images (33)

महाभारत की अनसुनी कहानियां – 2
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

महाभारत की ही एक दूसरी अनसुनी कहानी “व्याध गीता” की कहानी है। तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो ये कहानी बहुत ज्यादा “अनसुनी” भी नहीं कही जानी चाहिए क्योंकि इस कहानी का जिक्र स्वामी विवेकानन्द ने विस्तार से किया है। अगर विवेकानन्द समग्र ना भी पढ़ा हो तो स्वामी विवेकानन्द के “कर्म योग” की पुस्तक में “व्याध गीता” की कहानी ढूंढना मुश्किल नहीं होगा। व्याध गीता की कहानी कई वजहों से महत्वपूर्ण हो जाती है। इनमें से एक वजह तो ये है कि अक्सर लोग “गीता” का मतलब “भगवद्गीता” ही मान लेते हैं। अगर स्पष्ट ना किया गया हो कि किस “गीता” की बात हो रही है, तो अधिकांशतः ये सही भी होगा। अगर विस्तार में जाएँ तो “गीता” का अर्थ सिर्फ गायन होगा, जो किसी का भी हो सकता है।

 

कितनी “गीता” होती है इसका जवाब देना जरा मुश्किल काम है। अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग नामों से कई “गीता” मिल जाएँगी। अष्टावक्र और राजा जनक के संवाद से “अष्टावक्र गीता” होती है, ऐसे ही दत्तात्रेय की “अवधूत गीता” है। राम गीता, गणेश गीता, शिव गीता, देवी गीता भी अलग अलग ग्रंथों में आते हैं। ऋषि कपिल और उनकी माता देवहूति का संवाद “कपिल गीता” है, ऐश्वर्य छोड़कर भिक्षा पर जीवन व्यतीत करना शुरू करने वाले भिक्षुकों की “भिक्षुक गीता” भी है। हंस गीता, गुरु गीता, और रूद्र गीता भी प्रचलित हैं। एक गीता का नाम “मंकि गीता” है जो 54 श्लोकों में ऋषि मंकि के चरित्र के जरिये शिक्षा देती है। अकेले महाभारत में ही देखें तो कई गीता मिलती हैं, जैसे श्री कृष्ण जब दोबारा ज्ञान दे रहे होते हैं तो उसे “अनुगीता” कहते हैं।

महाभारत में ही शुरुआत के हिस्से में आने वाली व्याध गीता की कहानी भी कम सुनाई देने वाली कहानियों में से है। इसकी कहानी एक कौशिक नाम के ब्राह्मण से शुरू होती है। वो शिक्षित था और साधना के लिए पास ही के वनों में जाया करता था। सतत अभ्यास से उसे कुछ सिद्धियाँ भी मिलने लगीं, लेकिन शुरुआत ही थी, तो कौशिक को उनका ज्ञान नहीं था। एक दिन कौशिक किसी पेड़ के नीचे बैठे साधना कर रहे थे की एक बगुली (बगुला का स्त्रीलिंग बगुली कर दिया है) पेड़ पर आकर बैठी और उसने कौशिक पर बीट कर दी। क्रुद्ध कौशिक ने जैसे ही ऊपर देखा तो उनकी दृष्टी भर पड़ने से पक्षी भस्म होकर धरती पर गिर पड़ी। अपनी साधना की शक्ति देखकर कौशिक अचंभित भी हुए और प्रसन्न भी। थोड़ी देर में वो भिक्षाटन के लिए चल पड़े।

