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देश के अन्नदाता किसान का गुस्सा एक बार फिर उबाल पर है । इस बार किसान मोदी सरकार द्वारा लाए गए नए कृषि कानून 2020 में किए गए प्रावधानों को लेकर गुस्से में हैं। यद्यपि यहाँ पर यह बात भी देखने वाली है कि यह गुस्सा केवल पंजाब के किसानों तक सीमित है।जिन्हें थोड़ा सा समर्थन हरियाणा के किसानों से तो कुछ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों से मिल रहा है। जबकि इसी समय यह भी सुखद समाचार है कि मध्य प्रदेश के किसानों ने नए कृषि कानूनों के आधार पर दस करोड़ रुपये कमाए हैं। स्पष्ट है कि पंजाब में कांग्रेस की सरकार होने के कारण विरोध कुछ अधिक करवाया जा रहा है। कहने का अर्थ है कि जो लोग संसद में इन कानूनों को बनने से नहीं रोक सके, वह अब सड़क पर किसान आंदोलन को अपना समर्थन देकर सरकार विरोधी माहौल बनाने में लगे हैं । इसी समय कांग्रेस के एक पूर्व प्रवक्ता ने यह कहकर स्थिति को और भी अधिक रोचक बना दिया है कि कांग्रेस ने भी किसानों के साथ हमेशा छल किया है।


वास्तव में किसानों की वर्तमान दुर्दशा के लिए कांग्रेस की सरकारें पहले दिन से ही दोषी रही हैं। कांग्रेस की पहली सरकार जब 1947 में बनी तो उस समय ही ‘कमीशनखोरी’ का प्रचलन देश की राजनीति में जोरदार ढंग से आरंभ हो गया था। ‘जीप घोटाला’ इस बात का प्रमाण है। उस समय प्रत्येक प्रकार से भारतीयता को उजाड़कर और विदेशी कंपनियों से कमीशन लेकर मंत्रियों ने काम करना आरंभ किया था। कांग्रेस की ‘कमीशनखोर’ सरकारों ने भारत के ‘बैलों की जोड़ी’ या ‘गाय – बछड़ा’ के नाम पर वोट तो मांगे पर किसान के इन परंपरागत साथियों को उससे दूर करने की योजना भी बनानी आरंभ कर दी। खेती को ट्रैक्टर से करवाकर और आस्ट्रेलिया जैसे देशों से यूरिया खाद मंगाकर भारत की भूमि को बंजर करने का अभियान सरकारी स्तर पर जोर शोर से किया गया । धीरे-धीरे किसान को यूरिया का आदी बना दिया गया। जिस समय अमेरिका से भारत में खेती के लिए ट्रैक्टर को मंगाया जा रहा था ,उस समय आइंस्टीन ने कहा था कि ट्रैक्टर भारत को अगले 50 वर्ष में बर्बाद कर देगा। आइंस्टीन की बात आज सार्थक सिद्ध हो रही है । पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खेती तो निश्चित रूप से इस समय लगभग बंजर होने की अवस्था में जाती हुई दिखाई देने लगी है । क्योंकि यहां पर एक बीघा खेत में ही किसान साल भर में कई – कई कट्टे लगाकर फसल उत्पादन ले रहा है । जबकि अब से 30 – 40 वर्ष पहले एक बीघा में मात्र 5 किलो यूरिया से ही बहुत अच्छी फसल किसान लेता था । इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि वर्तमान में भूमि बिना यूरिया खाद के अनुर्वर अर्थात बंजर भूमि हो चुकी है । इसी अनुर्वर हो गई भूमि के कारण किसान बेतहाशा होकर आत्महत्या कर रहा है। यहां पर यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि यूरिया जैसे रासायनिक खादों का आस्ट्रेलिया अपने यहां प्रयोग नहीं करता ,परंतु भारत नाम की मंडी में इसे भरपूर मात्रा में खपाता है।
