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आज का चिंतन

आज का चिंतन-03/08/2013

कृपा चाहें तो सिर्फ ईश्वर की
इंसान क्या दे सकता है?

डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
मनुष्य ईश्वर का अंश है और उसे जो कुछ प्राप्त करना है उसके लिए कर्मयोग में रमते हुए सब कुछ ईश्वर से ही पाने की कामना रखनी चाहिए। अपने काम-धंधो और तमाम प्रकार की सांसारिक प्रवृत्तियों में जुटे रहते हुए भी भगवान का स्मरण यदि नित्य बना रहे, ईश्वर के प्रति अगाध आस्था व अनन्य श्रद्धा का शाश्वत भाव जारी रहे तो जीवन में पग-पग पर सफलता और आनंद का अनुभव किया जा सकता है।पर आजकल हममें से अधिसंख्य लोग सर्वशक्तिमान ईश्वर की शक्तियों से अनभिज्ञ होकर इंसानों की पूजा में लग गए हैं। जब से हमने ईश्वर की बजाय इंसानों को महत्त्व देना शुरू कर दिया है तभी से हमें प्राप्त होने वाले शाश्वत आनंद और कर्मयोग में चरम स्तर की सफलता का ग्राफ कम होता चला गया।एक मनुष्य आखिर कितना दे सकता है? उसकी अपनी संकीर्ण सीमाएँ हैं। जबकि दूसरी ओर ईश्वर अपरिमित वैभव, आनंद और दैवी संपदा का स्वामी है जिसकी कृपा से वह सब कुछ प्राप्त हो सकता है जो हमारी कल्पनाओं में होता है। बल्कि इससे भी आगे बढ़कर वह शाश्वत आनंद, तृप्ति और सब कुछ दे देता है।

इंसान अपने महानतम सामथ्र्य और मनुष्य की शक्तियों से बेखबर है। उसे अपनी छोटी-मोटी ऎषणाओं की पूत्रि्त, जायज-नाजायज स्वार्थों की भरपाई, कुकर्मों और बुराइयों तथा भ्रष्टाचार को ढंकने तथा कमजोरियों को छिपाये रखने के लिए उन लोगों को सहारा लेना पड़ रहा है जो उसी की तरह या उससे भी कहीं अधिक मामलों में उसी के स्वभाव के हैं।ये किसी भी किस्म के हो सकते हैं जिनसे आदमी को अपने काम पूरे होने या स्वार्थपूत्रि्त का भरोसा होता है। यही कारण है कि आजकल लोग ईश्वर को भुला कर ऎसे-ऎसे लोगों की शरण में घुस आए हैं जिन्होंने अपने आपको अधीश्वर की तरह प्रतिष्ठित कर रखा है।जिस अनुपात में लोभियों की भीड़ हुआ करती है उसी अनुपात में धूत्र्तों और पाखण्डियों की संख्या भी हर युग में बनी रहती है जो आपस में एक-दूसरे के काम भी आते हैं और कभी कुछ मनमुटाव हो जाए तो एक-दूसरे का काम तमाम कर डालने तक में पीछे नहीं रहते।

एक समय वो था जब लोग किसी के पूछने पर कहा करते थे – भगवान की कृपा से सब ठीक-ठाक चल रहा है, रामजी राजी हैं। अब आदमी इतने नीचे गिर गया है कि जब किसी बड़े आदमी के पास पहुँचता है तब कावड़ की तरह झुककर नमन करता है और कहता है – आपकी कृपा है, आपकी दया है… आदि-आदि।

यह सब सुनकर वह भी खूब बाग-बाग हो जाता है जो बड़ा आदमी कहा जाता है और भाग्य या परिस्थितियों की वजह से जिसके पास किसी न किसी तरह का पॉवर आ जाता है, भले ही वह चार दिन की चाँदनी वाला ही क्यों न हो।स्वार्थों में डूबा आदमी इसी तरह ईश्वर को भुलाकर उन लोगों की दया या कृपा पाने के फेर में जिन्दगी भर अलग-अलग डेरों में जाता हुआ इन आधुनिक भौंपों-भल्लों को बदलता रहता है और अपने उल्लू सीधे करता रहता है। सभी लोग खुश हो जाते हैं, कोई उल्लू बनकर, तो कोई उल्लू बनाकर। एक-दूसरे को बनाने के इस खेल का नाम ही संसार हो गया है।

जो लोग बात-बात में किसी इंसान के आगे गिड़गिड़ाते हुए अथवा सामने वाले को खुश रखने के लिए ‘आपकी कृपा है, आपकी दया है…’ जैसे जुमले इस्तेमाल करने के आदी हो गए हैं उनसे ईश्वर नाराज ही रहता है और फिर ऎसे लोग ईश्वरीय दिव्य कृपा से वंचित होने लगते हैं।

जो लोग अपने आपको स्वयंभू अधीश्वर मान बैठे हैं उनसे भी ईश्वर अप्रसन्न रहता है और यही कारण है कि जो लोग अहंकार के मारे अपने आपको बहुत बड़ा और लोकप्रिय समझने लगते हैं और लोगों पर अपनी दया, करुणा या कृपा बरसने का भ्रम पाले हुए हैं, उनके पास आसुरी सम्पदा का भण्डार भले ही भरता चला जाए, मगर इन लोगों के भीतर से दैवीय और दिव्य गुण अपने आप पलायन कर जाते हैं। यहाँ तक कि इन लोगों में वे सारे गुण भी देखने को नहीं मिल पाते जो एक सामान्य इंसान में होने चाहिएं।

रावण, हिरण्यकश्यप, अहिरावण, महिषासुर जैसे ऎसे ही कई पौराणिक पात्रों का हश्र इन लोगों के लिए नई प्रेरणा और सत्य का भान कराने वाला हो सकता है।अपने जीवन का श्रेय किसी इंसान को न दें बल्कि जो कुछ प्राप्त हुआ है उसके लिए ईश्वर के प्रति कृतज्ञ रहें तभी जिन्दगी का असली आनंद पाया जा सकता है। हर क्षण भगवान की कृपा का स्मरण बनाए रखें।

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