जहाँ वो भिक्षा मांगने पहुंचे वहां स्त्री कुछ व्यस्त थी। कौशिक को प्रतीक्षा करनी पड़ी। प्रतीक्षा करते हुए भूखे कौशिक देख रहे थे कि स्त्री अपने पति को बड़े प्रेम से भोजन दे रही है। क्रुद्ध होते जा रहे कौशिक के पास जबतक वो ग्रहिणी आई तबतक कौशिक उसे क्रुद्ध दृष्टि से देख रहे थे। स्त्री मुस्कुराई और कहा, ब्राह्मणश्रेष्ठ, मैं कोई बगुली नहीं हूँ जो आपकी क्रोध भरी दृष्टि से भस्म हो जाऊं! अब तो कौशिक को सदमा लग गया। एक तो उनकी साधना का एक साधारण गृहणी पर कोई असर नहीं हो रहा था, ऊपर से वन में जहाँ उन्हें अभी अभी ये सिद्धि मिली थी वहां उन्हें किसी ने देखा नहीं था। इतनी दूर किसी गृहणी को घर बैठे भला उसका पता कैसे चल गया? अब तो अपनी भूल पर कौशिक ने तुरंत हाथ जोड़े।

स्त्री से पूछने पर पता चला कि जो सिद्धियाँ अन्य लोगों के लिए कठिन साधना और अभ्यास से उपलब्ध होती हैं वो तो उसे स्त्री होने के कारण केवल पतिव्रत धर्म के पालन से सहज ही उपलब्ध हैं। जहाँ तक क्रोध ना आने और ज्ञान का प्रश्न था, ये सब उन्होंने मिथिलांचल में रहने वाले अपने गुरु से सीखा था। उस गृहणी के बताने पर कौशिक मिथिलांचल पहुंचे। थोड़ी पूछताछ करने पर कुछ द्विजों ने उन्हें धर्म-व्याध के घर का रास्ता भी बता दिया। वहां पहुँचने पर कौशिक ने देखा कि धर्म-व्याध ग्राहकों को मांस बेचने में व्यस्त है। थोड़ी देर प्रतीक्षा करने पर धर्म-व्याध ने उनसे बात की, उन्हें अपने घर ले गया और फिर जो दोनों की बातचीत हुई, उसे “व्याध गीता” के नाम से जाना जाता है।

अगर इस कहानी के अनसुनी कहानियों में होने के कारणों पर सोचें तो कई कारण निकलते हैं। एक तो सबसे बड़ा कारण ये है कि दशकों की मेहनत से गढ़े गए आयातित विचारधारा के कथानक (नैरेटिव) को ये कहानी बड़ी बुरी तरह तोड़ देती है। जैसे कि कहा जाता है कि किस्से-कहानियां केवल राजा-रानियों के होते हैं। अब इस कहानी के किरदार कोई साधारण सा ब्राह्मण, कोई गृहणी और एक व्याध हैं। दूसरा कि स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार नहीं मिलता था, और मिलता भी था तो रानियों-राजकुमारियों को मिलता था। यहाँ एक सामान्य गृहणी कहीं कोसों दूर के राज्य में स्थित अपने गुरु का परिचय दे रही है, यानी शिक्षा ले सकती थी। ऊपर से कहा जाता है कि शिक्षा देने का काम धूर्त बामनों ने हथिया रखा था, तो यहाँ गुरु व्याध है और उल्टा ब्राह्मण ही उससे शिक्षा लेने जा रहा है। अब जो दशकों से बनाए कथानक (नैरेटिव) को ऐसे ध्वस्त करे, उसकी कहानी कैसे सुनाते?

इन सब के अलावा भी कहानी में ध्यान देने योग्य बातें हैं। जैसे गृहणी के अपने सामान्य काम काज को ही पतिव्रत धर्म के पालन की तरह कर रही हो तो उसे सिद्धियों पर भी अधिकार मिल जाता है, ऐसा वो गृहणी बता रही होती है। ऐसे में जप-तप करना तो स्त्रियों के लिए वैसा ही होता जैसे कोई पीएचडी की डिग्री लेकर फिर दसवीं की किताबें पढ़ने बैठे! यानी तुम्हें ये अधिकार नहीं मिला, वो अधिकार नहीं मिला, जैसे जुमले दागकर जो समानता के अधिकारों के नाम पर बरगलाया जाता है, वो भी इस कहानी को आम कर देने से मुश्किल हो जाता है। सामाजिक या आर्थिक दृष्टि से देखें तो उस काल में भी राजा जनक का क्षेत्र मानी जाने वाली मिथिला में व्याध मांस बेचने का व्यवसाय करता दिखता है। कई तथाकथित गांधीवादी जो शाकाहार प्रवर्तक बनकर बरगलाने की कोशिश करते हैं उनके लिए भी “व्याध गीता” के बारे में बात करना मुश्किल हो जाता है।