कहने का अभिप्राय है कि किसानों की दुर्दशा के पाप की दोषी भारत की प्रत्येक सरकार रही है। इसमें सारी राजनीति पाप में लिप्त दिखाई देती है। जिस राजनीति के अंतर्गत देश के किसानों को भूगर्भीय जल को समाप्त कर उसके दोहन के लिए प्रेरित किया गया – वह राजनीति भी पापी है। जिस राजनीति ने नालों के द्वारा सारे बरसाती जल को नदियों के माध्यम से समुद्र में पहुंचाने की मूर्खतापूर्ण नीतियां लागू कीं – वह राजनीति भी इसके लिए दोषी है । जिसने यहां पर रासायनिक खादों का प्रयोग करते हुए गायों और बैलों को कुछ जल्लादों के हाथों मरवाने के लिए भूमिका तैयार की – वह भी इसके लिए दोषी हैं। जिन कमीनों ने कोकाकोला जैसी घातक बीमारियों को पैदा करने वाले पेय पदार्थों को भारत में स्थापित करने की दिशा में काम किया और गाय के दूध, छाछ, घी व मक्खन को समाप्त करने की योजना को बल प्रदान किया – वह भी इसके लिए बहुत अधिक दोषी हैं। कुल मिलाकर जो किसान हमारी अर्थव्यवस्था का केंद्र हुआ करता था , उसे अर्थव्यवस्था से बाहर निकालने की सारी राजनीति और राजनीति में लिप्त मूर्ख कमीशनखोर राजनीतिक लोग ही किसान की वर्तमान दुर्दशा के लिए दोषी हैं।
वर्तमान में भी किसानों की समस्याओं को लेकर कोई भी राजनीतिक पार्टी गंभीर नहीं है। केवल राजनीति की जा रही है। भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी हिंदू महासभा कभी इस बात के लिए जानी जाती थी कि वह अपने चिंतन को भारतीयता की धार देकर सरकार का मार्गदर्शन करती थी, परंतु उसने अपने आपको श्री कृष्ण जन्मभूमि, राम जन्मभूमि और काशी विश्वनाथ तक सीमित कर लिया है। उसके पास भी राजनीतिक चिंतन का अभाव है। इसके कुछ नेता इसके राष्ट्रीय कार्यालय से होने वाली आय से अपने परिवारों का गुजारा कर रहे हैं तो कुछ ऐसे हैं जो उस आय को हथियाने की जुगत बाहर से बैठे हुए लगा रहे हैं। ये आज भी देश को अखंड करने के नारे लगाते हैं, जबकि स्वयं खंड -खंड हुए पड़े हैं। प्रत्येक मंत्रालय के विशेषज्ञ कभी इस पार्टी के पास हुआ करते थे। परंतु अब यह पार्टी ऐसे लोगों के हाथों में है जिनके पास राजनीतिक चिंतन का पूर्णतया अभाव है। सरकार की नीतियों की निंदा तो लोग करते हैं परंतु समालोचना करते हुए सरकार को अपनी ओर से उच्च मार्गदर्शन देने की क्षमता अब हिंदू महासभा के पास नहीं है। इसके उपरांत भी हिंदुओं के लिए प्रखर राष्ट्रवाद की ध्वजवाहिका हिंदू महासभा को भाजपा रसातल में पहुंचाने के लिए हर संभव प्रयास करती हैं। इसी काम में आरएसएस भी लगा रहता है।


देश में जितने भी धर्मनिरपेक्ष दल हैं, वह सब कांग्रेसी मानसिकता की उपज हैं। ये सभी दल ट्रैक्टर, रासायनिक खादों व गाय बैल को किसान से दूर रखने की नीतियों में विश्वास रखते हैं। उनके पास कोई मौलिक चिंतन नहीं है। कम्युनिस्ट इन सब धर्मनिरपेक्ष दलों के भी ‘बाप’ हैं। उधर भाजपा का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पता नहीं किस रूप में लागू होगा ? यह भी स्पष्ट नहीं है कि उसके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में किसान को उसके मौलिक स्वरूप से जोड़कर गाय को अर्थव्यवस्था के केंद्र में लाने की कोई योजना भी है या नहीं ?
