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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

योगी आदित्यनाथ की स्पष्टवादिता और जिन्नाहवादी ओवैसी

 

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जिस प्रकार अपनी स्पष्टवादिता के आधार पर राजनीति में अपना स्थान बनाते जा रहे हैं, उससे उनके प्रशंसक उनमें देश के भावी प्रधानमंत्री की छवि देखने लगे हैं । वास्तव में किसी भी प्रकार की तुष्टीकरण की नीति का जब तक देश के राजनेता मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अंदाज में विरोध नहीं करेंगे और देश विरोधी लोगों को सरदार पटेल की भान्ति कड़क जवाब देना नहीं सीखेंगे, तब तक देश की अनेकों समस्याएं यथावत बनी रहेंगी। देश विरोधी लोगों को कठोर शब्दों में कठोर संदेश देना राजनीति और राजनीतिज्ञों के लिए अनिवार्य होता है। यह गुण योगी आदित्यनाथ जी के भीतर पर्याप्त मात्रा में दिखाई दे रहा है। वह सरदार पटेल की सी कठोरता और सावरकर जी जैसी स्पष्टवादिता को लेकर राजनीति में आगे बढ़ रहे हैं। यही कारण है कि असदुद्दीन ओवैसी हो या फारूक अब्दुल्लाह हो या फिर कोई और देश विरोधी बयान देने वाला नेता हो – वह सबको एक जैसी भाषा में कठोर और स्पष्ट उत्तर देते हैं। उन्हें राष्ट्रहित में जो कुछ कहना होता है उसे भी वह स्पष्ट शब्दों में निस्संकोच कहते हैं। किसी प्रकार की राजनीतिक लागलपेट की भाषा योगी आदित्यनाथ नहीं रखते। यही कारण है कि वह देश के लोगों में तेजी से लोकप्रिय होते जा रहे हैं।
पिछले दिनों योगी आदित्यनाथ हैदराबाद गए तो उन्होंने वहां जाकर देश के इस ऐतिहासिक नगर का नाम भाग्यनगर रखने की बात पर बल दिया। जिस पर असदुद्दीन ओवैसी को मिर्ची लगी और उन्होंने कहा कि एक पीढ़ी गुजर जाएगी पर हैदराबाद का नाम भाग्यनगर नहीं हो पाएगा। पर अब असदुद्दीन ओवैसी जैसे लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि जो लोग यह कहा करते थे कि धारा 370 को यदि हटाने की बात की गई तो खून की नदियां बह जाएंगी या यदि ऐसा किया गया तो कश्मीर में एक भी व्यक्ति भारत का झंडा उठाने वाला नहीं मिलेगा, आज समय ने जैसे उनको उत्तर दे दिया है वैसे ही असदुद्दीन ओवैसी को भी एक दिन अपने कहे का जवाब मिल जाएगा, जब हैदराबाद का नाम भाग्यनगर होगा।
यहां पर मैं यह भी स्पष्ट करना चाहूंगा कि हिंदू महासभा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की हैदराबाद में अब से लगभग 2 वर्ष पूर्व एक बैठक हुई थी, जिसमें वहां के तत्कालीन राज्यपाल महोदय को पार्टी ने अपना ज्ञापन सौंपकर हैदराबाद का नाम भाग्यनगर रखने का अपना मंतव्य स्पष्ट किया था । मेरे द्वारा तैयार किये गये इस ज्ञापन में शिवाजी महाराज से जुड़े यहां के ऐतिहासिक स्थलों का भी जीर्णोद्धार कर उन्हें हिंदू स्वरूप देने की मांग भी राज्यपाल महोदय से की गई थी। यह अत्यंत प्रसन्नता का विषय है कि आज हिंदू महासभा की पृष्ठभूमि से ही जुड़े मुख्यमंत्री योगी ने ही यह बात सबसे पहले उठाई है । हमारा मानना है कि मुख्यमंत्री योगी को अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए। देश का क्रांतिकारी युवा उनकी प्रतीक्षा कर रहा है और न केवल प्रतीक्षा कर रहा है बल्कि उनके पीछे खड़ा होकर आगे बढ़ने को मानसिक रूप से पूर्णतया