बाकी कहानी तो हमने बता ही दी है, और व्याध गीता को वन पर्व के 210वें अध्याय से देखा जा सकता है। इस गीता का विस्तार ब्रह्मचर्य पर भी काफी कुछ सिखा सकता है, इसलिए खुद ही देखें तो बेहतर होगा।

ये पहले ही तय है कि हिन्दुओं के महाकाव्यों के लक्षण क्या होंगे | उसमें चारों पुरुषार्थों का जिक्र होना चाहिए | सिर्फ धर्म की बात नहीं होगी, सिर्फ़ मोक्ष का जिक्र नहीं होगा | वहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों होंगे | इसलिए जब आप रामायण या महाभारत पढ़ रहे हैं, सुन रहे हैं और सिर्फ़ आह-वाह करके भावविभोर हो रहे हैं तो आपने आधा ही पढ़ा है | ये भी एक वजह है कि आपको ऐसे ग्रन्थ बार बार पढ़ने पड़ते हैं | अगर आप महाभारत का आखरी हिस्सा यानि स्वर्गारोहण वाला हिस्सा देखेंगे तो धर्म-मोक्ष से अलग एक ऐसा ही सवाल आपके मन में उठेगा |

यहाँ जब पांचो पांडव और द्रौपदी हस्तिनापुर छोड़कर निकलते हैं तो एक रेगिस्तान जैसे इलाके में से गुजर रहे होते हैं | यहाँ ना कोई पेड़ पौधा है ना कोई जीव जन्तु | एक एक कर के सभी गिरने लगते हैं और अकेले युधिष्ठिर ही आगे एक कुत्ते के साथ बढ़ते रह जाते हैं | सबसे पहले द्रौपदी गिरती है | उसके गिरने पर भी जब सभी आगे बढ़ते रहते हैं तो भीम पूछते हैं कि द्रौपदी क्यों गिरी ? युधिष्ठिर बताते हैं कि द्रौपदी पाँचों भाइयों में अर्जुन से ज्यादा प्रेम करती थी, बाकी सब से कम | इसलिए वो सबसे पहले गिरी |

द्रौपदी गिरी थी, मृत नहीं थी | युधिष्ठिर का जवाब उसने भी सुना होगा | सवाल है कि ये सुनने के बाद द्रौपदी ने क्या सोचा होगा ?

स्वयंवर में उसकी शर्तों को सिर्फ अर्जुन ने पूरा किया था | ऐसे में उसके मन में केवल अर्जुन के लिए ही भाव जागे थे तो गलत क्या था ? आगे जब स्वयंवर के बाद का महाभारत भी देखते हैं तो एक और चीज़ पर ध्यान जाएगा | एक प्रेमिका, एक पत्नी की तरह द्रौपदी को सिर्फ भीम स्थान देते हैं | कभी उसके पसंद के फूल लाने गए भीम राक्षसों और मुश्किलों का सामना कर के फूल लाते हैं | कभी जुए में द्रौपदी को दाँव पर लगाने वाले युधिष्ठिर पर चढ़ बैठते हैं | युधिष्ठिर को कह देते हैं कि ये पासे फेंकने वाले तुम्हारे हाथ जल क्यों नहीं जाते ? बड़ी मुश्किल से अर्जुन पकड़ कर सभा में, भीम को रोकते हैं |