ये ‘कांगी’ और ‘वामी’ भाजपा को नैतिक और राजनीतिक रूप से संसद के भीतर नहीं हरा सके तो देश में आग लगाने के लिए उन्हीं किसानों को भड़काने का काम कर रहे हैं – जिनकी दुर्दशा में इनका सबसे अधिक ‘हाथ’ है । जिस समय सरकार कानून बना रही थी उस समय उस कानून को और भी अधिक उपयोगी बनाने के लिए कैप्टन अमरिंदर सिंह कुछ कर सकते थे, लेकिन उन्होंने नहीं किया। अब वही कैप्टन अमरिंदर सिंह किसानों के साथ खड़े होकर ‘खालिस्तान जिन्दाबाद’ के नारे लगवा रहे हैं। इसे आप क्या कहेंगे ? – सरकार का विरोध या राष्ट्र का विरोध ?
देश का विपक्ष यह भली प्रकार जानता है कि मोदी को वह अभी 2024 के आम चुनावों में भी परास्त नहीं कर पाएंगे । बस ,यही वह कारण है कि विपक्ष संसद में हताश और निराश होकर सड़कों पर लोगों को भड़काने का काम कर रहा है। यदि वास्तव में ही यह लोग किसानों की समस्याओं को लेकर चिंतित हैं तो इस समय सारी राजनीतिक पार्टियां एक स्वस्थ राजनीतिक परंपरा का निर्वाह करते हुए एक मंच पर एक साथ बैठकर यह निर्णय करें कि हम राजनीति की बजाय किसानों के हित में काम करने के लिए एक ऐसी सर्वसम्मत राय प्रस्तुत करते हैं जिससे किसान आंदोलित ना होकर प्रसन्नचित होकर अपने राष्ट्र निर्माण के कार्य में लगा रहे। किसानों के समर्थन में राजनीतिक पार्टियों का आना अच्छी बात कही जा सकती है, परंतु किसानों के मंच पर ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ के लोग दिखाई दें या ‘खालिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाए जाएं या शाहीन बाग में देश विरोधी कार्यों में लिप्त रहे लोग वहां जाकर अपना चेहरा दिखाएं तो समझा जा सकता है कि किसान आंदोलन को कौन लोग जाकर ‘हैक’ करने का प्रयास कर रहे हैं?
मोदी सरकार ने संसद में दोनों सदनों में कृषि कानून से जुड़े तीन विधेयक पारित करवाए थे। जिनमें से पहला विधयेक, कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन सुविधा) विधयेक 2020 है। इसके अनुसार किसान अपनी फसल अपने अनुसार मनचाहे स्थान पर बेच सकते हैं। किसान के इस सुरक्षित अधिकार में कोई भी व्यक्ति हस्तक्षेप नहीं कर सकता । इस प्रकार के प्रावधान उसे सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि एग्रीकल्चर मार्केटिंग प्रोड्यूस कमेटी (एपीएमसी) के बाहर भी फसलों को किसान बेच-खरीद सकते हैं। फसल की बिक्री पर कोई टैक्स नहीं लगेगा, किसान अपनी फसल को ऑनलाइन भी बेच सकते हैं। दूसरा विधेयक, मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तिकरण व संरक्षण) अनुबध विधेयक 2020 है। इसके अनुसार देशभर में कांट्रैक्ट फॉर्मिंग को लेकर व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव है। फसल खराब होने पर कांट्रैक्टर को पूरी भरपाई करनी होगी। किसान अपने दाम पर कंपनियों को फसल बेच सकेंगे। आशा जताई गई है कि इससे किसानों की आय बढ़ेगी। तीसरा विधेयक, आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक 2020 है। आवश्यक वस्तु अधिनियम को 1955 में बनाया गया था। खाद्य तेल, दाल, तिल, आलू, प्याज जैसे कृषि उत्पादों पर से स्टॉक लिमिट हटा ली गई है। अति आवश्यक होने पर स्टॉक लिमिट लगाया जाएगा। इसमें राष्ट्रीय आपदा, सूखा सम्मिलित है। प्रोसेसर या वैल्यू चेन पार्टिसिपेंट्स के लिए ऐसी स्टॉक लिमिट लागू नहीं होगी। उत्पादन स्टोरेज और डिस्ट्रीब्यूशन पर सरकारी नियंत्रण खत्म होगा।