तैयार भी है। देश के सांस्कृतिक स्वरूप को नष्ट कर यहां विकृतियों को जन्म देने वाले विदेशी हमलावरों और उनके मानस पुत्रों को अब उसी प्रकार कुचलने का समय आ गया है, जैसे किसी जहरीले नाग को कुचल देना ही उचित होता है। यह देश महर्षि मनु , मान्धाता, राम और कृष्ण का देश है। यह देश वेदों के उस संगीत की जन्मस्थली है जो मानव और मानव के बीच किसी प्रकार का भेदभाव ना कर सबको राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक न्याय प्रदान करने में विश्वास रखती है। यह भूमि उन ऋषियों महर्षियों के चिंतन की पवित्र भूमि है जो किसी भी प्रकार के अन्याय , शोषण ,दमन और अत्याचार का विरोध करना जानती है। यह भूमि इन लुटेरों, हत्यारों, बलात्कारियों, अपराधियों और डकैतों के गिरोहों का नेतृत्व करने वाले तथाकथित बादशाहों व सुल्तानों की भूमि हो ही सकती जिन्होंने यहां पर नरसंहारों के मेले सजाए। यह पवित्र भूमि तो महर्षि दयानंद और सावरकर की भूमि है, जो ‘आर्यवर्त आर्यों के लिए’ और ‘हिंदी -हिंदू -हिंदुस्तान’ की पवित्र और उत्कृष्ट राष्ट्रवादी भावना में विश्वास रखती है। ओवैसी और उनके जैसे राष्ट्र विरोधी जिन्नाहवादी लोगों को अब यह समझ लेना चाहिए कि भारत अब मौलाना अबुल कलाम आजाद छाप इतिहास से मुक्त होकर महाराणा प्रताप का देश बन चुका है, और लोगों की सोच से अकबर महान का भूत उतर चुका है।
ओवैसी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान कहा है कि बीजेपी का उद्देश्य हैदराबाद का नाम बदलना है। यह चुनाव भाग्यनगर बनाम हैदराबाद है । बीजेपी के टिकट बंटवारे को लेकर ओवैसी ने योगी पर निशाना साधते हुए कहा, ‘वो हमें सांप्रदायिक कहते हैं तो ये बताइए हमने हिंदुओं को टिकट दिया है, अब बीजेपी बताए कि उसने कितने मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है। बीजेपी का मकसद केवल हैदराबाद का नाम बदलना है। ये भाग्यनगर बनाम हैदराबाद है। मैं संविधान की शपथ लेता हूँ और ये लोग मुझे जिन्ना कहते हैं।’
हिंदुओं को टिकट देकर ओवैसी ने कोई अहसान नहीं किया है बल्कि उन्होंने हिंदुओं को मूर्ख बनाने के लिए और अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए ऐसा किया है। इस बात को अब पूरी तरह समझ लेना चाहिए । हमें ओवैसी जैसे लोगों के शब्दजाल में फंसने की बजाए सावधानी से इतिहास के उन तथ्यों पर विचार करना चाहिए जो यह स्पष्ट करते हैं कि जिन्नाह भी कभी पाकिस्तान को मूर्खतापूर्ण मांग कहा करता था। वह भी ओवैसी की तरह इस देश के साथ चलते रहने की सौगंध उठाया करता था, परंतु जैसे ही सही समय आया तो उसने देश के टुकड़े करवा दिये। यदि आज ओवैसी संविधान की शपथ ले रहे हैं तो ऐसा वह तब तक ही कर रहे हैं जब तक इससे उनके स्वार्थ पूरे होते हैं जैसे ही सही समय आएगा वह जिन्नाह के सही रूप में सामने आ जाएंगे।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि पाकिस्तान का जनक जिन्नाह देश के लोगों का ओवैसी की तरह ही यह कह कहकर मूर्ख बनाता रहा था कि भारत उनकी अपनी भूमि है, जिस पर हिंदू मुसलमान दोनों का बराबर का अधिकार है और वह देश तोड़ने में विश्वास नहीं रखता । लाहौर प्रस्ताव के अपनाए जाने से दो महीने पहले जिन्नाह ने कहा था कि भारत हिंदू और मुसलमान ‘दोनों की मातृभूमि’ है।कभी 19 जनवरी 1940 को लंदन के टाइम एंड टाइड में छपे अपने लेख में जिन्नाह ने लिखा था –
