तपोवन आश्रम में आयोजित सामवेद पारायण यज्ञ का समापन , कर्म उपासना से मनुष्य मृत्यु को पारकर विद्या से अमृतमय होकर मोक्ष को प्राप्त हो जाता है : आचार्य आशीष

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ओ३म्

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वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून में सोमवार दिनांक 2-11-2020 से रविवार दिनांक 8-11-2020 तक 7 दिवसीय सामवेद पारायण तथा गायत्री यज्ञ सहित भजनों एवं वैदिक व्याख्यानों का कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें देश के निकटवर्ती भागों से लोग सम्मिलित हुए। कार्यक्रम सफलतापूर्वक समाप्त हुआ। हम प्रतिदिन इन कार्यक्रमों में सम्मिलित होते रहे। हम जिन कार्यक्रमों में उपस्थित हुए उनके समाचार फेसबुक, व्हाटशप तथा इमेल आदि के माध्यम से प्रसारित किये हैं। रविार दिनांक8-11-2020 को आयोजित समारोह की प्रथम किश्त हम आज प्रातः प्रस्तुत कर चुके हैं। इसका शेष भाग इस लेख में प्रस्तुत कर रहे हैं। आज दिनांक9-11-2011 को प्रथम लेख में हमने यज्ञ सहित स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी की सामूहिक प्रार्थना, कुछ भजनोपदेशकों के भजनों सहित मंत्री जी का सन्देश एवं आचार्या दीप्ति जी का व्याख्यान प्रस्तुत किया है। अन्य भजन व उपदेश इस भाग में प्रस्तुत कर रहे हैं।

आचार्य डा. महावीर मुमुक्षु जी ने अपने व्याख्यान में वेद तथा यज्ञ की चर्चा की। उन्होंने कहा कि हमें वैदिक धर्म तथा संस्कृति को जीवित रखने के लिये वेद रक्षा करने के अतिरिक्त दूसरा कोई विकल्प नहीं है। ऋषि दयानन्द जी के जीवन का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ऋषि जब वेदों का भाष्य लिखाते थे तब कहीं कुछ समस्या उपस्थित होने पर वह अपनी कुटियां में चले जाते थे। उनके समकालीन व सहयोगी कुछ लोगों ने देखा व बताया कि वह कुटिया में अन्दर जाकर ध्यान की मुद्रा बैठते थे। कुछ देर बाद वह कुटिया से बाहर आते और वेद भाष्य लिखने वाले पण्डितों को आगे का भाष्य लिखने को कहते व लिखाते थे। उन्होंने कहा कि बाद के वैदिक वेद भाष्यकारों व आर्य विद्वानों ने इस प्रक्रिया को नही अपनाया। आचार्य मुमुक्षु जी ने आर्ष विधि की चर्चा की और कहा कि यह भी स्वामी दयानन्द जी के ध्यान वाली प्रक्रिया का ही हिस्सा है। उन्होंने कहा कि विवेक ख्याति ध्यान का ही भाग है। ध्यान की ओर हमारा काम कम हुआ है। वक्ता महोदय ने बताया कि इस समय उनकी 73 वर्ष की आयु है। उन्होंने आर्यसमाज के अध्ययन व प्रचार आदि कार्यों में 53 वर्ष लगाये हैं। उन्होंने कहा कि आज हममें वह योग्यता नहीं है कि ऋषि दयानन्द की ध्यान पद्धति से हम वेद मन्त्रों के अर्थ प्राप्त व एबजोर्ब कर सकें। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब विद्यार्थी जीवन में अध्ययन करते समय उन्हें स्कूली पाठ्यक्रम से जुड़े किसी प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता था तो वह बाजार से उस विषय की कुंजी ले आते थे। उन्होंने कहा कि वर्तमान में भी यही स्थिति है। आजकल के विद्यार्थी भी प्रायः ऐसाही करते हैं। इससे प्रश्न का समाधान हो जाता है। ऐसी ही एक कुंजी हमें महर्षि दयानन्द की कृपा से प्राप्त है। उस कुंजी का नाम ही सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ का हमारे पास कोई विकल्प नहीं है। इस ग्रन्थ की सहायता से हम अविद्या को जानकर उसका निवारण कर सकते हैं।

