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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

सवाल आखिर अस्तित्व का है

 

जम्मू कश्मीर की परिस्थितियां विस्फोटक होती जा रही हैं। हाल ही में जम्मू कश्मीर के तीन पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जिस प्रकार अपनी दुश्मनी भूलकर एक हुए हैं और भारत के विरुद्ध जहर उगल रहे हैं उसको कम करके आंकना बहुत बड़ी गलती होगी। राजनीति के लिए सीधा सा एक सूत्र है कि शत्रु को कभी कमजोर नहीं मानना चाहिए। बात जब देश की संप्रभुता से खिलवाड़ करने वाले लोगों की हो तो उन्हें तो किसी भी स्थिति में खुला नहीं छोड़ना चाहिए। पर एक के बाद एक देशघाती बयान देने के उपरांत भी जम्मू कश्मीर के इन तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों को केंद्र सरकार जिस प्रकार खुला छोड़ रही है, उससे देश की संप्रभुता की चिंता करने वाले प्रत्येक देशवासी की धड़कनें बढ़ती जा रही हैं।
इस संबंध में जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक और सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) ने कहा है कि अगर महबूबा मुफ्ती और फारूक अब्दुल्ला जैसे नेताओं के विस्फोटक बयानों पर शिकंजा नहीं कसा गया तो कश्मीर में पीएम मोदी चमत्कार नहीं दिखा सकेंगे। उनका मानना है कि जम्मू कश्मीर की परिस्थितियों को फिर विस्फोटक बनाने के लिए इन नेताओं की ओर से दिए जा रहे बयानों के लिए स्थानीय नेताओं के साथ साथ भारत सरकार भी दोषी है।

