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विकास की मरीचिका में फंसा हुआ देश

प्रो. कुसुमलता केडिया

लेख का शीर्षक शायद अटपटा लगे, क्योंकि हम सभी – सामान्य जन हों या अर्थशास्त्री, पत्रकार हों, राजनेता या प्रशासक, इतिहासकार हों या समाजशास्त्री या वैज्ञानिक – हम सभी इस बहस में उलझे हैं कि देश का विकास कैसे हो? इसे सबके लिए उपलब्ध कराने हेतु कौन सा मार्ग अपनाया जाय? पूंजीवादी, समाजवादी या मिश्रित अर्थव्यवस्था? यह विकास कृषि के द्वारा किया जाना समीचीन होगा या उद्योग द्वारा? उद्योग कौन से हों – भारी आधारभूत उद्योग या लघु, कुटीर उद्योग गांधीवादी मार्ग प्रशस्त है या नेहरुवादी मार्ग निर्यात पर आधारित विकास उचित होगा या आत्मनिर्भर, स्वत: स्फूर्त विकास? कितना योगदान हो इसमें सरकार का, विदेशी पूंजी का, देश के बड़े औद्योगिक घरानों का, और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का? तकनीक के मामले में भी माथापच्ची चल रही है-इंटरमीडिएट तकनीक हो या शुमाखर की स्मांट इज ब्युटीफुल की अवधारणा, या सीधे से कंप्यूटर युग में चले जाना चाहिए- यानी कि तकनीक को ही अपना मुख्य आधार बनाकर सभी आर्थिक, गैर आर्थिक अवरोधों को एक ही झटके में पार कर जाना।

अखबार उठा लीजिए या पत्रिकायें, हो या रेडियो, यूनिवर्सिटी के सेमिनार में जाइये या कलास रूम में, राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय विद्वानों के कान्फ्ररेंस में, नेहरूवादी कांग्रेस हो या गांधीवादी, वामपंथी मोर्चा हो या तथाकथित दक्षिण पंथी भारतीय जनता पार्टी-चिंतायें एक है आखिर विकास हो तो कैसे? कौन सा मार्ग श्रेयस्कर है? अर्थशास्त्री की भाषा में कौन सी रणनीति चुनी जाय- ट्रिकिल डाउन थ्योरी, फ्रन्टल अटैक आंन पावर्टी, बिग पुश स्ट्रेटजी ऑफ प्रो. रोजेन्स्टीन रोडान या लिबिनस्टीन्स का क्रीटिकल मीनिमम एफर्ट, हैरोड-डोमर का टू सेक्टर मॉडल या महालनोबिस का फोर सेक्टर मॉडल, प्रो. ए. ओ. हिशमैन की अनबैलेन्स्ड ग्रोथ स्ट्रेटजी या प्रो. रेगनर नरक्स की बैलेन्स्ड ग्रोथ स्ट्रेटजी।

कहीं पर जरा भी शंका नहीं है विकास की संभावनाओं के बारे में, उसके यथार्थ के विषय में। कहीं भी यह प्रश्न नहीं उठता कि यह अर्थहीन प्रलाप क्यों? क्योंकि अन्तर्निहित मान्यता है कि विकास या यों कहें कि आर्थिक विकास न केवल वांछनीय है वरन् प्राप्य भी है। समस्या केवल सही रास्ते की तलाश की है। इस गंभीर छलावे और मृगमरीचिका के लिए जितने उत्तरदायी हैं निहितस्वार्थ उससे भी ज्यादा है औपनिवेशिक एकेडमिक ढांचा और उससे उपजा पाश्चात्य अर्थशास्त्र। विशेषत: आर्थिक विकास के सिद्धांत और उन सिद्धांतों के प्रणेता। जांन मेनार्ड कीन्स के शब्दों में ‘लोगों के दिमाग पर विचारों का प्रभाव अत्यधिक है। विचार चाहे गलत हो या सही, उसकी शक्ति एवं प्रभाव का अनुमान लोग शायद ही लगा पाते हैं। वस्तुत: इस दुनिया को कुछ चलाता है तो विचार- सही हो या गलत।’

अब यह नितांत आवश्यक हो गया है कि मान्यताओं का बहुत बारीकी से विश्लेषण किया जाय क्योंकि इंसा मान्यताओं का सीधा ताल्लुक हमारे जीवन से है। जब हम आर्थिक विकास की बात करते हैं तो हमारे दिमाग में ऐसे ही विकास का स्तर रहता है जो इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी या अमेरिका जैसे पूंजीवादी देशों ने प्राप्त किया है या जिसका दावा कुछ समय पहले तक सोवियत संघ करता था।