आचार्य महावीर मुमुक्षु जी ने कहा कि जब वह किशोर व युवा थे तो
सत्यार्थप्रकाश विषयक अपनी शंकाओं के उत्तर आर्यसमाज के उत्सवों में आने वाले विद्वानों से पूछते थे। इसके लिये वह वर्ष भर के अपने प्रश्नों को सत्यार्थप्रकाश पढ़ते हुए रेखांकित कर लेते थे। इस समाधान प्रक्रिया का कोई अन्य साधन स्थान नहीं ले सकता। सब मनुष्यों ने सत्यार्थप्रकाश का नाम सुना होता है। उन्होंने कहा कि सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ को हम अपनी आत्मा से जोड़े। प्रसंगवश वक्ता महोदय ने बताया कि उन्होंने विद्या प्राप्ति हेतु अनेक प्रयत्न किये। अनेक ग्रन्थों का अध्ययन किया। विद्वानों के प्रवचन सुने और अपनी शंकाओं का समाधान किया। उन्होंने पी.एच-डी. भी की। यह सब योग्यतायें स्वामी जी की व्याख्याओं एवं ग्रन्थों के समक्ष अधिक महत्वपूर्ण नहीं हैं जितना स्वामी जी की व्याख्याओं का महत्व है। उन्होंनंे कहा कि स्वामी दयानन्द जी की सभी विषयों की व्याख्यायें अद्भुद हैं। स्वामी दयानन्द जी ने धर्म की परिभाषा एक डेढ़ पंक्ति में ही दे दी है। उन्होंने कहा कि सारे दुःखों का मूल अविद्या है। अविद्या को जानने के लिये मोटे मोटे ग्रन्थों को पढ़ा जाये तब भी यह स्पष्ट नहीं होती। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के एक पृष्ठ में ही इस अविद्या की समस्या का समाधान कर दिया है। सत्यार्थप्रकाश के नवम् समुल्लास में अविद्या का प्रकाश किया गया है। अविद्या के उन्होंने निम्न चार भाग बतायें हैं।

1- अनित्य को नित्य समझना।
2- अपवित्र को पवित्र समझना।
3- दुःख को सुख समझना।
4- जड़ को चेतन समझना।

आचार्य महावीर मुमुक्षु जी ने इन सबकी विस्तार से व्याख्या भी की। उन्होंने कहा कि अविद्या के उपर्युक्त चार भागों को जानने व समझने सहित ऋषि की व्याख्या पढ़ने से सारी अविद्या का समाधान हो जाता है। आचार्य जी ने कहा कि सत्यार्थप्रकाश वैदिक वांग्मय की कुंजी है। सत्यार्थप्रकाश के माध्यम से हम वेदों को समझ सकते हैं। आचार्य जी का निर्धारित समय पूरा हो गया था। अतः उन्होंने 15 मिनट के समय में ही यहीं पर अपनी बात समाप्त कर दी।
कार्यक्रम में पं. नरेशदत्त आर्य, बिजनौर ने पं. दीपचन्द आर्य जी के साथ मिलकर कई भजन व गीत प्रस्तुत किये। उनका पहला भजन था ‘ऋषि ने जलाई है जो दिव्य ज्योति जहां में सदा यूं ही जलती रहेगी।’ पं. नरेशदत्त आर्य जी ने कहा कि मनुष्य के दो प्रमुख शत्रु हैं जिनमें प्रथम तो अविद्या है तथा दूसरी गरीबी है। आर्य जी ने इन दोनों शत्रुओं से संबंधित अनेक प्रमाण एवं उदाहरण भी दिये। पं. जी ने दूसरा भजन प्रस्तुत किया जिसके बोल थे ‘मानव चोले को सफल बना दे इस तकदीर से, आखिर कोई रह न जाये शिकवा तकदीर से।’ सत्संग क्या है, इस का स्वरूप बताते हुए उन्होंने कहा कि जिसको करके सत्य की प्राप्ति हो जाये और असत्य छूट जाये, उसे सत्संग कहते हैं।

