है। इसका भाजपा को परिणाम भी अच्छा मिलता है इसीलिए तो हैदराबाद नगर निगम में पिछली बार मात्र चार सीटें जीतने वाली भाजपा इस बार धमाकेदार प्रदर्शन करते हुए 48 पर पहुंच गई।

यही नजारा उत्तर प्रदेश में 11 सीटों पर हुए शिक्षक एवं स्नातक विधान परिषद के चुनाव में देखने को मिला। भाजपा ने शिक्षकों की राजनीति को दलीय राजनीति में बदल दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि दशकों से शिक्षक के हितों के लिए बने संगठन कमजोर होकर लगभग हाशिये पर पहुंच गए। इस संबंध में जब भाजपा से पूछा गया तो उसका बेहद साफगोई से कहना था हम शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए कई स्तरों पर बड़ा बदलाव करना चाहते हैं। यह बदलाव तभी हो सकता था जब हम शिक्षकों के बीच हमारा प्रतिनिधि हो। हम सियासी रूप से मजबूत हों। इसीलिए हमने शिक्षक/स्नातक विधान परिषद चुनाव में अपने प्रत्याशी उतारे, जिन्हें बड़ी संख्या में शिक्षकों का समर्थन भी मिला और हमारे प्रत्याशी जीतने में सफल रहे। शिक्षक कोटे की जिन छहः सीटों पर चुनाव हुए उसमें से तीन पर भाजपा और एक पर सपा उम्मीदवार जीता। दो निर्दलीय शिक्षक प्रत्याशियों ने भी जीत दर्ज की। कांग्रेस प्रत्याशियों को यहां भी शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। अब उच्च सदन में शिक्षक दलों का संख्या बल पांच से सिमट कर दो पर आ गया है।

बहरहाल, यह भाजपा की सोच है, इसके उलट ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो भाजपा के विचारों से इत्तेफाक नहीं रखते हैं। दशकों से शिक्षक राजनीति में अपना सिक्का जमाए रहने वाले उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ के ओम प्रकाश शर्मा जिन्हें लगातार आठ बार एमएलसी का चुनाव जीतने के बाद इस बार भारतीय जनता पार्टी के चलते हार का सामना करना पड़ा तो श्री शर्मा तिलमिला गए। उन्होंने इसे शिक्षक राजनीति का काला दिवस बता दिया। शर्मा का साफ कहना है कि भाजपा ने योग्य शिक्षकों को सदन से दूर रखने के लिए षड्यंत्र किया है। ओम प्रकाश की ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अस्सी के दशक में मुख्यमंत्री रहते हुए जब श्रीपति मिश्र ने उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ की मांगों को ठुकरा दिया था तो ओम प्रकाश शर्मा ने सुलतानपुर से लेकर अमेठी तक पदयात्रा एवं जनसभाएं की थीं। जनसभाओं में शर्मा ने लोगों से कहा था कि आप प्रधानमंत्री (तत्कालीन) इंदिरा गांधी से कहिए कि जैसे स्कूल में आपने अपने बच्चों को पढ़ाया, वैसे ही स्कूल हमारे बच्चों के लिए भी हों। उस समय उन्होंने ‘कृष्ण-सुदामा साथ पढ़ेगें’ का नारा दिया था। बात इंदिरा गांधी तक पहुंची और संघ की लगभग सभी मांगें मान ली गईं थीं। यह तो शर्मा की ताकत की बानगी भर थी। उन्होंने कई मौकों पर शिक्षकों को इंसाफ दिलाने का काम किया था, लेकिन अब यह आवाज उत्तर प्रदेश के उच्च सदन यानी विधान परिषद में नहीं सुनाई देगी क्योंकि शर्मा भाजपा प्रत्याशी से चुनाव हार गए हैं।

वैसे कहने वाले यह भी कहते हैं कि 80-90 के दशक में भले ही ओम प्रकाश शर्मा की शिक्षकों के बीच तूती बोलती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। संघ कई धड़ों में बंट गया है। शिक्षक संघ के अन्य गुट लगातार शर्मा के वर्चस्व को चुनौती देने का प्रयास करते रहे, लेकिन असफल रहे। इस बार भाजपा ने उनके वर्चस्व को तोड़ दिया, बल्कि आने वाले चुनावों में दूसरे शिक्षक संघों के लिए भी बड़ी चुनौती पेश कर दी है। खैर, भाजपा की जीत का सबसे बड़ा तथ्य उसके द्वारा शिक्षकों के वोट बनवाए जाना भी बताया जा रहा है। वहीं यह बात भी चर्चा में है कि शर्मा शिक्षकों की कम बल्कि प्रबंध समिति की राजनीति ज्यादा करने लगे थे। वित्त विहीन कॉलेज के शिक्षकों के लिए भी उन्होंने कोई सार्थक प्रयास नहीं किया, उल्टे शिक्षक-अभिभावक संघ का विरोध किया। जानकारों के मुताबिक जिस तरह भाजपा ने इस चुनाव में जीत हासिल की है, उससे भविष्य की पटकथा भी साफ नजर आ रही है।

शर्मा पर यह भी आरोप लग रहा है कि करीब 44 वर्षों तक उन्होंने शिक्षकों का प्रतिनिधित्व किया, लेकिन अपना उत्तराधिकारी तक नहीं बना पाए। इस बार शर्मा ने लगभग 80 साल की उम्र में नौवां चुनाव लड़ा। आठ बार लगातार जीतने और अपने गुट से स्नातक सीट पर भी प्रत्याशियों की जीत सुनिश्चित कराने वाले शर्मा उत्तराधिकारी तैयार नहीं कर पाए जो शर्मा की बड़ी कमजोरी साबित हुआ। 1990 का चुनाव जीतने के बाद शर्मा ने घोषणा की थी कि यह उनका अंतिम चुनाव है और हरिओम शर्मा उत्तराधिकारी होंगे। बावजूद इसके अगले चुनाव में वह खुद उतर आए। नतीजतन, हरिओम ने दूरी बना ली। यही नहीं, नरेंद्र करुण ने उनसे बगावत कर चुनाव भी लड़ा। नित्यानंद शर्मा भी उनसे दूर हो गए। तीनों को ही 1990 के दशक में शर्मा का उत्तराधिकारी माना जाता था।

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