वैदिक साधन आश्रम तपोवन देहरादून में सामवेद पारायण यज्ञ- हमारा शरीर हमें ईश्वर से मिला है : डॉ नवदीप कुमार

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ओ३म्

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वैदिक साधन आश्रम, तपोवन देहरादून की धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं में अग्रणीय संस्था है। इसकी स्थापना सन्1949 में बावा गुरमुख सिंह एवं महात्मा आनन्द स्वामी जी ने मिलकर की थी। वर्ष में दो बार यहां पर उत्सव आयोजित किये जाते हैं। कोरोना के कारण इस वर्ष ग्रीष्म तथा शरद उत्सव आयोजित नहीं किये जा सके। वर्तमान में यहां दिनांक2-11-2020 से 7 दिवसीय सामवेद पारायण एवं गायत्री महायज्ञ चल रहा है जिसमें भजन व उपदेश भी होते हैं। दिनांक 5-11-2020 को प्रातः सामवेद पारायण एवं गायत्री यज्ञ हुआ। उसके बाद पं. नरेश दत्त शर्मा जी के भजन एवं प्राकृतिक चिकित्सक डा. विनोद कुमार शर्मा जी का व्याख्यान हुआ। अपरान्ह 3.00 बजे से सामवेद परायण यज्ञ हुआ जो दो घंटे तक चला। इसके बाद देवबन से पधारे आर्य विद्वान पं. राजवीर आर्य जी और पं. नरेशदत्त आर्य, बिजनौर के भजन हुए। कार्यक्रम का समापन डीएवी महाविद्यालय के प्रोफेसर डा. नवदीप कुमार जी के सम्बोधन से हुआ।

 

डा. नवदीप कुमार जी ने कहा कि हम वेदों के देवपथ का अनुसरण नहीं करते। इसलिये समाज में अनेक विडम्बनायें विद्यमान हैं। विद्वान वक्ता ने मुस्लिम समाज की चिन्तनधारा का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस समुदाय की देश व विश्व में बड़ी संख्या है। उन्होंने साम्यवादी चिन्तनधारा का भी उल्लेख किया। रूस तथा चीन ने इस विचारधारा को अपनाया था। विगत 70 वर्षों में यह विचारधारा अप्रासगिक हो गई। इसका कारण साम्यवाद में नास्तिकता के विचार होना है। विद्वान वक्ता ने बौद्ध चिन्तनधारा का भी उल्लेख किया और कहा कि इस विचारधारा ने देश को हानि पहुंचाई है। इस विचारधारा के कारण हमारे अशोक आदि शासक शान्त हो गये थे। उन्होने क्षात्र धर्म का पालन छोड़ दिया था। बौद्ध मत के प्रसार से देश को लाभ नहीं हुआ। डा. नवदीप कुमार जी ने जैन मत की भी चर्चा की। निष्कर्ष रूप में उन्होंने कहा कि देश व मानव समाज की सभी समस्याओं का समाधान वैदिक विचारधारा से ही हो सकता होता है।

वैदिक धर्म परम्परा में हम 50 वर्षों तक प्रवृत्ति मार्ग का अनुसरण करते हैं। हम आयु के प्रथम भाग में25 वर्षों तक पूर्ण ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हैं जिससे हम100 वर्ष तक स्वस्थ रह सकें। ब्रह्मचर्य आश्रम में हम विद्या का अभ्यास करते हैं जिससे अविद्या का नाश होता है। विद्या का अध्ययन कर हम ज्ञान से सम्पन्न होते हैं। हमारे जीवन का एक एक पल मूल्यवान बन जाता है। हम ब्रह्मचर्य काल के बाद गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर उसके लिये बनाये गये नियमों का पालन करते हुए आयु को व्यतीत करते हैं। गृहस्थ जीवन के बाद हमारा आत्मिक व आध्यात्मिक जीवन व्यतीत होता है। यह पचास वर्ष से आरम्भ होता है और मृत्यु पर्यन्त चलता है। इस जीवन का लक्ष्य परमात्मा के साथ भेंट करना होता है। इससे हमारे जीवन तथा परजन्म के दुःखों की निवृत्ति होती है। इस वानप्रस्थ तथा संन्यास आश्रम में किये गये आचरणों से हम मोक्ष अवस्था तक पहुंचते हैं। विद्वान वक्ता ने बताया कि मनुष्य को मोक्ष मिलना सरल नहीं है। 50 वर्ष की अपनी आयु होने पर वैदिक धर्मी मोक्ष प्राप्ति हेतु तैयारी करते हैं। इस जीवन काल में हम धर्म कर्मों का संचय करते हैं। हमारी कामनाओं में धर्म की मर्यादा का होना आवश्यक होता है। हमारी विडम्बना यही है कि हम व हमारे बन्धु धर्म पर स्थित नहीं रह पाते हैं।