आर्यजगत के प्रसिद्ध विद्वान आचार्य आशीष दर्शनाचार्य जी ने अपने व्याख्यान में कहा कि हमारे गुरुकुलों के बच्चे हमारे देश, धर्म, संस्कृति तथा हमारी परम्पराओं के रक्षक एवं भविष्य हैं। उन्होंने कहा कि हमारा गुरुकुल का पक्ष जितना मजबूत होगा तथा सिद्धान्तों की दृष्टि से सत्य को स्थापित करने की हममें जितनी योग्यता अधिक होगी, उतना ही वेद प्रचार भी अधिक होगा। उन्होंने आगे कहा कि सत्य का स्वरूप समझने के लिए हमें ऐसे ग्रन्थ से जुड़ना पड़ेगा जिसका उद्देश्य ही सत्य को प्रकाशित करना है। आचार्य आशीष जी ने कहा कि महर्षि दयानन्द के ग्रन्थों पर जितनी जल्दी हम केंद्रित होंगे उतना ही जल्दी हम स्वयं ज्ञान व विद्या से प्रकाशित होंगे और दूसरों को भी प्रकाशित करेंगे। आचार्य जी ने प्राचीन काल के गुरुकुलों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि यदि हमें कहीं से किसी सत्य ज्ञान के उपलब्ध होने का संकेत मिलता है तो हमें उसे प्राप्त कर परीक्षा कर स्वीकार करना चाहिये। विद्वान आचार्य आशीष जी ने धर्म प्रेमी श्रोताओं को सत्यार्थप्रकाश के कठिन स्थलों का शंका समाधान करने की ओर ध्यान दिलाया जिसका उल्लेख उनसे पूर्व डा. महावीर मुमुक्षु जी ने किया था। आचार्य जी ने मुमुक्षु जी के वचनों को पुनः प्रस्तुत किया यथा कब आर्यसमाज का उत्सव हो, वहां विद्वान आयें, उनसे अपनी शंकाओं का समाधान करूं आदि आदि। इसकी हमारे जिज्ञासु बन्धु प्रतीक्षा किया करते थे।

आचार्य आशीष जी ने कहा कि यदि हम सत्यार्थप्रकाश को समझ लेंगे और उसके प्रति निःशंक हो जायेंगे। ऐसा होने पर समझ लें कि हम अध्यात्म तथा वैदिक संस्कृति का मर्म समझ लेंगे। आचार्य जी ने ऋषिभक्त महावीर मुमुक्षु जी को आश्वासन दिया कि हम गुरुकुल के विद्यार्थी भी सत्यार्थप्रकाश को ऐसे ही पढ़ेंगे। यदि कोई सत्यार्थप्रकाश व वैदिक धर्म के किसी पक्ष पर किसी प्रकार की शंका करेगा तो हम उसका उत्तर देने में सक्षम होंगे। आचार्य आशीष जी ने कहा कि हम केवल अपना पाठ पढ़ने में ही नहीं लगे रहेंगे अपितु इसके साथ हम आद्योपान्त सत्यार्थप्रकाश को पढ़कर उसमें विशेष योग्यता बनायेंगे। सत्संग में उपस्थित गुरुकुलों के लगभग 35 छात्र छात्राओं ने अपने हाथ उठाकर आचार्य जी की बात का समर्थन किया जिसका अर्थ था कि वह सब सत्यार्थप्रकाश का आद्योपान्त अध्ययन करेंगे और उसमें विशेष योग्यता बनायेंगे। आचार्य जी ने कहा कि इस समर्थन को केवल औपचारिक मत रखना अपितु इसे अपने व्यवहार से सत्य सिद्ध कर दिखाना।