महाभारत में द्रौपदी की स्थिति को पांच पतियों वाली विधवा जैसा दर्शाया गया है | पांच पतियों के होते हुए भी जुए वाली सभा में उसे बचाने उसके पति नहीं आये थे | सिर्फ भीम लड़ने को तैयार थे, जिन्हें बाकी भाइयों ने रोका | आगे वनवास में द्रौपदी पर नजर जमाये जयद्रथ को भी भीम का सामना करना पड़ता है | अज्ञातवास के दौरान जब कीचक की कुदृष्टि द्रौपदी पर थी तब भी उसे भीम ने ही मारा | कैसे देखें इसे, एकतरफा प्रेम जैसा ?

प्रश्न है कि प्रेम या विवाह किया कैसे जाना चाहिए ? जिसे आप पसंद करते हैं उस से, या जो आपको पसंद करता है उस से ? जैसे द्रौपदी को अर्जुन पसंद था वैसे, जैसे भीम को द्रौपदी पसंद थी वैसे, या फिर जैसे अर्जुन ने किया था ? उसने सुभद्रा से शादी की थी, जो उसका हरण कर के ले गई थी | अर्जुन ने उलूपी से शादी की थी वो भी अर्जुन का हरण कर के ले गई थी | अर्जुन ने चित्रांगदा से भी शादी की थी, जिसने उसे अपने घर में ही रख लिया था | संबंधों के मामले में अर्जुन शायद द्रौपदी से ज्यादा सुखी रहा |

हिन्दुओं के महाकाव्यों में प्रश्न अपने आप आते हैं | उत्तर आपको खुद भी पता है, किसी और से सुनने की जरूरत भी नहीं | ज्यादातर बार उत्तर, प्रश्न से पहले ही बता दिए गए होते हैं | बिलकुल आपके स्कूल की किताबों जैसा है | पहले चैप्टर ख़त्म होता है, फिर अंत में एक्सरसाइज और क्वेश्चन होते हैं | प्रश्नों के उत्तर पीछे के अध्याय में ही कहीं हैं, आपको पीछे जाकर ढूंढना होता है |

बाकी ये सूचना क्रांति का युग है | आपकी जानकारी जितनी ज्यादा है आप उतने ज्यादा शक्तिशाली होते हैं | ऐसे में अगर आपका विरोधी आपको किसी किताब की बुराई गिना रहा हो तो याद रखिये कि उसमें ऐसी कोई ना कोई जानकारी है जो आपको विरोधी से ज्यादा जानकार, ज्यादा शक्तिशाली बनाती होगी | आह-वाह करने के बदले ग्रन्थ उठा कर पढ़ लीजिये |

कई साल पहले, यूँ कहिये कि सदियों पहले की बात है | एक बार एक कानून के शिक्षक के पास एक ऐसा छात्र आया जो सीखना तो चाहता था, लेकिन गरीब था | यानी फीस नहीं भर सकता था | शिक्षक से थोड़ी देर बात करने के बाद उसने शिक्षक के सामने अपनी पेशकश रखी | उसने कहा कि जिस दिन वो अदालत में अपना पहला मुकदमा जीत गया, उस दिन वो पैसे चुका देगा | शिक्षक राज़ी हो गए | लड़के ने सीखना शुरू किया, आखिर पढाई पूरी हुई |

जब छात्र अदालत भी जाने लगा तो शिक्षक ने अपने पैसे मांगने शुरू किये | लड़का आज कल करता रहा, टालता रहा | आखिर शिक्षक परेशान हो गया और मामले को अदालत में ले जाने की धमकी दी | बात बढ़ी तो आखिर मुकदमा शुरू भी हो गया | दोनों ने अपना अपना मुकदमा खुद ही लड़ने का फैसला किया |