‘एक ऐसे संविधान का निर्माण होना चाहिए जिसके तहत भारत में दो राष्ट्र को मान्यता मिले और दोनों की एक ही सरकार में साझेदारी हो। ऐसे संविधान के निर्माण में भारत के मुसलमान ब्रिटिश सरकार, कांग्रेस या किसी भी दूसरी पार्टी की सहायता के लिए तैयार हैं जिससे कि मौजूदा झगड़ा खत्म हो और भारत दुनिया के महान देशों में अपनी जगह बनाए।’
पहले जिन्नाह ऐसे संविधान की मांग कर रहा था और फिर उसने एक अलग देश की स्थापना कर अपनी अलग संविधान सभा बनाई । समझदारी इसी में होती है कि इतिहास की घटनाओं से शिक्षा ली जाए और यदि देश तोड़ने की दिशा में कोई व्यक्ति उसी पूर्ववर्ती देश तोड़ने वाले व्यक्ति का अनुकरण करते हुए आगे बढ़ रहा है तो उसकी सोच और मानसिकता को समय रहते समझ लिया जाए।
कम्यूनिस्ट नेता एम एन रॉय जिन्नाह के समकालीन थे। जिन्ना पर उनका आकलन है: ‘मोहम्मद अली जिन्ना सबसे बदनाम और गलत समझे जाने वाले नेता थे। इस अनुभव ने उन्हें कड़वा बना दिया और द्वेष की भावना में उन्होंने एक लक्ष्य तैयार कर लिया, जिसे हासिल करने के बाद उनका नाम और खराब हुआ। अगर दूरदर्शिता की बात की जाए तो जिन्ना कोई आदर्शवादी नहीं थे। वह एक व्यावहारिक इंसान थे जिनमें चतुराई भरी थी और औसत से ज्यादा अक्लमंद थे। ऐसा इंसान मुश्किलों से भरी कामयाबी के बाद होने वाली परेशानियों से अनजान नहीं हो सकता था।अपनी जीवन यात्रा के बाद के हिस्से में सियासत उनके लिए जुआ थी, जिसमें बड़ा दांव लगाने के बाद वो पीछे नहीं हट सके। उन्हें हर हाल में कड़वे छोर तक पहुंचना था।कड़वा इसलिए क्योंकि तब वो कामयाबी के साये से भी घबराने लगे होंगे, खासकर तब जब सफलता हासिल होने वाली थी। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। सत्ता की चाहत नहीं रखने वाला इंसान सियासत में बहुत बुरी तक जकड़ चुका था। इस बात से बहुत कम लोग इत्तिफाक रखेंगे लेकिन निष्पक्ष और गंभीर इतिहासकार इस तथ्य को इनकार नहीं कर सकते।’
कम्युनिस्टों ने देश के साथ विश्वासघात करने वाले लोगों का चरित्र चित्रण इसी प्रकार किया है । उन्होंने भारत द्वेषी लोगों को एक नायक के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है । यही लोग आज भी ओवैसी जैसे लोगों का महिमामंडन कर रहे हैं और देश तोड़ने की गतिविधियों को भी उचित और संवैधानिक ठहराने का प्रयास कर रहे हैं। कहने का अभिप्राय है कि हर प्रकार से षड्यंत्र वैसे ही आज भी जारी है जैसे 1947 में या उसके पूर्व जारी रहा था। हमें ध्यान रखना चाहिए कि सिर्फ कफ़न बदला है, लाश वही है।
हमें इस बात की असीम प्रसन्नता है कि योगी आदित्यनाथ जैसे कुशल वैद्य इस समय मां भारती के पास हैं जो लाश को भी पहचानते हैं और कफन को ही पहचानते हैं । उन्हें पता है कि कफन के भीतर कौन छिपा है और किस सोच व मानसिकता को लिए बैठा है ? इसलिए यदि वह कुछ कठोर बोलते हुए दिखाई दे रहे हैं तो समझ लेना चाहिए कि वह सही उपचार करने की तैयारी कर रहे हैं । देश को ऐसे स्पष्ट वादी और कठोर निर्णय लेने वाले नेताओं का निश्चय ही अभिनंदन करना चाहिए ।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

 

 

 

 

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