आचार्य आशीष दर्शनाचार्य जी ने अपने सम्बोधन में आगे कहा कि हमें सत्यार्थप्रकाश एवं वैदिक साहित्य का अध्ययन तो करना ही है, इसके साथ इसे दूसरों को पढ़ाना भी है। उन्होंने कहा कि हमारे गुरुकुलों की परम्परा पढ़ना व पढ़ाना तथा सुनना व सुनाना की है। इसके बाद आचार्य जी ने गुरुकुल के छात्र छात्राओं से सत्यार्थ प्रकाश विषयक कुछ प्रश्न पूछें। आचार्य जी ने कहा कि अविद्या का स्वरूप समझ लिया तो मुक्ति प्राप्त करना शेष रहता है। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में एक पृष्ठ में अविद्या का स्वरूप स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने पूछा कि सत्यार्थप्रकाश के नौवें समुल्लास का प्रारम्भ कौन से मन्त्र से हुआ है? बताया गया कि यह यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय के 14 वें मन्त्र ‘विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह। अविद्यया मृत्युं तीत्र्वा विद्ययामृतमश्नुते।।’ से हुआ है। उन्होंने विद्यार्थियों से मंत्र की दूसरी पंक्ति में आये पदों ‘अविद्यया मृत्युं तीत्र्वा विद्ययामृतमश्नुते’ पदों का अर्थ पूछा? इसका अर्थ बताया गया कि अविद्या से मृत्यु को और विद्या की सहायता से अमृत को प्राप्त करें। इस उत्तर को आचार्य जी ने सही बताया। उन्होंने अविद्या पर प्रकाश डाला। उन्होंने अविद्या से मृत्यु को तरने पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अविद्या ही सारे क्लेशों का कारण है। इसका उत्तर ही सत्यार्थप्रकाश के नवम् समुल्लास के प्रथम पृष्ठ पर मिलता है। हमें सत्यार्थप्रकाश पढ़कर अपनी योग्यता को बढ़ाना पड़ेगा। यह चर्चा चल ही रही थी कि आचार्य जी को दिये गये 20 मिनट का समय पूर्ण हो गया। अतः आचार्य जी ने अपने वक्तव्य को विराम दिया।

कार्यक्रम में अनेक स्थानों से अनेक आर्यजन पधारे थे। रुड़की से प्रसिद्ध आर्य नेता श्री हाकम सिंह आर्य जी भी आये थे। उन्होने सभा में जानकारी दी कि रुड़की के निकट मंगलौर में सरकार ने 500 पशु प्रतिदिन काटने की एक नई वधशाला को अनुमति दी थी। इसका वहां के एक स्थानीय मुस्लिम बन्धु श्री जमीर हसन ने विरोध किया। उन्होंने आर्यसमाज से सम्पर्क कर इस कार्य में सहयोग मांगा। हरिद्वार जिले के सभी आर्य बन्धुओं ने आन्दोलन में सहयोग दिया जिससे पशु वधशाला को रूकवाने में सफलता मिली। विरोधी लोग इसके विरुद्ध उच्च न्यायालय में गये हैं। श्री जमीर हसन जी की अनुगवाई में आन्दोलन चल रहा है। आर्यसमाज के विद्वान संन्यासी एवं विधायक स्वामी यतीश्वरानन्द सरस्वती का भी इस कार्य में सहयोग मिल रहा है। गोरक्षा के इस कार्य के लिये वैदिक साधान आश्रम की ओर से श्री नजीर हसन जी का शाल ओढ़ाकर सम्मान किया गया। इसके बाद वागेश्वर से पधारे आर्यनेता श्री गोविन्द सिंह भण्डारी जी आदि कुछ लोगों ने भी अपने विचार प्रस्तुत किये। कार्यक्रम का संचालन हरिद्वार से पधारे शीर्ष आर्य विद्वान तथा आर्य उपदेशक श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने बहुत उत्तम रीति से किया।

वैदिक साधन आश्रम में जो सामवेद पारायण एवं गायत्री यज्ञ का सात दिवसीय आयोजन किया गया उसने अक्टूबर मास में आयोजित किये जाने वाले आश्रम के शरदुत्सव की पूर्ति कर दी। अनेक ऋषिभक्तों ने दूर दूर से पधार कर उत्सव में भाग लिया। इससे लोगों का धर्मप्रेम व भाव विदित होता है। कार्यक्रम पूर्णतः सफल हुआ। इसके लिये स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी सहित वैदिक साधन आश्रम तपोवन के सभी अधिकारी एवं सदस्यगण बधाई के पात्र हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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