आजादी के साथ ही जवाहरलाल नेहरू ने इन दोनों वादों का मिश्रण अपनाया जिसे वे मिश्रित अर्थव्यवस्था कहते थे। इसमें पूंजीवाद के उपभोग स्तर को समाजवाद के तरीकों से प्राप्त करने की कोशिश की गयी। नेहरू जी के सपनों के भारत के लिए रोटी, कपड़ा और मकान भर ही जरूरी नहीं था। वह तो कैचिंग-अप या कैचिंग-अप विद दी वेस्ट का सपना देखते थे। यानी हमें पश्चिम के बराबर आना है। 30 साल में वह सब कर लेने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा नेहरू ने देश के लिए, जो इंग्लैंड ने पौने दो सौ साल में किया, फ्रांस ने सवा सौ साल में और संयुक्त राज्य अमरीका ने सौ साल में।1 भारत को न केवल सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, मामलों में जगतगुरु बनाना था, वरन् आर्थिक मामलों में भी सबसे आगे जाना था या कम से कम आगे वालों के समक्ष खड़ा होना था और वह भी बहुत जल्दी। यहां एक बात कहना आवश्यक है कि आजादी मिलने के समय न केवल नेहरू बल्कि तीसरी दुनिया के अधिकांश देशों के उस समय के राजनीतिक नेतृत्व ने अपने समक्ष आर्थिक विकास के इन प्रतिमानों का आदर्श बहुत जोर शोर से खड़ा करके रखा था। क्योंकि जैसा कॉल हैरिसन ने कहा है कि इनमें से अधिकांश नेता ऑक्सफोर्ड और कैंम्ब्रिज के प्रोडक्ट थे। इनकी मानसिकता के लिए उन्होंने फिक्सेशन विद दी वेस्ट शब्दों का इस्तेमाल किया है। यानी कि पश्चिम की चकाचौंध से अभिभूत। यह कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि यदि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिदृश्य की तीन-चार सच्चाइयों को ध्यान में रखा गया होता तो बहुत पहले ही आम आदमी भी यह बात समझ चुका होता की पश्चिमी देशों जैसे आर्थिक विकास असंभव क्यों हैं?

किसी भी प्रकार का आर्थिक विकास हो – कृषिजन्य या औद्योगिक, पूंजीवादी या समाजवादी, आर्थिक संसाधनों का उपलब्ध होना परम आवश्यक है। वे सभी पाश्चात्य देश, जिनके आर्थिक विकास का हम अनुसरण करना चाहते हैं, तब तक अत्यंत पिछड़ी अवस्था में थे जब तक उन्हें पर्याप्त मात्रा में संसाधन उपलब्ध नहीं हुए। यह संसाधन नहीं उपलब्ध होने लगे नयी दुनिया (उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिकी महाद्वीप एवं ऑस्ट्रेलिया) एवं एशियाई, अफ्रीका देशों की खोज के बाद। जब तक पाश्चात्य जगत इनके संसाधनों, इनकी तकनीक, इनके ज्ञान विज्ञान एवं श्रम शक्ति से अछूते था, अनजान था, वह अंधकार युग में पड़ा रहा। आधुनिक शोधों से यह तथ्य, जो अब तक विवादित था, सत्य सिद्ध हो चुका है कि यूरोप में सभी प्रकार के परिवर्तनों की शुरुआत तेरहवीं सदी के अंत में, मार्कोपोलो के यात्रा के बाद हुई। कोलम्बस एवं वास्को-डि-गामा, मार्को पोलो की कहानियों से प्रेरित होकर भारत की खोज में निकले थे, तथा क्रमश: नयी दुनिया एवं पुरानी दुनिया के संपर्क में आये। कोपरनिकस एवं गैलीलियो ने मार्को पोलो के बाद ही सौरमंडल एवं धरती गोल है की अवधारणा दी।

