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आज का चिंतन

आज का चिंतन-16/07/2013

सम्मान से ज्यादा जरूरी है

समय पर संबल और स्वीकार्यता

– डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

किसी भी व्यक्ति के जीवन में आगे बढ़ने के लिए जिन बातों की सर्वाधिक जरूरत होती है उनमें समय पर मार्गदर्शन, संबल एवं प्रोत्साहन तथा स्वीकार्यता अव्वल स्थान पर है। हर आदमी में अपने आप आगे बढ़ने की अपार क्षमताएं और पूर्ण सामथ्र्य होता है।यह अपने पर निर्भर करता है कि हम मौलिक प्रतिभाओं, नैसर्गिक ऊर्जाओं और सामथ्र्य का कितना उपयोग कर पाते हैंं। पुरुषार्थ चतुष्टय की यात्रा पर निकले मनुष्य के लिए जीवन में कई सारी बाधाएं, समस्याएं और स्पीड ब्रेकर आते हैं जिनसे निपटने के लिए उसे औरों का अथवा समुदाय का संबल जरूरी होता है और इसके लिए वह औरों पर निर्भर रहता है।

जो लोग अच्छे और समाज, क्षेत्र तथा देश के लिए हितकारी कर्म करते हैं, जो प्रतिभाएं किसी न किसी क्षेत्र में आगे बढ़ने का प्रयास करती हैं अथवा जो लोग समाज सेवा या राष्ट्र सेवा के किसी न किसी कर्म से जुड़े हुए हैं उन्हें समय पर हरसंभव मदद, प्रोत्साहन, मार्गदर्शन और बहुआयामी संबलन प्रदान करना समुदाय और श्रेष्ठीजनों का फर्ज है और इसके लिए हम सभी को सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना के साथ आगे आना चाहिए।मगर हाल के वर्षों में स्वार्थ और ऎषणाओं की पूर्ति का शगल इतना बढ़ चला है कि आदमी अच्छे लोगों या प्रतिभाओं की बजाय उन लोगों की सेवा-पूजा और सम्मान में ज्यादा रस लेता है जिनसे अपना कोई न कोई स्वार्थ सिद्ध होने की उम्मीद हो अथवा अपनी बाधाओं को दूर करने, अपने जायज-नाजायज कामों को संरक्षण मिलने अथवा अपने काम-धंधों को निरापद बनाये रखने की उम्मीद हो।

gउगते सूरज की अगवानी और पूजन की मानवी परंपरा में हम उन लोगों को भूलते जा रहे हैं जो समाज और क्षेत्र के विकास तथा देश के नवनिर्माण की नींव में हैं अथवा रहे हैं। आज सब कुछ उलटा-पुलटा हो रहा है। समाज में जिन लोगों को अपने भविष्य निर्माण के लिए समय पर मदद की जरूरत है उनसे हम दूरी बनाये रखने लगे हैं और अपने फर्ज को उपेक्षित कर रखा है।

दूसरी तरफ हम उन लोगों की सेवा-पूजा और सम्मान-अभिनंदन में समर्पित भाव से जुटे हुए हैं जिनसे हमारी उम्मीदों के पुल बंधते हैं। आदमी को बनाने की बजाय किसी और वजह या वैयक्तिक सम्पर्कों और स्व प्रतिभा अथवा एकांतिक संघर्ष से हासिल होने वाली उपलब्धियों के बाद हम सम्मान और अभिनंदन में ऎसे मशगुल हो जाते हैं जैसे कि उन्हें बनाने और इस सम्मानजनक स्थान पर पहुंचाने के लिए हमने ही बहुत कुछ किया हो।जबकि असल में हमारी कोई भूमिका नहीं होती है। यह बात हम भी जानते हैं और वे भी जो किसी सम्मानजनक स्थान पर पहुंच चुके होते हैं लेकिन सम्मान और अभिनंदन की भूख तथा इमेज बिल्डिंग का फोबिया पुरानी सारी बातों को भुला देता है और हमारे व्यक्तित्व में हवा भरते हुए फूलाकर ऎसे मुकाम पर पहुंचा देता है जहां हमें सभी जगह अपने आपको ही देखने, सुनने की आदत हो जाती है।

किसी आदमी के कुछ बन जाने के बाद किए जाने वाले सम्मान और अभिनंदन की श्रृंखलाओं वाली चापलुसी से तो अच्छा है हम आदमी की प्रतिभाओं, उसके मौलिक विलक्षण गुणों तथा अन्यतम व्यक्तित्व की खूबियों को समय रहते स्वीकारें, उन्हें और अधिक निखारने में मदद दें, उन्हें आगे बढ़ने के अवसर दें और केंकड़ा स्वभाव, निंदा और बकवास की स्थितियों को त्याग कर अपनी ओर से हरसंभव योगदान दें ताकि समाज में ज्यादा से ज्यादा प्रतिभाएं निखर कर निकल सकें और समुदाय तथा क्षेत्र को गौरवान्वित करने में भागीदारी निभा सकें।कुछ वर्षों से हो यह रहा है कि हम प्रतिभाओं को सिर्फ देखते रहते हैं, आलोचना और निंदा में रमे रहते हैं और टाँग खिंचाई की अपनी परंपरागत आदतों का भरपूर उपयोग करते रहते हैं लेकिन जो फर्ज हमें अदा करने होते हैं उनके प्रति मुँह मोड़े रहते हैं। इस वजह से भी प्रतिभाओं को सभी प्रकार से बौद्धिक सम्पन्नता होने के बावजूद अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं हो पा रही है। इसमें दोष हमारा भी है।

हमारे निकम्मेपन और नपुंसकता की वजह से समाज की क्रीमीलेयर अपने आपको पहले उपेक्षित समझती है और उत्तरोत्तर वह हमारी नाकामी को देखकर पूरे समाज व क्षेत्र को ही उपेक्षा की नज़रों से देखने लगती है और पलायन का रास्ता चुन लेती है। दोनों ही स्थितियों में दोष हमारा ही है।

फिर जब इनमें से कोई प्रतिभा किसी क्षेत्र विशेष में कहीं आगे आ जाती है, नाम कमा जाती है या समृद्ध हो जाती है तब हम सारे के सारे भेड़ों की रेवड़ की तरह उसके सम्मान और अभिनंदन की चापलुसी के उत्सव में भागीदार हो जाने पीछे-पीछे भागते रहते हैं।समाज में प्रतिभाओं का भण्डार है लेकिन हमारी मूर्खताओं, उदासीनताओं और मलीन बुद्धि की वजह से ये आगे नहीं आ पा रही हैं वरना यदि इन प्रतिभाओं को हम समय पर हर प्रकार से मार्गदर्शन और संबल प्रदान करें तो पूरी की पूरी खेप निकल सकती है।

प्रतिभाओं का अखूट भण्डार है जिसे बाहर निकालने और प्रतिष्ठित करने के लिए हमें अपने कुकर्म, घृणित स्वार्थों, पाखण्डी जीवन के आडम्बरों और मलीनताएं तथा क्षुद्र स्वार्थों को छोड़कर आगे आने की जरूरत है। ऎसा हम कर पाएं तो ठीक हैं वरना हमारा जीना ठीक उसी तरह ही है जैसे हरे-भरे खेत में लटके-टंगे हुए अजीबोगरीब आकार-प्रकार के रंग-बिरंगे बिजूके, जो हवाओं के साथ हिल-हिल कर झुकते हुए सलाम करते रहते हैं। और देखने वालों को लगता है कि इनमें अभी जान बाकी है।

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