डा. नवदीप कुमार जी ने कहा कि समाज परिवारों से मिलकर बनता है। समाज से ही राष्ट्र बनता है। राष्ट्रों से विश्व बनता है। उन्होंने कहा कि सारा वातावरण व आवा बिगड़ा पड़ा है। हम वैदिकधर्मी संख्या में अन्यों से भले ही कम हों परन्तु हमारी विशेषता यही है कि हम संसार की सबसे प्राचीन व उपयुक्त वैदिक विचारधारा के विषय में सोचते रहे हैं और अब भी इसका पालन करते हैं। डा. नवदीप कुमार जी ने अग्निहोत्र यज्ञ की चर्चा भी की। यज्ञ में हम बीसियों बार‘इदन्न न मम’ का उच्चारण करते हैं। इसका अर्थ होता कि मैं अग्नि देवता को जो आहुतियां दे रहा हूं वह मेरी नहीं है। हमारा शरीर भी हमारा नहीं है। हमारा शरीर हमें ईश्वर द्वारा दिया हुआ है। इसलिए हम अपने शरीर को ईश्वर को अर्पित करने को तैयार रहते हैं। विद्वान वक्ता ने बताया कि उन्होंने भारत की राजनीति में आर्यसमाज की चिन्तन धारा पर शोध कार्य किया है। देश की आजादी के नरम व गरम आन्दोलनों में आर्यसमाज के अनुयायियों की संख्या सर्वाधिक थी। हमारे क्रान्तिकारियों ने अपने शरीर व जीवन को अपना नहीं समझा। उन्होंने अपना जीवन व शरीर देश को अर्पित कर दिया। विद्वान वक्ता ने इस प्रकरण में साम्यवादी सोच का भी उल्लेख किया और कहा कि वह मानते हैं कि शासक शोषण की सोच वाला व्यक्ति होता है। वह लाखों की संख्या में जनता का शोषण करता है। उसकी हत्या किये जाने को वह उचित मानते हैं। डा. नवदीप कुमार जी ने कहा कि सन् 1917 में रूस में क्या नहीं हुआ।

डा. नवदीप कुमार जी ने अपने व्याख्यान को जारी रखते हुए कहा कि मिल बांट कर खाने का विचार कहां से आता है? डा. नवदीप जी ने वर्तमान में चल रहे सरकार व कृषकों के संकट की स्थिति पर भी अपने विचार प्रस्तुत किये। उन्होंने आगे कहा कि यूरोप वैदिक विचारधारा पर नहीं चला था इसलिये वहां पर साम्यवादी विचारधारा आई। उन्होंने कहा कि हमारी आज की शिक्षा व्यवस्था में गुरु व शिष्य का परस्पर आत्मिक संबंध नहीं हो पाता। उन्होंने कहा कि आज का शिक्षक अपने शिष्यों को प्रश्न करने की अनुमति नहीं देता जबकि हमारी वैदिक शिक्षा व्यवस्था में शिष्य को प्रश्न व प्रतिप्रश्न करने की स्वतन्त्रता थी और इसे अच्छा माना जाता था। वर्तमान समय में भी गुरुकुलों व आर्यसमाजों में इसका पालन किया जाता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान के शिक्षक शिष्य द्वारा प्रश्न पूछने को अध्ययन में बाधा मानते हैं। धार्मिक क्षेत्र की विडम्बनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज हमारे तीन धर्म कथाकार अपराधिक कार्यों से जेलों में हैं। उन्होंने कहा कि जहां वोट तंत्र होता है वहां जनतंत्र समाप्त हो जाता है।

डा. नवदीप कुमार जी ने कहा कि ऋषि दयानन्द प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने आर्यसमाज जैसी प्रखर धार्मिक एवं सामाजिक संस्था में चुनाव की जनतंत्रीय प्रणाली को अपनाया था। उन्होंने कहा कि ऋषि दयानन्द की सहमति से काम करने की इच्छा थी न की आजकल कि वोट प्रणाली को अपना कर व्यवस्था को संचालन करने की। विद्वान वक्ता ने कहा कि वेद के एक एक मन्त्र ने परमात्मा ने जीवन जीनें के तरीके बताये हैं। उन्होंने इसका उदाहरण प्रस्तुत हुए कहा कि एक वेद मन्त्र में ईश्वर से प्रार्थना है कि मुझे श्रेष्ठ धन प्रदान करो। हमारा धन श्रेष्ठ धन हो। किसी का शोषण व अन्याय पूर्वक प्राप्त किया गया धन नहीं होना चाहिये। उन्होंने कहा कि वेदों में शिक्षा है कि सौ हाथों से धन कमाओं व हजार हाथों से उसे दान करों अर्थात् व निर्धन व निर्बलों में वितरित करो। धर्म के नियमों का पालन करते हुए कमाया गया तथा निर्बलों में वितरित धन ही सुधन होता है। ऐसा धन ही श्रेष्ठ धन होता है। उन्होंने कहा कि हम जो भी काम करें वह आदर्श रूप में करें।

ऋषि दयानन्द तथा वेदभक्त डा. नवदीप कुमार जी ने कहा कि ईश्वर की उपासना तथा वेद धर्म का पालन करने से हमारे सभी मल, विक्षेप तथा आवरण दूर होंगे। इसके बाद सबने मिलकर ब्रहम यज्ञ अर्थात् ईश्वर का ध्यान वा सन्ध्या की जिसे पं. सूरत शर्मा जी ने करायी। सभा व सत्संग का संचालन आर्य विद्वान तथा ऋषि भक्त श्री शैलेशमुनि सत्यार्थी, हरिद्वार ने बहुत उत्तमता से किया। उन्होंने बीच बीच में अनेक महत्वपूर्ण प्रेरक प्रसंग भी प्रस्तुत किये और आर्यसमाज के नियमों व परम्पराओं की दृणता से पालन करने की प्रेरणा की। शान्तिपाठ के बाद अपरान्ह का सत्र समाप्त हुआ। आयोजन दिल्ली व हरयाणा आदि अनेक स्थानों से पधारे हुए धर्मप्रेमी स्त्री पुरुष उपस्थित थे।

-मनमोहन कुमार आर्य

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