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इतिहास के पन्नों से व्यक्तित्व

राम मंदिर आंदोलन के निकटस्थ साक्षी : चंपत राय जी

18 नवम्बर/जन्म-दिवस

 

1947 के बाद भारत के हिन्दू नवजागरण में श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन की विशेष भूमिका है। इसने देश के धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया। आंदोलन में सार्वजनिक मंचों पर वरिष्ठ साधु-संतों के साथ विश्व हिन्दू परिषद के श्री अशोक सिंहल सदा उपस्थित रहते थे; लेकिन पीछे रहकर सब योजनाओं को परिणाम तक पहुंचाने वाले चंपतरायजी इस आंदोलन के जीवंत कोष (एनसाइक्लोपीडिया) और निकटस्थ साक्षी हैं।

चंपतजी का जन्म 18 नवम्बर, 1946 को नगीना (जिला बिजनौर, उ.प्र.) में कपड़े के कारोबारी श्री रामेश्वर प्रसाद बंसल और श्रीमती सावित्री देवी के घर में हुआ था। पिताजी संघ के कार्यकर्ता थे और 1948 के प्रतिबंध काल में जेल गये थे। दस भाई-बहिनों में चंपतजी का नंबर दूसरा है। बचपन से ही वे शाखा में जाते थे। रज्जू भैया, ओमप्रकाशजी, सूर्यकृष्णजी, सलेकचंदजी आदि प्रचारक घर आते रहते थे। पढ़ाई में तेज होने से 1969 में भौतिकी में एम.एस-सी. करते ही वे रोहतक (हरियाणा) के एक डिग्री काॅलिज में पढ़ाने लगे। 1972 में वे धामपुर (उ.प्र.) के आर.एस.एम. डिग्री काॅलिज में आ गये।

यथासमय उन्होंने संघ के तीनों वर्ष के प्रशिक्षण पूरे किये। 1975 में देश में आपातकाल और संघ पर प्रतिबंध लग गया। चंपतजी बिजनौर में संघ के जिला कार्यवाह थे। अतः काॅलिज में ही पुलिस उन्हें पकड़ने आ गयी। चंपतजी उनके साथ घर गये। कुछ कपड़े लिये और माता-पिता के पैर छूकर जेल चले गये। ‘मीसा’ लगाकर उन्हें बरेली, आगरा और नैनी जेल में रखा गया। 1980 में नौकरी छोड़कर वे संघ के प्रचारक बने। देहरादून और सहारनपुर में जिला तथा 1985 में मेरठ के विभाग प्रचारक के बाद 1986 में वे विश्व हिन्दू परिषद (पश्चिमी उ.प्र.) के सह संगठन मंत्री बनाये गये। फिर वे उ.प्र. के संगठन मंत्री, केन्द्रीय मंत्री, संयुक्त महामंत्री, महामंत्री तथा उपाध्यक्ष बने। 1996 से केन्द्रीय कार्यालय, दिल्ली में रहकर वहां की व्यवस्था भी उन्होंने संभाली।

1990 के बाद मंदिर आंदोलन में तेजी आयी। उन दिनों चंपतजी का केन्द्र अयोध्या ही था। वहां की हर व्यवस्था उनके जिम्मे थी। इस दौरान वे वहां की हर गली, मोहल्ले और आश्रम के इतने पक्के जानकार हो गये कि लोग हंसी में उन्हें ‘अयोध्या का पटवारी’ कहते थे। आंदोलन ने उतार-चढ़ाव के कई दौर देखे। चंपतजी हर जगह पृष्ठभूमि में रहकर काम करते थे। व्यवस्था के हर पहलू पर उनकी पूरी पकड़ रहती थी। परिषद के काम से पूरे देश का प्रवास तो उन्होंने किया ही है। एक बार अशोकजी के साथ वे विदेश भी गये हैं। विज्ञान के छात्र होने के बावजूद वे लेखा कार्यों के भी तज्ञ हैं। विश्व हिन्दू परिषद का काम सैकड़ों न्यासों के माध्यम से चलता है। हर न्यास का प्रतिवर्ष आॅडिट होता है। केन्द्र में कांग्रेसी सरकारों ने हिसाब-किताब के नाम पर कई बार परिषद को घेरने का प्रयास किया; पर उनकी दाल नहीं गली।

अयोध्या आंदोलन में लखनऊ से लेकर दिल्ली तक मुकदमों का लंबा दौर चला। यह जिम्मेदारी भी मुख्यतः चंपतजी पर ही थी। वे आंदोलन की हर फाइल और कागज को संभालकर रखते थे, जिससे उनके पक्ष के वकील उसे न्यायालय में सही समय पर प्रस्तुत कर सकें। मुकदमे के दौरान वे चुपचाप बैठकर बहस सुनते थे। मुकदमों की पैरवी देश के कई बड़े वकीलों ने निःशुल्क की। परिश्रम, सादगी और विनम्रता चंपतजी का विशेष गुण है। इसलिए वरिष्ठ वकील, साधु-संत और शासन-प्रशासन के लोग भी उन्हें बहुत मानते हैं।

लम्बे संघर्ष के बाद अब सर्वोच्च न्यायालय से मंदिर के पक्ष में निर्णय आ चुका है। चंपतजी मंदिर निर्माण के लिए बने ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास’ के महासचिव हैं। अब सबको उस दिन की प्रतीक्षा है, जब श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में श्रीरामलला के दिव्य विग्रह की स्थापना होगी।

(पवन कुमार अरविंद : हिन्दुस्थान समा/3.3.20 तथा सुधीर बंसल)
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