शिक्षक ने अपना तर्क रखा | उन्होंने कहा, अगर मैं ये मुकदमा जीत जाता हूँ तो अदालत के कानून के मुताबिक, लड़के को पैसे देने होंगे, क्योंकि कानूनी तौर पे पैसे ना देने का मुकदमा है | अगर कहीं मैं मुकदमा हार जाता हूँ तो भी तुम्हें पैसे देने होंगे, क्योंकि हमारे बीच तय तो यही हुआ था कि जैसे ही तुम कोई मुकदमा जीतोगे मुझे पैसे दोगे | दोनों हाल में मुझे तो पैसे मिलने ही हैं |

छात्र सबसे होनहार छात्र था | उसका तर्क था, अगर मैं जीता तो अदालत के कानून के मुताबिक मुझे पैसे नहीं देने होंगे, क्योंकि कानूनी तौर पर मेरे ऊपर कोई देनदारी बनती नहीं यही मुझे साबित करना है | अगर कहीं मैं हार गया तो भी मुझे पैसे नहीं देने क्योंकि हमारे बीच तयशुदा तो यही था कि पहला मुकदमा जीतने पर मुझे पैसे देने हैं | मैं मुकदमा तो जीता नहीं ! इसलिए दोनों हाल में मैं पैसे तो नहीं देने वाला |

ऐतिहासिक रूप से दर्ज द्वंदों का ये सबसे अच्छा उदाहरण है | आखिर कौन जीता और सही कौन था ?

ये प्राचीन ग्रीक इतिहास का हिस्सा है | कानून के शिक्षक थे प्रोटागोरस (c.485-415 BCE) और छात्र थे यूथालोस | इसे प्रोटागोरस द्वन्द (Protagoras’s Paradox) के नाम से जाना जाता है | ये मामला सुलझ नहीं पाया था | अच्छी बात ये है कि कानून के विश्वविद्यालय आज भी इसे तार्किक क्षमता के प्रश्न के तौर पर इस्तेमाल करते हैं |

अगर आप समझ रहे हैं कि आपने कोई पुराना सा कानून से सम्बंधित किस्सा पढ़ा है तो आप अब गलत समझ रहे हैं | दरअसल हमने धोखे से आपको श्रीमद भगवद्गीता का तेरहवां अध्याय पढ़ा दिया है | इस अध्याय का मुख्य विषय ये है कि हमारा शरीर एक लघु विश्व की ही भांति है | ये पांच तत्वों से बना है और जैसे कि हर सृष्टि के साथ होता है, इसके पीछे भी एक सर्जक हैं | हम उन्हें अलग अलग नामों से पुकार सकते हैं लेकिन जैसे कपास से धागा, धागे से कपड़े का थान , फिर उस थान से वस्त्र हो जाते हैं |

पहला तर्क ये होता है कि हमारी पांच इन्द्रियों से जो हम महसूस करते है वो दिमाग के बिना नहीं हो सकता | सोचने का काम दिमाग से होता है | लेकिन जब आप पेड़ पौधों को देखेंगे तो उनमें तो कहीं दिमाग होता ही नहीं | लेकिन जिधर से धुप आ रही हो उधर उसकी डालियाँ मुड़ती हैं, जिधर पोषण हो, जड़ें उसी तरफ बढ़ने लगती हैं ! ये अपने आप कैसे ? तो ऐसे द्वंदों का जवाब होता है कि कोई और शक्ति भी है जो जड़ और चेतन को नियंत्रित करती है | आप कितने नियंत्रण में है ये तय करता है कि आप कितने चेतन हैं | जैसे कुर्सी से पेड़, ज्यादा चेतन है, पेड़ से ज्यादा चेतन पशु-पक्षी | पशु पक्षियों में भी चेतना का स्तर अलग अलग होगा, ऐसे ही मनुष्य चेतना के सबसे ऊपर के स्तर पर होता है | चेतना के लिए हम अपनी इन्द्रियों पर निर्भर हैं और उन्हीं में से मन भी एक है जो हमें सुख और दुःख की अनुभूति करवाता है | (भगवद्गीता 13.05-06)