इसके पहले यूरोपवासियों को विश्वास था कि धरती चपटी है और यदि ज्यादा दूर निकल गये तो लुढ़क पड़ेंगे। यूरोप के जिस देश को, जिस भी शताब्दी में, इस संपर्क से संसाधनों की सबसे ज्यादा प्राप्ति हुई, बह देश उस युग में सबसे शक्तिशाली देश बना, और वही उस देश का स्वर्णिम काल कहलाया। जैसे, 16वीं शताब्दी में स्पेन, पुर्तगाल, 17वीं में हॉलैंड, अठारहवीं के बाद इंग्लैंड, एवं बीसवीं शताब्दी में आकर संयुक्त राज्य अमेरिका। मध्य 18वीं शताब्दी में इंग्लैंड में हुए औद्योगिक क्रांति का निर्विवाद कारण था अत्यंत बड़ी मात्रा में संसाधनों की उपलब्धि – एक ऐसी उपलब्धि जिसके बदले में इंग्लैंड को कुछ नहीं देना था। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे कहते हैं औपनिवेशिक संसाधनों का एकतरफा हस्तांतरण।

यदि इंग्लैंड के पिछले दो वर्ष साल के इतिहास में केवल एकतरफा हस्तांतरण के तथ्य को निकाल दिया जाय तो समस्त वैज्ञानिक आविष्कारों एवं तकनीकी क्रांतियों के बावजूद, गाड़ी वहीं खड़ी मिलेगी। इसी प्रकार यदि फ्रांस, जर्मनी, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका के आर्थिक विकास के इतिहास से मात्र इस तथ्य को घटा दिया जाय तो बचेगा बस एक बड़ा शून्य। सारे वैज्ञानिक एवं तकनीकी आविष्कार धरे रह जाते यदि उपलब्ध न होती भयंकर मात्रा में लूटी हुई पूंजी, कच्चे माल और जबरन छीना हुआ बाजार एवं श्रम शक्ति।

तीसरी दुनिया के देशों ने अपनी राजनैतिक आजादी के बाद जब आर्थिक पुनरुत्थान व पुनर्निर्माण की बात सोची तब इस तथ्य को पूरी तरह भुला दिया गया। जो अर्थशास्त्र के विकास के सिद्धांतों, मॉडलों एवं अवधारणाओं से अपरिचित हैं उन्हें शायद विश्वास ही ना हो कि ऐसा भी संभव है। अर्थशास्त्रियों द्वारा यह मान लिया गया, बिना कहीं लिखे, कि संसाधन पर्याप्त मात्रा में, अनवरत एवं उचित मूल्यों पर विकासशील देशों को उपलब्ध हैं एवं जरूरत केवल देश की अ आवश्यकतानुसार इसके उपयोग करने की है। यदि कोई संसाधन देश में उपलब्ध नहीं है तो उसे बाहर से आयात किया जा सकता है। व आयातों का मूल्य निर्यातों से चुका दिया जायेगा।

इसी भूल की सजा पा रहा है न केवल भारत बल्कि तीसरी दुनिया के अनेकानेक देश। अगर यह विचार किया गया होता कि जो संसाधन आज के विकसित देशों को उपलब्ध हुए पिछले डेढ़ सौ सालों से लगातार इतनी विपुल मात्रा में कि उन्होंने आर्थिक विकास के चकाचौंध करने वाले स्तरों को प्राप्त कर लिया- वे संसाधन आखिरी आये कहां से थे? तो जवाब मिलता तीसरी दुनिया के देशों की भौगोलिक सीमाओं के अंदर से। यदि यहां भी प्रश्न पूछा गया होता कि क्या संसाधन उतनी ही बड़ी मात्रा में समस्त मानव जाति के विकास के लिए उपलब्ध है? तो जवाब मिलता नहीं। और साथ ही यह कि इनमें से अधिकांश नान-रिन्यूएबिल हैं- यानी कि जो खनिज, जो कोयला, पेट्रोलियम आज इस्तेमाल हो चुके हैं वो अगले सौ पचास या हजार-दो-हजार साल में तो प्रकृति पुन: बनाकर देने से रही। उत्तरी अमेरिका एवं पश्चिमी यूरोप दोनों मिलकर दुनिया का करीब दो तिहाई आयातित खनिज तेल, खनिज संसाधनों का करीब तीन चौथाई, अलौह धातुओं का करीब ⅘ हिस्सा इस्तेमाल कर लेते हैं। 1975 में विश्व की संपूर्ण ऊर्जा की आधी खपत सिर्फ अमेरिका और पश्चिमी यूरोप में होती थी। अद्र्ध विकसित देशों ने 1970 में यद्यपि विश्व के एक तिहाई खनिज का उत्पादन किया जबकि उपभोग केवल 6 प्रतिशत का ही कर सके। उनके उत्पादन का ⅘ हिस्सा पश्चिम को निर्यात हो गया। पश्चिमी यूरोप के देश 1950 में अपने कुल खनिज आवश्यकता का 65 प्रतिशत आयात कर रहे थे, जो 1970 में बढ़कर 73 प्रतिशत हो गया। इसी समयावधि में जापान में इस्तेमाल होने वाले आयातित खनिज का प्रतिशत 17 से बढ़कर 89 हो गया। पिछले 20 सालों में नान रिन्यूएबिल संसाधनों की खपत चक्रवृद्धि दर से बढ़ी है। संयुक्त राज्य अमेरिका के ब्यूरो ऑफ माइंस के अनुमान के अनुसार चांदी, मरकरी, फलूरोस्पर, लिड, टिन, जिंक, कॉपर, टंगस्टन, बॉक्साइट, सल्फर, एंटीमनी, टिटेनियम, मैग्नीज आदि महत्वपूर्ण खनिज पदार्थों का सुरक्षित भंडार अब समाप्ति की ओर है। जो बचा है वह इतना महंगा है कि वह चंद विकसित देशों की आवश्यकताओं को ही पूरा नहीं कर पायेगा।

