सस्टेनेबल एग्रीकल्चर की संकल्पना है गौ कृषि

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रवि शंकर

कहते हैं कि दुनिया को खेती करना राजा पृथु ने सिखाया। महाभारत के अनुसार वह मानव इतिहास के चौथे राजा थे। पहले मनुष्य दूध, कन्दमूल खा-पीकर जीवन यापन करता था या फिर अपने-आप उग आए अनाज खाता था। किन्तु पृथु द्वारा खेती करने का तरीका विकसित करने के बाद से भारत में खेती होती आ रही है। राजा पृथु का काल पुराणों के अनुसार लाखों वर्षों पहले का है। आधुनिक इतिहासकार अपने पूर्वाग्रहों के कारण पृथु को इतिहास का हिस्सा नहीं मानते पर वे भी मानते हैं कि भारत में खेती हजारों वर्ष पहले से होती आ रही है। स्वाभाविक है कि इतने लंबे समय से खेती करने के कारण इसका एक विज्ञान भी देश में विकसित हुआ। देश में जब अंग्रेज आए तो उन्होंने उस विज्ञान का अध्ययन भी किया। यह एक इतिहास ही है कि भारत में लिखी कृषि गीता पुस्तक के पूरे यूरोप में कई-कई भाषाओं में अनुवाद किए गए। यूरोपीय लोगों को भी भारत ने ही खेती करना सिखाया था।

सवाल है कि भारत का वह परंपरागत ज्ञान क्या था? आखिर भारत की कृषि परंपरा में विज्ञान के कौन से सिद्धांत अंतर्निहित थे? क्या आज भारतीय कृषि की उस वैज्ञानिक परंपरा का कोई उपयोग हो सकता है? आज आत्महत्या करने को विवश भारतीय किसानों को क्या उस कृषि विज्ञान से कोई लाभ पहुंचाया जा सकता है?

यह दुर्भाग्यजनक ही कहा जाएगा कि जिस देश में कृषि जीवन पद्धति का हिस्सा हो, संस्कृति की मूल प्रेरणा हो और लाखों वर्षों से राज्य की आय का मुख्य स्रोत रही हो, उस देश में किसानों को आत्महत्या करनी पड़ रही है। वह भी तब जब हम विज्ञान के तथाकथित सर्वाेच्च शिखर पर बैठे हैं। उस विज्ञान के जो बीजों को जेनेटिक रूप से परिवर्तित करके उन्हें अधिक फसल देने वाला बना देता है, जो कम समय में फसल तैयार कर देता है, जो ऐसे-ऐसे खाद और कीटनाशक तैयार कर चुका है जिससे फसल कई-कई गुणा हो जाती है। इस विज्ञान के कारण किसान को शारीरिक श्रम से मुक्ति मिल चुकी है। अब उसे बैलों के पीछे चलना नहीं पड़ता, केवल ट्रैक्टर की सीट पर बैठना होता है। इस विज्ञान ने उसे एक वैश्विक बाजार उपलब्ध करा दिया है। कम्प्यूटर के एक क्लिक पर पूरी दुनिया का बाजार उसके समक्ष खुला होता है। फिर वह आत्महत्या क्यों कर रहा है? गरीबी और भुखमरी में क्यों जी रहा है?

समझने की बात यह है कि आधुनिक कृषि विज्ञान फसल तो अवश्य बढ़ा देता है परंतु इस बढ़ी हुई फसल का फायदा किसानों को नहीं, बाजार को होता है। किसान को तो उलटे नुकसान ही उठाना पड़ता है। यह विज्ञान किसान को बाजार पर निर्भर बना देता है जो अंततः उसका खून चूस लेता है।’ वास्तव में भारतीय कृषि पद्धति के विज्ञान का पहला सिद्धांत है कि किसान ‘दाता’ होता है। वह देता है, लेता नहीं है। इसलिए वह आत्मनिर्भर होता है। उसके पास अपना बीज होता है, अपने बैल होते हैं, अपनी खाद होती है और अपने कीट नियंत्राक होते हैं। इस प्रकार खेती करने के लिए उसे जमीन के अलावा और किसी भी बाहरी चीज की आवश्यकता नहीं होती। यदि उसके पास जमीन है तो वह आराम से खेती कर सकता है। उसे खेती करने के लिए कुछ भी खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसके पीछे एक गहरा वैज्ञानिक चक्र छिपा है। इस चक्र को यहां दिए गए चित्रा से समझा जा सकता है।