वास्तव में भारत की प्राचीनकालीन कृषि व्यवस्था गौ आधारित कृषि व्यवस्था थी । यही कारण है कि गांव देहात में गाय को आज भी धन के रूप में पुकारा जाता है। धन यह इसीलिए कहीं जाती है कि वह वस्तु विनिमय के काम आती थी। उस समय भारत में पूर्ण स्वायत्तशासी संस्था के रूप में प्रत्येक गांव कार्य करता था। अंग्रेजों ने भारत के स्वायत्तशासी गांव को नष्ट करने की योजना पर काम करना आरंभ किया। इसके लिए उन्होंने अपने राजस्व विभाग में कलेक्टर नाम का एक राक्षस राजस्व वसूल करने के लिए बैठाया । उस कलेक्टर के ऊपर एक कमीशनखोर कमिश्नर बैठाया। आजादी के बाद जब कांग्रेस की सरकार बनी तो उसने खून चूसने वाले कलेक्टर व कमीशनखोर कमिश्नर को गांव का खून चूसने के लिए अपने-अपने स्थानों पर यथावत रखा। जबकि होना यह चाहिए था कि भारत की प्राचीन अर्थव्यवस्था को समझकर प्रत्येक गांव के लिए एक स्वयंसेवी वैद्य नियुक्त किया जाता । वहीं पर अच्छी , ऊंची व राष्ट्र निर्माणपरक शिक्षा देने के लिए अच्छे आचार्यों की प्राचीन कालीन व्यवस्था को जीवित किया जाता। तालाबों को खुदवाकर गांव के पानी को गांव में रोका जाता। गाय के गोबर से अच्छी खाद बनाई जाती और किसानों द्वारा आधुनिक ढंग से खेती करने के लिए अच्छे कृषि वैज्ञानिकों को तैयार किया जाता।


गांव की प्रतिभा को गांव में रोककर उसे वहीं वे सारी सुविधाएं प्रदान की जातीं जो उसे महानगरों में दिखाई दे रही थीं? गांव की प्रतिभाओं को गांवों से निकालकर महानगरों की ओर जिस प्रकार भेजने का सिलसिला 1947 के बाद आरंभ किया गया, उससे कॉलोनाइजरों, भूमाफियाओं और किसान का खून चूसने वाले एक ऐसे वर्ग का उदय हुआ जिसने किसान की भूमि औने – पौने दामों में लेकर कई हजार गुणे मुनाफे पर बेचने का काम आरंभ किया । आज उन्हीं मूर्खतापूर्ण नीतियों के कारण जब किसान आत्महत्या करता हुआ दिखाई दे रहा है तो जो चोर हैं वही शाह बने बैठे यह कह रहे हैं कि किसान यदि आत्महत्या कर रहा है तो अमुक सरकार के कारण कर रहा है।
लेखक स्वयं नोएडा ग्रेटर नोएडा में निवास करता है। जहां भूमाफिया किस्म के लोगों ने किसानों से जमीन यदि 5 लाख बीघा खरीदी तो आगे 15 लाख रुपए में देखकर रातों-रात करोड़पति से अरबपति बनते चले गए। यह सारा खेल कांग्रेस की सरकारों के समय में होता रहा। उस समय प्रदेश में कभी सपा की तो कभी बसपा की सरकार रही। कांग्रेस सपा और बसपा बाहर से दिखावे की लड़ाई लड़ते रहे और भीतर एक ही थैली के चट्टे बट्टे होने का प्रमाण देते रहे। जब बसपा की सरकार आई तो सपा ने उसे भरपूर कोसा। पर जब सपा स्वयं सरकार में आई तो उसने बसपा के किसी घोटाले को उजागर नहीं किया। यही बसपा ने सपा के लिए किया। कुल मिलाकर किसान को चक्की के दो पाटों में पीसने का काम यह दल मिलकर करते रहे। अब भाजपा भी सपा व बसपा के प्रति उदारता का दृष्टिकोण अपना रही है। यही कारण है कि उसने भी यहां के किसानों के साथ अन्याय करने वाले राजनीतिक दलों के लोगों पर हाथ डालने का काम नहीं किया है। इसके उपरांत भी यह बात बहुत अधिक संतोषजनक है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी के प्रयासों से अब किसान और प्राधिकरण के बीच कोई भी बिचौलिया काम करता हुआ दिखाई नहीं दे रहा। जिससे किसान को उसकी भूमि का पूरा मुआवजा मिलने की पहले की अपेक्षा अधिक संभावना हो गई है। श्री मोदी के भय के चलते ये सारे बिचौलिए इस समय पेट पकड़कर रो रहे हैं।