अब ये आंकड़े लिमिट्स टू ग्रोथ, दी क्लोजिंग सर्किल जैसे अनेकानेक महत्वपूर्ण दस्तावेजों के प्रकाशन के बाद जनसामान्य तक पहुंच गये हैं, लेकिन अभी भी विकास के सभी आर्थिक सिद्धांत, मॉडल एवं अवधारणाएं संसाधनों की उपलब्धता के प्रश्न को पूरी तरह नजरअंदाज कर रहे हैं। नेहररूवादी आर्थिक मॉडल की सबसे बड़ी खामी यही थी कि आर्थिक विकास के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को तो टाइप कर लिया गया किंतु उसके लिए आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता के प्रश्न की पूरी तरह उपेक्षा की गयी। आज भारत एवं तीसरी दुनिया के अन्य देशों को आर्थिक विकास के वे प्रतिमान भी यदि प्राप्त करने हैं जो आज से करीब 50 साल पहले के इंग्लैंड, अमेरिका को प्राप्त है (1990 के प्रतिमान नहीं) तो उसके लिए भी जिस मात्रा में संसाधनों की आवश्यकता होगी, वह इन देशों में तो छोडि़ए अब पृथ्वी पर ही उपलब्ध नहीं है।

यदि संसाधन ही अनुपलब्ध हैं तो तय है कि वैसा और उतना विकास संभव नहीं है। इसी से अभिन्न रूप से जुड़ा एक और मसला है प्रकृति की अनिर्बन्ध आर्थिक विकास को ढो पाने की क्षमता। इस तथ्य को कुछ अर्थशास्त्रियों ने वाह्य अमितव्ययिता की अवधारणा से समझाने का प्रयास किया है कि इस तथ्य के कारण किस प्रकार विकासशील देशों के विकास की लागतें कई गुना बढ़ गयी है। इस विषय पर भी अनेकानेक महत्वपूर्ण दस्तावेज सब चुके हैं जो पूरी तरह से स्पष्ट करती है कि क्यों तीसरी दुनिया की सामान्य जनता को आप तो रोटी, कपड़ा, मकान मिलना भी कठिन है, पाश्चात्य उपभोग प्रतिमानों की बात तो दूर रही। हां, इन देशों की 1 से 5 प्रतिशत जनता को अत्यंत उच्च उपभोग स्तर प्रदान किया जा सकता है, यदि शेष 95 से 99 प्रतिशत लोगों की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति की समस्त संभावनाओं को भी बंद कर दिया जाय।

अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक जगत की कुछ सच्चाइयां है जिनका भारत के विकास से गहरा ताल्लुक है। जिनकी अनदेखी आर्थिक विकास के सभी वर्तमान सिद्धांत करते हैं। सभी सिद्धांत बंद अर्थव्यवस्था की मान्यता पर आधारित किये गये हैं। वे केवल आंतरिक तथ्यों को ही शामिल करते हैं, बाह्य तथ्यों को नहीं। यदि इन बाह्य तथ्यों में से कुछ को ही काबिलेगौर समझा गया होता- व्यापार की शर्तें, पूंजी का अंतर्राष्ट्रीय आवागमन, अंतर्राष्ट्रीय वित्त बाजार, ब्याज की दरें इत्यादि, तो अर्थशास्त्र की बिना किसी विशिष्ट जानकारी के यह स्पष्ट होता है कि पश्चिमी जैसा और जितना आर्थिक विकास तीसरी दुनिया के लिए मात्र मृगमरीचिका है और कुछ नहीं।

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