इस चक्र में भूमि, पशु और मनुष्य तीनों एक दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करते थे और इन तीनों से यह कृषि चक्र पूरा होता था। इस चक्र में मनुष्य पशु का पालन करता था। पशु भूमि का पालन करते थे और वह भूमि मनुष्य का पालन करती थी। यह कैसे होता था है या हो सकता है, इसे आधुनिक विज्ञान की भाषा में समझने का प्रयास करते हैं। पशु यानि कि भारत में गोवंश। गोवंश यानि गाय और बैल। गाय और बैल किसान की मुख्य पुंजी हुआ करते थे। इनके गोबर और गोमूत्रा से वह खाद और कीटनियंत्राक बनाया करता था। गोबर की खाद कई प्रकार से भूमि के लिए लाभदायक होती है। यह खाद यूरिया की तरह मिट्टी को फास्टफूड उपलब्ध नहीं करवाती, बल्कि यह मिट्टी को उपजाऊ बनाती है जिससे मिट्टी में केवल नाइट्रोजन ही नहीं, वरन् मैग्नीशियम, फास्फोरस, बोरोन, मैंगनीज जैसे भांति-भांति के अन्य ढेरों माइक्रोन्यूट्रिएंट पैदा होते हैं। यह संभव होता है गोबर खाद द्वारा पैदा किए गए सूक्ष्मजीवों के कारण। ये सूक्ष्मजीव ही मिट्टी का पोषण करते हैं और वातावरण में उपलब्ध माइक्रोन्यूट्रिएंट को मिट्टी में स्थापित करते हैं।

गोबर खाद मिट्टी की पानी ग्रहण करने की क्षमता को भी बढ़ाती है। इसके कारण खेतों में नमी बनी रहती है। इसके ठीक उलट यूरिया व डीएपी जैसे रासायनिक खाद मिट्टी की नमी की नष्ट कर देते हैं जिसके कारण खेतों में अधिक पानी की आवश्यकता पड़ने लगती है। सामान्यतः यह पाया गया है कि रासायनिक खाद डालने के बाद खेतों में तीन या चार गुणा अधिक पानी दिए जाने की आवश्यकता पड़ती है। गोबर की खाद से जो सूक्ष्मजीव मिट्टी में पैदा होते हैं, वे लंबे समय तक मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखते हैं। परिणामस्वरूप गोबर की खाद डालने की आवश्यकता घटती जाती है। सामान्यतः पाया गया है कि एक बार गोबर की खाद डालने पर अगले वर्ष उसकी आधी मात्रा डालनी होती है और उसके बाद 1-2 वर्ष खाद नहीं डालने से भी कोई फर्क नहीं पड़ता। दूसरी ओर रासायनिक खादों के प्रयोग से मिट्टी में उपस्थित सूक्ष्मजीव मर जाते हैं। इससे जमीन बंजर होती जाती है और रासायनिक खाद के प्रयोग की मात्रा हर वर्ष बढ़ती ही जाती है।

गोमूत्रा और नीम आदि से बने कीटनियंत्राक फसल में लगने वाले कीटों का तो नियंत्राण करते हैं परंतु वे मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं होते। उलटे उससे फसल की गुणवत्ता और बढ़ ही जाती है। परंतु रासायनिक कीटनियंत्राक मानव स्वास्थ्य के लिए काफी हानिकारक होते हैं। इनसे कैंसर जैसी लाइलाज बीमारियां फैलती हैं। वर्तमान में मधुमेह जैसी बीमारियों का कारण भी यही प्रदूषित अन्न, फल व सब्जियों का सेवन है।

भारतीय कृषि के विज्ञान का दूसरा सिद्धांत रहा है मिश्रित खेती। भारतीय पद्धति की खेती में कभी भी खेतों में एक फसल नहीं ली जाती, हमेशा दो फसलें बोई जाती रही हैं। जैसे अरहर के साथ सरसों, गन्ने के साथ आलू या मसूर, गेंहूं के साथ चना आदि। इससे दो फायदे होते हैं। पहला फायदा तो यह है कि एक फसल मिट्टी से कुछ पोषक पदार्थ लेती है तो कुछ छोड़ती भी है। इससे दोनों फसलें मिल कर मिट्टी की उर्वरता बनाए रखती हैं। दूसरा फायदा यह है कि मौसम की मार से यदि एक फसल खराब हो गई तो भी दूसरी फसल से किसान की लागत निकल आती है और वह बर्बाद होने से बच जाता है। डा. गुणाकर बताते हैं कि पिछले वर्ष फरवरी-मार्च के महीने में जो अनपेक्षित बारिश हुई और ओले गिरे, उससे रासायनिक खेती करने वालों की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई, परंतु भारतीय पद्धति से खेती करने वाले किसानों की फसलें बची रहीं। ऐसा अलीगढ़, मथुरा, फर्रुखाबाद, मुरादाबाद आदि कई इलाकों में देखा गया। आश्चर्य की बात है कि ऐसा अगल-बगल के खेत में भी हुआ। यह अंतर भारतीय पद्धति का है।