किसान की उपज का सही मूल्य दिलाने के लिए भी ऐसी ही स्थिति उत्पन्न करने की आवश्यकता है।
किसान के लिए यह आवश्यक है कि उसके आलू को कोई बिचौलिया न खरीदे। होना यह चाहिए कि किसान के 50 पैसे के आलू से जो चिप्स बनाने वाला व्यक्ति ₹50 कमा रहा है, वह किसान को 50 पैसे के स्थान पर ₹10 अवश्य दे और उसके बाद भी यह व्यवस्था हो कि चिप्स बनाने की कंपनी में किसान के परिवार से भी लोगों को नौकरी पर रखवाया जाए।
मोदी जी को न्यूनतम समर्थन मूल्य की नीति में विश्वास न रखकर किसानों को उसकी उपज का संतोषजनक नहीं बल्कि सम्मानपूर्ण जीवन जीने के लिए अपेक्षित मूल्य दिलवाने की दिशा में कार्य करना चाहिए।
‘मोदी है तो मुमकिन है’ का नारा निश्चित रूप से बहुत सार्थक है और हम यह आशा करते हैं कि प्रधानमंत्री किसानों को उनकी उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य न देकर 50 पैसे के आलू को ₹10 में बिकवाने की कारगर रणनीति लागू करेंगे। इस दिशा में नई कृषि नीति लागू करने के लिए देश के सभी राजनीतिक दलों को भी सरकार का समर्थन करने के लिए अपने सुझाव प्रस्तुत करने चाहिए। देश के सभी राजनीतिक दलों को यह स्पष्ट कानून बनवाने में भी सहायता करनी चाहिए कि गायों का वध देश में नहीं होगा और गायों के दूध से तैयार छाछ को इस देश का ‘राष्ट्रीय पेय’ घोषित कराया जाएगा। जब देश के हर ढाबे पर गाय के दूध की छाछ मिलेगी और पेप्सी व कोकाकोला वहां से नदारद हो जाएंगे तो न केवल गाय को पालने के लिए किसान प्रेरित होगा बल्कि उसकी छाछ से उसे बड़ा लाभ भी मिलेगा। तब किसान को पराली जलाने के लिए भी बाध्य नहीं होना पड़ेगा और एनसीआर जैसे क्षेत्र में जिस प्रकार प्रत्येक वर्ष पराली का प्रदूषण फैलता है उससे भी मुक्ति मिल जाएगी।
क्या देश के राजनीतिक दलों को राजनीति की कीचड़ इतना स्वस्थ निर्णय लेने के लिए प्रेरित करेगी ? हमें नहीं लगता कि ऐसा हो पाएगा ।क्योंकि जो लोग ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’, ‘शाहीनबाग’ और ‘खालिस्तान जिंदाबाद’ के नारों को किसानों के पवित्र मंच से लगवाने का काम कर रहे हैं, उनकी सोच इतनी ऊंची और पवित्र नहीं हो सकती कि वे किसानों के वास्तविक शुभचिंतक के रूप में अपने आपको प्रस्तुत कर राष्ट्रीय सोच के साथ कोई स्वस्थ निर्णय ले पाएंगे।
इस समय देश के किसानों और किसान संगठनों को भी अपनी ओर से यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि वह अपनी लड़ाई लड़ने के लिए स्वयं सक्षम हैं। कोई भी देश विरोधी नेता या संगठन या राजनीतिक दल उनके मंच का दुरुपयोग देश की एकता और अखंडता को खतरे में डालने के लिए नहीं कर सकता। देश की एकता और अखंडता के लिए सदा जागरूक रहकर काम करने वाले किसान की उचित मांगों के सामने सरकार को भी झुकना चाहिए, परंतु ध्यान रहे कि देश की एकता और अखंडता से खिलवाड़ करने वाले तत्वों की पहचान भी इस समय होनी चाहिए और भूलकर भी सरकार को उनके सामने झुकना नहीं चाहिए।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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