इसका कारण केवल एक ही है कि केंद्र सरकार को तोड़फोड़ की गतिविधियों के लिए लोगों को प्रेरित करने वाले इन नेताओं के विरुद्ध समय पर कठोर कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए। जिसमें केंद्र सरकार इस समय कुछ शिथिलता का प्रदर्शन कर रही है।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जिस समय धारा 370 को हटाने का निर्णय केंद्र सरकार ने लिया था उस समय जम्मू कश्मीर के लोगों ने सरकार के उस निर्णय का हृदय से स्वागत किया था। उसका प्रमाण यह भी है कि बीते एक वर्ष से अधिक के काल में लोगों ने कोई भी ऐसा कार्य नहीं किया जिससे ऐसा लगे कि वे केंद्र सरकार के इस ऐतिहासिक निर्णय के विरोध में थे। पर जैसे ही फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जेल से बाहर आए हैं वैसे ही परिस्थितियां असहज होने लगी हैं।
निश्चय ही इन नेताओं के बयान न केवल पानी में आग लगाने वाले हैं बल्कि इस बार तो ये बर्फ में ही आग लगाने का काम कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते रविवार को अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में जम्मू-कश्मीर के पुलवामा का उल्लेख किया था। उन्होंने यहां के पेंसिल उद्योग के बारे में बातचीत की। देश में लगभग 85 फीसदी पेंसिल यहीं से सप्लाई होती हैं। चिनार की लकड़ी, स्थानीय लोगों का जीवन बदल रही है। पीएम का संदेश था कि युवा आतंक की राह छोड़कर मुख्यधारा में सम्मिलित हों। सरकार उनके विकास के लिए कई तरह की योजनाएं ला रही है। यही क्षेत्र आजकल आतंकी गतिविधियों का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। यहां स्थित मदरसे यानी धार्मिक स्कूलों में पढ़ने वाले युवक बंदूक की तरफ बढ़ रहे हैं।
यदि हम जम्मू कश्मीर में अतीत में हुई कुछ घटनाओं का अवलोकन करें तो आज तेजी से उभरते कई प्रश्नों के उत्तर अपने आप मिल सकते हैं। अब्दुल्ला-राजीव समझौता,  मुफ्ती की बेटी का अपहरण होना, संदिग्ध लोगों का पाकिस्तान जाना, सलाहुद्दीन जैसे लोगों का भारत के खिलाफ खड़े होना और न जाने कितने ऐसे उदाहरण हैं, जो यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि कश्मीर में आतंकवाद क्यों और कैसे आरम्भ हो गया ? घाटी में पत्थरबाजी और नारेबाजी पर अंकुश लगाने में भी सरकार को सफलता प्राप्त हुई थी परंतु अब फिर युवाओं को सही रास्ते से भटकाकर उनके हाथ में पत्थर देने का काम ये नेता कर रहे हैं । अब यह भी समझ में आने लगा है कि इन तीनों नेताओं के पीछे पाकिस्तान और चीन जैसे हमारे परंपरागत शत्रु भी खड़े हैं । इससे पहले की परिस्थितियां बिगड़ें समय रहते इन तीनों देशद्रोही नेताओं के विरुद्ध सरकार को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए और इन्हें उठाकर जेल में डाल देना चाहिए । निश्चित रूप से वहां रखकर उनका ‘ब्रेनवाश’ भी किया जाना चाहिए। हमें फ्रांस जैसे देश से बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है । जिसने अभी हाल ही में एक आतंकी घटना में शिक्षक के गला काट देने के बाद आतंकवादियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की है। ऐसा करके फ्रांस ने सारे संसार के देशों को यह संदेश दिया है कि वह अपनी संप्रभुता से खिलवाड़ करने वाले किसी भी व्यक्ति या संगठन के प्रति नरमी बरतकर अपनी संप्रभुता को खतरे में नहीं डालना चाहता । भारत को भी यह समझ लेना चाहिए कि जो नेता देश के सांप्रदायिक माहौल को बिगाड़ने में लगे हुए हैं या देश की संप्रभुता से खिलवाड़ कर रहे हैं उनसे बड़ा शत्रु इस समय देश के लिए कोई भी नहीं है।
कैप्टन गौर मानते हैं कि कश्मीर में स्थित मस्जिदों और मदरसों में 1990 से पहले वाला सूफियाना’ माहौल अब नहीं रहा। इन संस्थाओं और वहां काम करने वालों की पहचान की जानी भी बहुत आवश्यक है। पुलवामा और शोपियां जिले में स्थित कई मदरसे, जांच एजेंसियों के रडार पर हैं। एक मदरसे के 13 छात्र, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि वे सभी आतंकी संगठनों में भर्ती हो गए थे, वह कश्मीर के इन्हीं जिलों में स्थित है। मदरसे का एक युवक सज्जाद भट्ट, पुलवामा में फरवरी 2019 के दौरान सीआरपीएफ पर हुए हमले में शामिल रहा है। इसमें 40 जवान शहीद हो गए थे।
मदरसे में दक्षिणी कश्मीर के कुलगाम, पुलवामा और अनंतनाग जिलों से अनेक युवक आते हैं। । 1990 से पहले इन मदरसों में कला संस्कृति और शिक्षा की बात होती थी। कैप्टन गौर कहते हैं कि तब यहां मानवता के लिए आवश्यक प्रेम का संदेश मिलता था। जबकि अब यहां पाकिस्तान के संकेत पर युवाओं को फिर से आतंकवादी बनाया जा रहा है। पाकिस्तान एक ओर हमसे मित्रता का हाथ बढ़ा रहा है तो दूसरी ओर वह ‘भारत विनाश’ की योजनाओं में पूर्ण तन्मयता के साथ लगा हुआ है।
जैश, अल बदर और एलईटी जैसे आतंकी संगठनों में अनेक स्थानीय युवक सम्मिलित हो रहे हैं। इसके अलावा सैकड़ों युवाओं को ओवर ग्राउंड वर्कर (OGW) का प्रशिक्षण भी दिया गया है। उन 13 युवाओं में से एचएम के नजीम नाजिर डार और एजाज अहमद पॉल, जिन्हें अगस्त में मारा गिराया गया था, वे भी यहीं के मदरसे से निकले थे।
सरकार को कैप्टन गौर की इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि मदरसों में जिस प्रकार की शिक्षा दी जा रही है वह किसी भी दृष्टि कौन से देश के लिए उचित नहीं है उनका मानना है कि कुरान की अच्छी बातें को न पढ़ाकर उन बातों को यहाँ पढ़ाया जा रहा है जिनसे देश का सांप्रदायिक माहौल बिगड़े । ऐसे में सरकार के लिए यह बहुत आवश्यक हो जाता है कि वह मदरसों को तुरंत अपने नियंत्रण में ले । इतना ही नहीं इन देशद्रोही मदरसों के लिए कौन से देश से फंडिंग हो रही है ? – इसका पता लगाकर फंडिंग के सभी स्रोतों को भी बंद करने की घोषणा समय रहते करनी चाहिए।
कुछ वर्षों से यहां पाकिस्तान के गुर्गों का हस्तक्षेप बढ़ा है। आतंकियों और उनके मददगारों को बागों में आसानी से छिपने की जगह मिल जाती है। यदि केंद्र सरकार को पुलवामा जैसे दूसरे क्षेत्रों में आतंकवाद समाप्त करना है, तो मस्जिदों और मदरसों को अपने नियंत्रण में लेना होगा। नेताओं के भड़काऊ बयानों पर रोक लगानी होगी। सबके विकास की बात हो और गुपकार जैसी बैठकों पर नजर रखी जाए। यदि यह सब होता है तो ही पीएम मोदी की नीति कश्मीर में आतंकवाद को खत्म करने में उपयोगी सिद्ध हो सकेगी।
प्रधानमंत्री मोदी जी को इस बार फिर उसी प्रकार का साहस दिखाना चाहिए जैसा उन्होंने नोटबंदी करके या सर्जिकल स्ट्राइक करके दिखाया था। उन्हें विपक्ष की या देश के धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों या ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ और ‘अवार्ड वापसी गैंग’ के विरोध की चिंता न करके राष्ट्रहित में साहसिक निर्णय लेना चाहिए। वैसे भी देश का जनसामान्य अपने प्रधानमंत्री के साथ है जब देश की जनता प्रधानमंत्री के साथ हो तो फिर विपक्ष के अनर्गल शोर या विरोध का कोई प्रभाव या उनके संभावित विरोध का कोई दबाव प्रधानमंत्री की कार्यशैली पर नहीं दिखना चाहिए। इस समय देश के लोगों की ‘सामान्य इच्छा’ का सम्मान करते हुए प्रधानमंत्री मोदी को कुछ ऐसा करना होगा जिससे देश की एकता और अखंडता से खिलवाड़ कर रहे कश्मीर के नागों का फन कुचला जा सके।
इधर देश के विपक्ष ने निकिता के मामले में मौन रहकर एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि वह देशद्रोहियों को ही अपना ‘दामाद’ मानता है। ऐसे में समझ लेना चाहिए कि देश के लिए चुनौती कितनी बड़ी है और देश का विपक्ष किस प्रकार जलती में घी डालने का काम कर रहा है? सरकार यदि कोई ‘कठोर निर्णय’ लेती है तो सारे देश को ऐसे कठोर निर्णय के साथ डट कर खड़े रहना है। आखिर सवाल अस्तित्व का है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

 

 

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