भगवान का वर्णन नहीं किया जा सकता क्योंकि वो इन इन्द्रियों के अंतर्गत नहीं आते, पंचभूतों में भी नहीं आते | वो पास भी होते हैं और विषम द्वन्द की तरह दूर भी होते हैं | (भगवद्गीता 13.12-18) भगवद्गीता दरअसल आपको ऐसे ही द्वन्द याद दिलाती है | वो बताती है कि इस द्वन्द का आभास तभी तक है जब तक आप दो चीज़ों को अलग अलग मानते हैं | जो ब्रह्म को जानता है, वो ब्रह्म जैसा ही हो जाता है | (भगवद्गीता 18.55) यही कारण है कि गीता कहती है आपके शरीर के अन्दर की आत्मा दर्शक भी होगी, मार्गदर्शक भी, सहायक भी, भोक्ता भी और नियन्ति भी | ये आत्मा सबमे है इसलिए किसी को दुःख ना पहुंचा कर, सबके साथ सामान व्यवहार करना चाहिए | (भगवद्गीता 13.28, 13.22)

अब जब आप ध्यान देंगे तो दिखेगा कि मैंने सिर्फ द्वन्द याद दिलाये हैं | किसी द्वन्द को सुलझाया नहीं है | ये द्वन्द हर व्यक्ति के लिए अपने अपने अलग अलग होते हैं | मिलते जुलते से हो सकते हैं, एक नहीं होते | किसी भी समस्या को सुलझाने का पहला कदम होता है अपनी समस्या को परिभाषित करना | ये तेरहवां अध्याय प्रोटागोरस और उनके छात्र यूथालोस की तरह आपको अपनी समस्या परिभाषित करना सिखाता है | द्वन्द कहाँ होंगे उन्हें सामने प्रत्यक्ष में लाता है |

बाकी ये नर्सरी लेवल का है, और पीएचडी के लिए आपको खुद पढ़ना पड़ेगा ये तो याद ही होगा ?
✍🏻आनन्द कुमार जी की पोस्टों से संग्रहित

Comment:

betparibu giriş
efesbet giriş
efesbetcasino giriş
efesbetcasino giriş
noktabet giriş
noktabet giriş
betplay giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
noktabet giriş
noktabet giriş
batumslot giriş
vaycasino giriş
betplay giriş
efesbet giriş
efesbetcasino giriş
efesbet giriş
betnano giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
yakabet giriş
yakabet giriş
betplay giriş
betplay giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
fiksturbet giriş
noktabet
noktabetgiriş
noktabet
noktabetgiriş
noktabet
noktabetgiriş
noktabet
noktabetgiriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
Restbet giriş
Restbet güncel
vaycasino giriş
vaycasino giriş
meybet giriş
meybet giriş
betpark giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
casival
casival
betplay giriş
betplay giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
maritbet giriş
maritbet giriş
betplay giriş
betplay giriş
timebet giriş
timebet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
nesinecasino giriş
roketbet giriş
betci giriş
betci giriş
roketbet giriş
nisanbet giriş
İmajbet giriş
İmajbet giriş
Safirbet giriş
Safirbet giriş
İmajbet giriş
piabellacasino giriş
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
betpark giriş
betplay
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
betnano giriş
timebet giriş
timebet giriş
hititbet giriş
norabahis giriş
hititbet giriş
norabahis giriş
grandpashabet
grandpashabet
nitrobahis giriş
betorder giriş
betorder giriş
betbox giriş
betbox giriş
betnano giriş
nitrobahis giriş
maritbet giriş
maritbet giriş
katlabet giriş
katlabet giriş
betorder giriş
betorder giriş
holiganbet giriş
kolaybet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
betorder giriş
casival
casival
vaycasino
vaycasino
betorder giriş
katlabet giriş
katlabet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
meybet giriş
betorder giriş
betorder giriş
meybet
meybet
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
casival
casival
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
wojobet
wojobet