इसलिए भारत में कृषि को गोपालन से जोड़ कर देखा गया। आज दुनिया में इस पर शोध किया जा रहा है। जिम्बावे के एलन सेवरी ने यह शोध किया है कि गायों के स्वतंत्रा रूप से चरने से बंजर भूमि भी हरी-भरी हो जाती है। इसलिए उन्होंने बंजर धरती को उपजाऊ बनाने का उपाय निकाला है कि वहां गायों के झुंड को छोड़ दिया जाए। उन्होंने अपने शोध में पाया है कि गायें बंजर भूमि पर जो गोबर करती हैं, उससे उस भूमि की पानी रोकने की क्षमता बढ़ जाती है। धीरे-धीरे वह भूमि नम होने लगती है और फिर वहां घास पैदा होने लगती है। उस घास को भूमि में ही मिला देने से वहां की मिट्टी उपजाऊ हो जाती है। इस प्रक्रिया को मल्चिंग कहा जाता है। साथ ही वहां की भूमि में सूक्ष्मजीवों की संख्या काफी बढ़ जाती है। इन दो कारणों से वह भूमि खेती योग्य हो जाती है।

इस प्रकार हम पाते हैं कि भारत में कृषि को गोपालन से जोड़ा जाना एक वैज्ञानिक गतिविधि थी। गाय-बैल के स्थान पर ट्रैक्टर तथा रासायनिक खादों का प्रयोग तो तर्क सम्मत भी नहीं है। जिससे तत्काल तो लाभ मिलता दिखता है परंतु इससे 50-100 वर्षों में जमीन बंजर होने लगती है। यह पंजाब में हरित क्रांति के मात्रा 30-40 वर्ष के बाद ऐसा होता देखा जा सकता है। वहां के जमीन की उत्पादकता घटती जा रही है। नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेस, नई दिल्ली द्वारा प्रस्तुत एक शोध पत्रा में यह पाया गया कि रासायनिक खादों के प्रभाव में लगातार कमी आ रही है। अर्थात् अधिक खाद डालने पर भी उस अनुपात में उपज नहीं हो रही।

हैरत की बात यह है कि इस बात की ओर ध्यान दिलाने वाले और कोई नहीं एकेडमी के अध्यक्ष और भारत में हरित क्रांति के जनक एम. एस, स्वामीनाथन ही थे। यह जानना भी रोचक है कि कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने कहा कि भारत को अब हरित क्रांति की नहीं, बल्कि स्थायी हरित क्रांति (एवरग्रीन रिवोल्यूशन) की आवश्यकता है। यह स्थायी वाला तत्व बिना गोपालन के आना संभव नहीं है।

यहां पर यह ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि भारत अपनी विशेष जलवायु के कारण यूरोपीय देशों से भिन्न है। यहां खेतों में तीन और कई बार तो चार-चार फसल लिया जाना सामान्य बात है जबकि यूरोप में एक से अधिक फसल लेना कठिन होता है। वहां एक फसल के बाद जमीन बर्फ में दबी रहती है। इसलिए वहां रासायनिक खादों के नुकसान का पता नहीं चलता। साथ ही यदि वार्षिक उपज देखी जाए तो एक फसल का औसत उत्पादन कम होने पर भी भारतीय खेतों का औसत वार्षिक उत्पादन यूरोपीय खेतों से अधिक हो जाएगा।

इसलिए भारतीय कृषि पद्धति एक फसल में अधिक उत्पादन लेने, जिससे मिट्टी की उत्पादकता को नष्ट हो जाती है, की बजाय मिट्टी की उत्पादकता बरकरार रखते हुए उससे चार-चार फसल लेने पर विश्वास करती थी। इससे एक लाभ और भी था। मनुष्यों को भोजन में विविधता भी मिलती थी। यहां के लोग केवल चावल और गेंहूं नहीं खाते थे, बल्कि मक्का, ज्वार, रागी, जैसे मोटे अनाज और सब्जियां आदि का प्रयोग बहुतायत में करते थे। ये मोटे अनाज कम पानी में उपजते हैं और मानव शरीर के लिए काफी पुष्टिकारक होते हैं। सब्जियां भी मनुष्य के लिए लाभकारी हैं।

समझा जा सकता है भारतीय कृषि पद्धति खेतों से येन-केन-प्रकारेण अधिक उपज लेने पर विश्वास नहीं करती थी, बल्कि उसके अनुसार खेतों की उर्वरता बनाए रखते हुए मानव के लिए हितकारी भोज्य पदार्थों की खेती करने को प्रोत्साहित करती थी। इस पद्धति में पशुओं का भी सहजता से पालन हो जाता था। फसल के अवशेष जिसे हम भूसा और खली कहते हैं, पशुओं को खिलाने के काम आता था। इस प्रकार भारतीय कृषि पद्धति प्रकृति से लेन-देन का हिसाब बिल्कुल बराबर रखा करती था। यही इसका विज्ञान था।

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